शुक्रवार, 12 जुलाई 2013

----- ॥ दोहा-दशम 9॥ -----

भितिका बिछड़ी पूँछड़ी, बिछड़े जल जस मीन । 
बिछुड़त तड़पत ऐसोइ,मन पिय पेम अधीन  ।९१। 
भावार्थ : -- छिपकली से बिछड़ कर पूँछ तड़पती है, और जल से बिछड़ कर जिस प्रकार मछली तड़पती है । प्रेम के अधीन हुवा यह मन भी  प्रीतम से बिछड़ कर उसी प्रकार तड़प रहे हैं ॥

मेरो मन घन साँवरो , तिरत फिरत चहुँओर । 
हेर  रही  है  राधिका,  गवने   कँह   चितचोर ।९२।  
भावार्थ : -- मेरा मन घनश्याम बन कर गगन में चारो ओर तैरता फिर रहा है । और राधिका रूपी देह ढूंड रही है कि मेरे चित चोर कहाँ चले गए ॥

पारस रूप पाटल ढँके , पलकन नयनन नेह । 
पट तर प्रिया पिया तके , कारे कंचन देह ।९३। 
भावार्थ : -- रूप पारस है किन्तु लज्जा रूपी लालिमा से ढका है, नयनों में स्नेह है किन्तु पलकों से ढका है । पट हटा के प्रिया, प्रियतम को ताके तो देह को कंचन कर दे॥ 

जल के कवन रंग नहीं, लाल ललामिन लोइ । 
जहँ लागी तहँ छींट पड़े, कारी भस्मन होइ ।९४। 
भावार्थ : --  पानी का कोई रंग नहीं होता और सुन्दरता लाल लाल अग्नि सी है । जहां यह लगी वहीँ उसपर छींट पड़ती है फिर तो यह भस्मीभूत होकर काली हो जाती है ॥


सत्तर   शास्त्र   पढ़   राउ,  रहा   अँगूठा   छाप । 
पहिरे बहुमूल कापरे, अंग अंग कौ माप | 9 5 | 

भावार्थ : -- सत्तर शास्त्र  पढ़  कर भी  शासक अंगूठा छाप ही रहा किन्तु अंग अंग को माप कर वस्त्र  बहुमूल्य पहनता है ॥  

धरें दण्ड़काधीस अरु, महा मात के कान ।
कहें इ देखो कोइरा, घोटाले के उफान | 9 6 | 

भावार्थ : --  प्राकृतिक आपदा के प्रभावित जनता द्वारा न्यायाधीशों और प्रधान मंत्री के कान पकड़ कर दिखलाते हुवे कहना चाहिए कि ये देखो तुम्हारे अंधाधुंध प्राकृतिक दोहन और दोहन के घाटे-घोटाले का परिणाम ॥

जो जो जपनी जाप लिए, सो सो सपने सोए । 
कारज चाटुकारी के, श्रम कन कारी होए | 9 7 | 

भावार्थ : -- जो जो नेतामंत्रियों एवं उनके दलों का जाप करते हैं, उनके सौ सौ सपने हैं । चाटुकारिता का कार्य भी पसीने लाने वाला है ॥ 
तात्पर्य : - 'परिश्रम ही करना है तो उत्तम कार्यों के लिए करना चाहिए' 

मनवा मत के पाख लिए, दूर दूर उड़ियाए । 
कबहु गहनै अवगाहे, कबहुँक गगन समाए। 9 8। 

भावार्थ : -- ये मन विचारों के पंख लिए दूर दूर उड़ जाता है। कभी तो यह गहरे गोते लगाता है, कभी यह गगन में समा जाता है ॥ 

ज्ञान बानी सदगुरु की, अरु बानी के ज्ञान । 
बानी भई सीप सरूप, ज्ञान मुकुती समान |99 |  
भावार्थ : -- सद गुरुजनों की सूक्तियां और उन सूक्तियों में समाया हुवा ज्ञान, ऐसे है जैसे वाणी सुक्तागृह हों और ज्ञान मुक्ता  हो ॥ 

मुख सन तौ गुरु गुरु रटै, पर कर गहे न सीस । 
दिशा दर्शन भरम रहे, सदैव वाकी दीस ।१००। 

भावार्थ : -- जो मुख  से तो  गुरु गुरु भजते हैं किन्तु गुरु का आश्रय ग्रहण नहीं करते । उनकी दृष्टि सदैव दिशाओं के ज्ञान से भ्रमित रहती है ॥  

"जिसे दिशाओं का ज्ञान न हो वह दशाओं का चिंतन कैसे कर सकता है" 

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