आँखन पट्टी बाँधि भए , दंडक धन का दास ।
मत कर इहाँ न्याय के, दो तौले कइ आस ।८१।
भावार्थ : -- आँखों में पट्टी बाँध के न्यायाधीश धन के दास हो बैठे हैं । यहाँ पर न्यायं के दो तोले की आस करना भी व्यर्थ है ।
मनवा इब अनंत गगन, मत पट काल घमंड ।
रह रह गढ़ गढ़ गर्जिता, लिये शब्द के षंड ।८२।
भावार्थ : - यह मन अनंत गगन के समान है जिसमें विचारों के बादल स्वरूप श्याम पट्टिका है । जो शब्दों के घनमाल लिए रह रह कर गढ़गढ़ाते हुवे गर्जना कर रहा है ॥
ऊपर जल अति चंचरा, नीचक लिये बिश्राम ।
एक थाल बहु मुकुति भरा, सागर सुन्दर नाम । ८३।
भावार्थ : -- ऊपर का जल तरंगित होकर अत्यधिक चंचल स्वरूप में है और तलहटी में धीर गंभीर रूप लिए हुवे है । एक थाल ऐसा है जिसमें अतिशय मुक्ता भरे हैं जिसका सुन्दर सा नाम है 'सागर' ॥
मंडुक मुख मोरिही मैं, टर टर करत सुहाए ।
बाहन नीच कुचल मरे, गलियन बिच निकसाए | 8 4 |
भावार्थ : -- मेडक का मुँह, नाली में ही टर टराते हुवे अच्छा लगता है ।गली में निकल कर बीच रस्ते उछल कूद करने से वाहन के नीचे आकर मरने का खतरा रहता है ॥
तेरो जात तेरो पुत, तेरो धन गठियाए ।
तेरी देही बार कै, हाड़हु चूँग उठाए | 8 5 |
भावार्थ : -- तेरे जाते ही तेरा ही पुत्र तेरी संपत्ति हड़प कर तेरे शरीर में आग लगाकर तेरी हड्डियां को भी चुग लेगा ॥
नीर करै जब निर्मला, तौ मीन काहु बसाए ।
आँच सन देही धूले, साँचे मन धुलियाए | 8 6 |
भावार्थ : -- यदि जल तन निर्मल करने में समर्थ होता तो फिर मीन में दुर्गन्ध क्यूँ आती | वास्तविकता यह है कि ताप से तन निर्मल होता है और सत्य से मन निर्मल होता है ॥
तेरो भीत तेल भरा, ढूँड रहा तू दीप ।
हीरा मिलता कोइरा, मोती मिलता सीप | 8 7 |
भावार्थ : -- जैसे हीरा कोयले में ही मिलता है और मोती सीप में ही मिलता है वैसे ही,भान और भगवान तो तेरे भीतर ही बसे हैं, और तू उसे मंदिर मस्जिद में ढूँड रहा है॥
नीचक करनी परिहरें, पुनि दीजै कछु काहि ।
पैठत दान ते द्रुत गति परिहरु पीरित पाहि | 8 8 |
भावार्थ : -- अपने धृष्ट एवं निकृष्ट कर्मों का त्याग कर तत्पश्चात किसी को कुछ दान करें | क्योंकि दान की अपेक्षा ऐसा त्याग पीड़ितों के पास शीघ्रता पूर्वक एवं निश्चित ही पहुँचता है ॥
माटी केरी मूरती , जीवन धन संचाए ।
अंत परे खंडित किये, जम लूट लेइ जाए | 8 9 |
भावार्थ : -- काया मिटटी से बनाई हुई एक प्रतिमा है, जिसमें जीवन रूपी धन संचित है अंत आने पर उसे
खंडित कर, यमराज लूट कर ले जाता है ॥
कहता भगवन डूबता, तू का डोबे मोए ।
एक दिन ऐसा आएगा में डोबूँगा तोए | 9 0 |
भावार्थ : - डूबते हुवे भगवान कह रहे हैं तू क्या मेरा नाश करेगा | एक दिन ऐसा आएगा में तेरा सत्यानाश करूंगा ॥
