जनम मरन दुइ छोर हैं, जगत हिँडोरा हेल ।
काल के करतल किरनी , दौ दिन का जे खेल ।१७१।
भावार्थ : -- जीवन -मरण दो छोर हैं, और यह संसार झूलता हुवा झूला है, इसकी रस्सी समय की हथेली में है, और झूला झुलाने का खेल अर्थात यह जीवन केवल कुछ समय हेतु ही है ॥
एक पथ बाहिर दौ पथिक, लाँबी लम्ब सुरंग ।
एक फिरै एक थीरे, बहुरइ दोनउ संग ।१७२।
भावार्थ : -- एक मार्ग के बाहर दो पथिक हैं मार्ग में लम्बी सुरंग बिछी है । दोनों पथिकों में एक चलता है और एक स्थिर रहता है फिर भी दोनों साथ रहते हैं ॥
उत्तर : --मुख
पथिक =जबड़े
देखत धरनि ध्यान सन , हरि साटी हरियाइ ।
पूछा रे पिन्हाए को, नाम धरत सकुचाइ ।१७३ ।
भावार्थ : -- जब धरती को ध्यान पूर्वक देखा तो वह हरी साटिका में सुहावनी प्रतीत हो रही थी । मेने पूछा किसने पहनाया तो वह पहनाने वाले का नाम लेते हुवे संकोचित हो गई ॥
बात कहूँ बातुनी की , बातन के भण्डार ।
बातन की बरनी धरे, बातन तैल अचार ।१७४।
भावार्थ : -- एक बातूनी की बात कहते हैं उसकी बातों की ही पाक शाला है । बातों की ही बरनी-वरनी है । और बातों के ही तेल में बातों का ही अचार भरा है ॥
श्रम जोत देइँ दानकन , धरती और किसान ।
श्रम कारत कर धारिये, राखत भू की कान ।१७५।
भावार्थ :-- खलिहानों में श्रम को जोत कर ही धरती और किसान हमकों अन्न का दान देते हैं । हमें भी उस अन्न को परिश्रमपूर्वक प्राप्त कर अपनी धरती के परिश्रम की मान-मर्यादा रखनी चाहिए॥
हार हेमबर जर तरे, कासत किरनन तार।
वसुंधरा घनबर बरे, दिए कन कन कर धार ।१७६।
भावार्थ : -- किरणों के तारों में कसे, जल रूपी मोतियों के हार उतरे, जिन्हें वसुंधरा ने अपने अति लावण्यित श्री मुख में धारण कर लिया और अन्न कणों को बाँट दिया ॥
अधरोपर अँगार धरे, पाए पलक पउ पौन ।
लाह लहक श्रृंगार निधि, लाइ बुझावै कौन |177|
भावार्थ : -- अधरों के ऊपर अंगारे रखे हैं, और पलक पंख की वायु से दहक उठी इस श्रंगार की संपत्ति की अग्नी कौन बुझाए ॥
आठ पहर चौंसठ घडी, कारे करमन राँच ।
झूठा कहता जाएगा, राम नाम है साँच |178|
भावार्थ : -- रे मानस तू चौबीस घंटे काले कार्य करताऔर झूठे मुख से "राम नाम सत्य है" कहता चला जाएगा,
अत: अब भी समय है तू अच्छे अच्छे कार्य कर ॥
जो नीचक पद पौढ़ते ताकी ऊंची दीठ ।
सो तो नीचक दीठते जाकी ऊँची पीठ |179|
भावार्थ : -- जो नीचा पद धारण करते हैं उनकी दृष्टि सदैव ऊंची रहती है । और वो नीचा देखते हैं, जिनका उंचा पद स्थान होता है ॥
कारे कारे राउ के ऐसन कालो राज ।
बिन तरि ऊपर खाए के कोउ करे ना काज |180|
भावार्थ : -- काले काले राजा के ऐसा काल राज है कि, ऊपर नीचे का खाए बिना कोई कार्य नहीं करता ॥
एक पथ बाहिर दौ पथिक, लाँबी लम्ब सुरंग ।
एक फिरै एक थीरे, बहुरइ दोनउ संग ।१७२।
भावार्थ : -- एक मार्ग के बाहर दो पथिक हैं मार्ग में लम्बी सुरंग बिछी है । दोनों पथिकों में एक चलता है और एक स्थिर रहता है फिर भी दोनों साथ रहते हैं ॥
उत्तर : --मुख
पथिक =जबड़े
देखत धरनि ध्यान सन , हरि साटी हरियाइ ।
पूछा रे पिन्हाए को, नाम धरत सकुचाइ ।१७३ ।
भावार्थ : -- जब धरती को ध्यान पूर्वक देखा तो वह हरी साटिका में सुहावनी प्रतीत हो रही थी । मेने पूछा किसने पहनाया तो वह पहनाने वाले का नाम लेते हुवे संकोचित हो गई ॥
बात कहूँ बातुनी की , बातन के भण्डार ।
बातन की बरनी धरे, बातन तैल अचार ।१७४।
भावार्थ : -- एक बातूनी की बात कहते हैं उसकी बातों की ही पाक शाला है । बातों की ही बरनी-वरनी है । और बातों के ही तेल में बातों का ही अचार भरा है ॥
श्रम जोत देइँ दानकन , धरती और किसान ।
श्रम कारत कर धारिये, राखत भू की कान ।१७५।
भावार्थ :-- खलिहानों में श्रम को जोत कर ही धरती और किसान हमकों अन्न का दान देते हैं । हमें भी उस अन्न को परिश्रमपूर्वक प्राप्त कर अपनी धरती के परिश्रम की मान-मर्यादा रखनी चाहिए॥
हार हेमबर जर तरे, कासत किरनन तार।
वसुंधरा घनबर बरे, दिए कन कन कर धार ।१७६।
भावार्थ : -- किरणों के तारों में कसे, जल रूपी मोतियों के हार उतरे, जिन्हें वसुंधरा ने अपने अति लावण्यित श्री मुख में धारण कर लिया और अन्न कणों को बाँट दिया ॥
अधरोपर अँगार धरे, पाए पलक पउ पौन ।
लाह लहक श्रृंगार निधि, लाइ बुझावै कौन |177|
भावार्थ : -- अधरों के ऊपर अंगारे रखे हैं, और पलक पंख की वायु से दहक उठी इस श्रंगार की संपत्ति की अग्नी कौन बुझाए ॥
आठ पहर चौंसठ घडी, कारे करमन राँच ।
झूठा कहता जाएगा, राम नाम है साँच |178|
भावार्थ : -- रे मानस तू चौबीस घंटे काले कार्य करताऔर झूठे मुख से "राम नाम सत्य है" कहता चला जाएगा,
अत: अब भी समय है तू अच्छे अच्छे कार्य कर ॥
जो नीचक पद पौढ़ते ताकी ऊंची दीठ ।
सो तो नीचक दीठते जाकी ऊँची पीठ |179|
भावार्थ : -- जो नीचा पद धारण करते हैं उनकी दृष्टि सदैव ऊंची रहती है । और वो नीचा देखते हैं, जिनका उंचा पद स्थान होता है ॥
कारे कारे राउ के ऐसन कालो राज ।
बिन तरि ऊपर खाए के कोउ करे ना काज |180|
भावार्थ : -- काले काले राजा के ऐसा काल राज है कि, ऊपर नीचे का खाए बिना कोई कार्य नहीं करता ॥
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