बुधवार, 31 जुलाई 2013

----- ॥ दोहा-दशम 31॥ -----

जोग परे तब मुखरिते, आपन कर के काम  /
काई काल कल कवलिते , रहि जग केवल नाम /३११ /
भावार्थ : -- अवसर पड़ने पर अपने द्वारा किये गए कार्य ही शब्दायमान होते हैं /काया , कल काल कवलित हो जाएगी अर्थात अर्थात यह शरीर आने वाले समय में नष्ट हो जाएगा , संसार में केवल नाम ही रह जाएगा 

अर्थात : --अब यदी संविधान में कोई समस्या आ गई तो समाधान कौन करेगा, क्योंकि इसके रचनाकार तो निर्जीव हो चुके हैं 

साँचे पटका देइ के  , झूठ ढका ना जाए /
ए पट ऐसो करमनै , पार पार दरसाए  /३१२ /
भावार्थ : -- सत्य के आवरण  में असत्य को ढका नहीं जा सकता /सत्यता का आच्छादन इस प्रकार के कपडे से बुना हुवा होता है कि जिसके आर-पार देखा जा सकता है //

अर्थात : --"सत्य के स्पर्श से, असत्य को सत्य सिद्ध नहीं किया जा सकता "

झूठा पुतरा झोर दै , लांबा पुल बँधाए /
सच के जुग लगाईं कै,छल छाया दरसाए /३१३ /
भावार्थ : -- निरंतर झूठ बोलने वाले ने , नाप से भी बड़ा होने के कारण झूलता हुवा ,झूठ का एक पुल बनाया, जिसमें सच के जोड़ लगा दिए, और अपना कपट जाल दिखलाया /

अर्थात : -- "निन्यानवे झूठों को एक सच के द्वारा जोड़ा नहीं जा सकता,क्योंकि झूठ सच को भी शुन्य के बराबर कर देता है "

सुदामा अन बैर पड़े, मँगे किसन धन धान  /
ज्ञान भान धन माँगते, रही जाते सनमान /३१४ /
भावार्थ : -- सुदामा से जब अन्न देव रूठ गए तब उन्होंने  भगवान कृष्ण से धन संपदा  की मांग की /यदि सुदामा ने धन अर्जित करने के ज्ञानबोध की मांग की होती तो उनका सम्मान रह जाता //

एक झूठ के धार धरे दूजन झूठ अधार । 
एक पाप दुआरि खोरे दूजन  पाप दुआर /315/ 

भावार्थ : -- एक झूठ के आधार पर, दुसरा झूठ आधारित हो जाता है । पाप का एक द्वार,  दुसरे पाप के द्वार को भी खोल देता है । 

मानस पाँच भूतिक सन बाँधे जी अजहूँन । 
काल ले उड़ाहि एक दिन साँस साँस कौ  चून /316/

भावार्थ : -- मनुष्य का शरीर पंचभूत के साथ जीवन को आज तो बंधा है,किन्तु एक दिन मृत्यु आएगी, और समस्त सांस को उड़ा कर ले जाएगी ॥ 

भगत भजन पूजन करे प्रभु मैं चित्त रमाए । 
ऐसो कारजु कीजिये प्रभु तुझ में रलियाए /317/ 

भावार्थ : -- हे भगत ! तू भजन पूजा करके, भगवान में चित्त लगाता है ॥ ऐसा कार्य कर कि,  स्वयं भगवान तुझमें चित्त लगाए ॥ 

नारी उदरन ते जने बाढ़े पयसन धार । 
जीवन जाके कारने ताके देवें गार /318/ 

भावार्थ : -- नारी के ही गर्भ जन्में हैं और उसी का प्रेमरस पी कर बढे हैं । जिसके कारण ही जीवित हैं, उसी को अपशब्द कहते हैं ॥  

बिषय काम के जोग कर बस्तु कारे बियोग । 
बिषय काम को परिहर तब जोगी कर जोग /319/

भावार्थ : -- विषय में आसक्ति रख कर वस्तु को दूर करने से योग नहीं होता । पहले विषयासक्ति का त्याग करे तत पश्चात  योगी जन योग करें ॥ 

अर्थात : --"विषय आसक्ती के त्याग से वस्तु स्वत: ही दूर रहती है" 

कह रस राजन सिंगार  तामे सब रस जोग ।
प्रीति प्रतीति रति साधन सहित सँजोग बियोग /320/ 

भावार्थ : -- श्रृंगार रस को रासो का राजा इस लिए कहते क्योंकि रस के सभी यौगिक -विभाव अनुभाव और संचारी भाव का एवं  प्रेम-विश्वास और सौंदर्य के समस्त साधनों सहित संयोग एवं वियोग का अनूठा संगम होता है ॥ 

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