मत कर इहाँ न्याय के, दो तौले कइ आस ।८१।
भावार्थ : -- आँखों में पट्टी बाँध के न्यायाधीश धन के दास हो बैठे हैं । यहाँ पर न्यायं के दो तोले की आस करना भी व्यर्थ है ।
मनवा इब अनंत गगन, मत पट काल घमंड ।
रह रह गढ़ गढ़ गर्जिता, लिये शब्द के षंड ।८२।
भावार्थ : - यह मन अनंत गगन के समान है जिसमें विचारों के बादल स्वरूप श्याम पट्टिका है । जो शब्दों के घनमाल लिए रह रह कर गढ़गढ़ाते हुवे गर्जना कर रहा है ॥
ऊपर जल अति चंचरा, नीचक लिये बिश्राम ।
एक थाल बहु मुकुति भरा, सागर सुन्दर नाम । ८३।
भावार्थ : -- ऊपर का जल तरंगित होकर अत्यधिक चंचल स्वरूप में है और तलहटी में धीर गंभीर रूप लिए हुवे है । एक थाल ऐसा है जिसमें अतिशय मुक्ता भरे हैं जिसका सुन्दर सा नाम है 'सागर' ॥
मंडुक मुख मोरिही मैं, टर टर करत सुहाए ।
बाहन नीच कुचल मरे, गलियन बिच निकसाए | 8 4 |
भावार्थ : -- मेडक का मुँह, नाली में ही टर टराते हुवे अच्छा लगता है ।गली में निकल कर बीच रस्ते उछल कूद करने से वाहन के नीचे आकर मरने का खतरा रहता है ॥
तेरो जात तेरो पुत, तेरो धन गठियाए ।
तेरी देही बार कै, हाड़हु चूँग उठाए | 8 5 |
भावार्थ : -- तेरे जाते ही तेरा ही पुत्र तेरी संपत्ति हड़प कर तेरे शरीर में आग लगाकर तेरी हड्डियां को भी चुग लेगा ॥
नीर करै जब निर्मला, तौ मीन काहु बसाए ।
आँच सन देही धूले, साँचे मन धुलियाए | 8 6 |
भावार्थ : -- यदि जल तन निर्मल करने में समर्थ होता तो फिर मीन में दुर्गन्ध क्यूँ आती | वास्तविकता यह है कि ताप से तन निर्मल होता है और सत्य से मन निर्मल होता है ॥
तेरो भीत तेल भरा, ढूँड रहा तू दीप ।
हीरा मिलता कोइरा, मोती मिलता सीप | 8 7 |
भावार्थ : -- जैसे हीरा कोयले में ही मिलता है और मोती सीप में ही मिलता है वैसे ही,भान और भगवान तो तेरे भीतर ही बसे हैं, और तू उसे मंदिर मस्जिद में ढूँड रहा है॥
नीचक करनी परिहरें, पुनि दीजै कछु काहि ।
पैठत दान ते द्रुत गति परिहरु पीरित पाहि | 8 8 |
भावार्थ : -- अपने धृष्ट एवं निकृष्ट कर्मों का त्याग कर तत्पश्चात किसी को कुछ दान करें | क्योंकि दान की अपेक्षा ऐसा त्याग पीड़ितों के पास शीघ्रता पूर्वक एवं निश्चित ही पहुँचता है ॥
माटी केरी मूरती , जीवन धन संचाए ।
अंत परे खंडित किये, जम लूट लेइ जाए | 8 9 |
भावार्थ : -- काया मिटटी से बनाई हुई एक प्रतिमा है, जिसमें जीवन रूपी धन संचित है अंत आने पर उसे
खंडित कर, यमराज लूट कर ले जाता है ॥
कहता भगवन डूबता, तू का डोबे मोए ।
एक दिन ऐसा आएगा में डोबूँगा तोए | 9 0 |
भावार्थ : - डूबते हुवे भगवान कह रहे हैं तू क्या मेरा नाश करेगा | एक दिन ऐसा आएगा में तेरा सत्यानाश करूंगा ॥
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