जोग परे तब मुखरिते, आपन कर के काम /
काई काल कल कवलिते , रहि जग केवल नाम /३११ /
भावार्थ : -- अवसर पड़ने पर अपने द्वारा किये गए कार्य ही शब्दायमान होते हैं /काया , कल काल कवलित हो जाएगी अर्थात अर्थात यह शरीर आने वाले समय में नष्ट हो जाएगा , संसार में केवल नाम ही रह जाएगा
अर्थात : --अब यदी संविधान में कोई समस्या आ गई तो समाधान कौन करेगा, क्योंकि इसके रचनाकार तो निर्जीव हो चुके हैं
साँचे पटका देइ के , झूठ ढका ना जाए /
ए पट ऐसो करमनै , पार पार दरसाए /३१२ /
भावार्थ : -- सत्य के आवरण में असत्य को ढका नहीं जा सकता /सत्यता का आच्छादन इस प्रकार के कपडे से बुना हुवा होता है कि जिसके आर-पार देखा जा सकता है //
अर्थात : --"सत्य के स्पर्श से, असत्य को सत्य सिद्ध नहीं किया जा सकता "
झूठा पुतरा झोर दै , लांबा पुल बँधाए /
सच के जुग लगाईं कै,छल छाया दरसाए /३१३ /
भावार्थ : -- निरंतर झूठ बोलने वाले ने , नाप से भी बड़ा होने के कारण झूलता हुवा ,झूठ का एक पुल बनाया, जिसमें सच के जोड़ लगा दिए, और अपना कपट जाल दिखलाया /
अर्थात : -- "निन्यानवे झूठों को एक सच के द्वारा जोड़ा नहीं जा सकता,क्योंकि झूठ सच को भी शुन्य के बराबर कर देता है "
सुदामा अन बैर पड़े, मँगे किसन धन धान /
ज्ञान भान धन माँगते, रही जाते सनमान /३१४ /
भावार्थ : -- सुदामा से जब अन्न देव रूठ गए तब उन्होंने भगवान कृष्ण से धन संपदा की मांग की /यदि सुदामा ने धन अर्जित करने के ज्ञानबोध की मांग की होती तो उनका सम्मान रह जाता //
एक झूठ के धार धरे दूजन झूठ अधार ।
एक पाप दुआरि खोरे दूजन पाप दुआर /315/
भावार्थ : -- एक झूठ के आधार पर, दुसरा झूठ आधारित हो जाता है । पाप का एक द्वार, दुसरे पाप के द्वार को भी खोल देता है ।
मानस पाँच भूतिक सन बाँधे जी अजहूँन ।
काल ले उड़ाहि एक दिन साँस साँस कौ चून /316/
भावार्थ : -- मनुष्य का शरीर पंचभूत के साथ जीवन को आज तो बंधा है,किन्तु एक दिन मृत्यु आएगी, और समस्त सांस को उड़ा कर ले जाएगी ॥
भगत भजन पूजन करे प्रभु मैं चित्त रमाए ।
ऐसो कारजु कीजिये प्रभु तुझ में रलियाए /317/
भावार्थ : -- हे भगत ! तू भजन पूजा करके, भगवान में चित्त लगाता है ॥ ऐसा कार्य कर कि, स्वयं भगवान तुझमें चित्त लगाए ॥
नारी उदरन ते जने बाढ़े पयसन धार ।
जीवन जाके कारने ताके देवें गार /318/
भावार्थ : -- नारी के ही गर्भ जन्में हैं और उसी का प्रेमरस पी कर बढे हैं । जिसके कारण ही जीवित हैं, उसी को अपशब्द कहते हैं ॥
बिषय काम के जोग कर बस्तु कारे बियोग ।
बिषय काम को परिहर तब जोगी कर जोग /319/
भावार्थ : -- विषय में आसक्ति रख कर वस्तु को दूर करने से योग नहीं होता । पहले विषयासक्ति का त्याग करे तत पश्चात योगी जन योग करें ॥
अर्थात : --"विषय आसक्ती के त्याग से वस्तु स्वत: ही दूर रहती है"
कह रस राजन सिंगार तामे सब रस जोग ।
प्रीति प्रतीति रति साधन सहित सँजोग बियोग /320/
भावार्थ : -- श्रृंगार रस को रासो का राजा इस लिए कहते क्योंकि रस के सभी यौगिक -विभाव अनुभाव और संचारी भाव का एवं प्रेम-विश्वास और सौंदर्य के समस्त साधनों सहित संयोग एवं वियोग का अनूठा संगम होता है ॥
