बुधवार, 10 जुलाई 2013

----- ॥ दोहा-दशम 7॥ -----

बोतरी का पानी पी, कागा खाया भोज । 
तोतरी तो बानी की, धरे ओझरी ओज । ७१ /
ओझरी = पेटआंत
ओज = विषमता
भावार्थ : -- बोतरी का पानी पीकर कौवें ने भोज खाया । बानी को तो तोतली किया और पेट/आँतों में विषमताएँ पैदा कर ली॥  

साधौ आया झोपड़ा, कपट तपस कर भेस । 
घर के बाहिर कर खड़ा, कास करक धर केस । ७ २ । 
भावार्थ : -- तेरी झोपड़ी में छल कपट का वेश भर कर पाखंडी आया है । तो फिर भलाई इसी में है कि उसके बाल को कसके पकड़ और उसे घर के बाहर खडा कर दे, 

निर्भयमल भयभीत हो, राखे सौ सौ राख । 
बानी बान भेद धरें, राखौ चाहे लाख । ७ ३। 
भावार्थ : -- 'निर्भयमल' ने काल से भयभीत होकर अनेक रक्षक रख लिए । किन्तु वाणी रूपी वाण तो लक्ष्य भेद कर ही रहते हैं चाहे लाखों रक्षक रख लो ॥

बानी में ही अमृत है, बानी कालक कूट । 
बोले साँचा सोइ ये , ये जो बोले झूट । ७४ । 
भावार्थ : -- वाणी में ही अमृत है, वाणी में ही विष है । सत्य भाषण किया जाए तो वह अमृत हैं और असत्य वचन कहा जाए तो वह विष हैं ॥
दुःख दरिद के सूल कौ, कंटक करत निकास । 
सुख सुगंध के फूल कौ, गाँठत कंठन कास । ७ ५ । 
भावार्थ : -- दुःख दरिद्रता की शलाकाओं को कंटक सामान समझ कर उसे निष्कास देना चाहिए और सुख के सुगन्धित फूलों को गूँथ के कंठ में धारण कर लेना चाहिए, सुखी जीवन का यही आधार वाक्य है ॥


चाह हिलग बैराग नहि, चाह बिलग अनुराग । 
चाह लाग लगाई है, चाह लगाइ न लाग । ७ ६ । 

भावार्थ : -- अभिलाषा में अनुरक्ति होने से बैराग्य नहीं होता, अभिलाषा से वियुक्त रहने पर अनुराग नहीं होता, यह अभिलाषा ही है जो अनुराग उपजाति है, और यह अभिलाषा ही है जो वैराग्य उपजाति है ॥ 

अर्थात : - सत्ता हो या प्रेम "वस्तु की चाह से ही विषय में आसक्ति होती है"

ऐतक   ऊँचा   बाड़िये,  जेतक    सीस    सँजोए ।
नखत न काहु काम के, सबते ऊँचे जोए  । ७ ७ । 

भावार्थ : - उतनी ही उंचाई तक ही उठना चाहिए जितनी ऊँचाई तक तन से सिर संयुक्त है अधिक ऊंचाई किसी काम की नहीं होती आकाश  में नक्षत्र सबसे ऊँचे हैं किन्तु किसी काम के नहीं है ॥  

जितै जगत मैं नाम हैं, उतै बिपरिते कार । 
गिरधर के कर बाँसुरी बजरंग के पहार ।७ ८। 

भावार्थ : -- जगत  में  जितने  भी  नाम है, अपने  अर्थ के विपरीत हैं अर्थात आँख के अंधे और  नाम नयन सुख के जैसे गिरि धरने वाले के हाथ में बाँसुरी है और बज रंग= गीत-संगीत के हाथ में पहाड़ है और जैसे रवण=रावण कोई और राम=मरा कोई और ॥ 

तेरे धन की चाँदनी, देखे सब  दिन रैन । 
कलुष करम की अंजनी, देखे तेरे नैन । ७ ९ । 

भावार्थ : -- तेरे धन के वैभव  का सुख तो  सभी मित्र एवं प्रियजनों को प्राप्त होगा किन्तु उस धन को संचयित करने वाले कलुषित कर्म का फल के भागी तुम ही होगे ॥ 

धन कामी की जीउनी, जस जल जीवन मीन । 
मेलत  दोनौ   जी  उठें, तडपत   दौनौ    हीन । ८ ० ।  

भावार्थ : -- धन के लोभी का जीवन चरित्र इतना संक्षिप्त है, जितना की जल में मीन का जीवन संक्षिप्त है धन और जल के मिलते ही दोनों जी उठते हैं और उसके बिना तड़पने लगते हैं ॥ 

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