काई काल कल कवलिते , रहि जग केवल नाम /३११ /
भावार्थ : -- अवसर पड़ने पर अपने द्वारा किये गए कार्य ही शब्दायमान होते हैं /काया , कल काल कवलित हो जाएगी अर्थात अर्थात यह शरीर आने वाले समय में नष्ट हो जाएगा , संसार में केवल नाम ही रह जाएगा
अर्थात : --अब यदी संविधान में कोई समस्या आ गई तो समाधान कौन करेगा, क्योंकि इसके रचनाकार तो निर्जीव हो चुके हैं
साँचे पटका देइ के , झूठ ढका ना जाए /
ए पट ऐसो करमनै , पार पार दरसाए /३१२ /
भावार्थ : -- सत्य के आवरण में असत्य को ढका नहीं जा सकता /सत्यता का आच्छादन इस प्रकार के कपडे से बुना हुवा होता है कि जिसके आर-पार देखा जा सकता है //
अर्थात : --"सत्य के स्पर्श से, असत्य को सत्य सिद्ध नहीं किया जा सकता "
झूठा पुतरा झोर दै , लांबा पुल बँधाए /
सच के जुग लगाईं कै,छल छाया दरसाए /३१३ /
भावार्थ : -- निरंतर झूठ बोलने वाले ने , नाप से भी बड़ा होने के कारण झूलता हुवा ,झूठ का एक पुल बनाया, जिसमें सच के जोड़ लगा दिए, और अपना कपट जाल दिखलाया /
अर्थात : -- "निन्यानवे झूठों को एक सच के द्वारा जोड़ा नहीं जा सकता,क्योंकि झूठ सच को भी शुन्य के बराबर कर देता है "
सुदामा अन बैर पड़े, मँगे किसन धन धान /
ज्ञान भान धन माँगते, रही जाते सनमान /३१४ /
भावार्थ : -- सुदामा से जब अन्न देव रूठ गए तब उन्होंने भगवान कृष्ण से धन संपदा की मांग की /यदि सुदामा ने धन अर्जित करने के ज्ञानबोध की मांग की होती तो उनका सम्मान रह जाता //
एक झूठ के धार धरे दूजन झूठ अधार ।
एक पाप दुआरि खोरे दूजन पाप दुआर /315/
भावार्थ : -- एक झूठ के आधार पर, दुसरा झूठ आधारित हो जाता है । पाप का एक द्वार, दुसरे पाप के द्वार को भी खोल देता है ।
मानस पाँच भूतिक सन बाँधे जी अजहूँन ।
काल ले उड़ाहि एक दिन साँस साँस कौ चून /316/
भावार्थ : -- मनुष्य का शरीर पंचभूत के साथ जीवन को आज तो बंधा है,किन्तु एक दिन मृत्यु आएगी, और समस्त सांस को उड़ा कर ले जाएगी ॥
भगत भजन पूजन करे प्रभु मैं चित्त रमाए ।
ऐसो कारजु कीजिये प्रभु तुझ में रलियाए /317/
भावार्थ : -- हे भगत ! तू भजन पूजा करके, भगवान में चित्त लगाता है ॥ ऐसा कार्य कर कि, स्वयं भगवान तुझमें चित्त लगाए ॥
नारी उदरन ते जने बाढ़े पयसन धार ।
जीवन जाके कारने ताके देवें गार /318/
भावार्थ : -- नारी के ही गर्भ जन्में हैं और उसी का प्रेमरस पी कर बढे हैं । जिसके कारण ही जीवित हैं, उसी को अपशब्द कहते हैं ॥
बिषय काम के जोग कर बस्तु कारे बियोग ।
बिषय काम को परिहर तब जोगी कर जोग /319/
भावार्थ : -- विषय में आसक्ति रख कर वस्तु को दूर करने से योग नहीं होता । पहले विषयासक्ति का त्याग करे तत पश्चात योगी जन योग करें ॥
अर्थात : --"विषय आसक्ती के त्याग से वस्तु स्वत: ही दूर रहती है"
कह रस राजन सिंगार तामे सब रस जोग ।
प्रीति प्रतीति रति साधन सहित सँजोग बियोग /320/
भावार्थ : -- श्रृंगार रस को रासो का राजा इस लिए कहते क्योंकि रस के सभी यौगिक -विभाव अनुभाव और संचारी भाव का एवं प्रेम-विश्वास और सौंदर्य के समस्त साधनों सहित संयोग एवं वियोग का अनूठा संगम होता है ॥
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