मरा मरा सब जन कहें,जग में मरा न कोए ।
मरे मन की कलुषाई, सो तो मरनी होए । ५ १ ।
भावार्थ : -- मर गया! मर गया!! सारे यही कहते फिरते हैं और मरता कोई नहीं है सब चौरासी लाख योनियों में इसी पृथ्वी में विचरते रहते हैं । जब मन की अपवित्रता एवं उसके दोष समाप्त होते हैं और जीव परम गति को प्राप्त होता है, वही वास्तविक मृत्यु है ॥
बानिजै की बानी जी, बही जग उलटि धार ।
उधारी बही रोकड़ा, रोकड़ बही उधार । ५ २ ।
भावार्थ : -- व्यापारियों का व्यापार वही है ससार की उलटी धार जैसा। उधारियाँ तो रोकड़ बही में लिखी है और रोकड़ बही तक उधारी की है ॥
उजयारी रिपु रैन कइँ , रैनि कर रिपु पतंग ।
अपुने रिपु हम आपहीं जने चारि के संग । ५ ३ ।
भावार्थ : -- रजनी उजाला की शत्रु है, रजनी का शत्रु सूर्य है । हमारा शत्रु कोई नहीं काम,क्रोध,लोभ,मोह इन चार शत्रुओं की सानिध्यता से हम स्वयं अपने ही शत्रु उत्पन्न करते हैं ॥
बाँधे कौधन प्रेम घट, घन घन रस सँजोएँ ।
रस रीते कहा लाहिए , पिया पियासा होए /5 4 /
भावार्थ : -- सखी ! यदि करधनी में प्रेम का घट रखा है तो उसमें अधिकाधक रस संजो के रखें, रस की रिक्तता से लाभ भी क्या है इससे तो प्रियतम प्यासे ही रह जाता है ॥
जनमे सो तो गवाइँ जिअ , धरि गए मुख पै नाम ।
जनमे जप लिए राइ कै, गाँठे किए बस दाम | 5 5 |
भावार्थ : - जन्म दाताओं ने पालन पोषण करते जीवन गँवा दिया और मुख पर अपना नाम रख गए | किन्तु सन्तति माता पिता के उस नाम को विस्मृत कर राजा, नेता, धनी के नामों की माला जपते दर्शित हो रहे हैं जन्म दाताओं की केवल सम्पति अधीन किए हैं नाम नहीं ॥
भाव : -- "जितना नाम हम औरों का जपते हैं, उतना यदि अपने मात-पिता का जपे तो हमारा ही उद्धार हो जाए"
टीला टीली तुरग चढ़, लिए सत फेरी फेर ।
ढाई घर ढिलाई के , ढाई मैं भए ढेर । ५ ६ ।
भावार्थ : -- टीला और टीली ने घोड़ चढ़ी कर सात फेरे ले लिए । ढाई घर चलने के पश्चात गठ बंधन शिथिल पढ़ गया शेष ढाई घर में तो ढेर ही गए ॥
तू बूझे जग कौन है, मैं कहुँ यहु दस देस ।
चिद गगन घन अंतरमन ,जाने ना लव लेस /५ ७ ।
भावार्थ : -- तुमने पूछा इस संसार का परिचय क्या है ? मैने कहा ये जो दस बीस देश हैं यही संसार है ॥ फिर तो मैने समस्त ब्रम्हाण एवं ब्रह्म स्वरूपी अपनी अंतरात्मा को यत्किंचित भी नहीं जाना ॥
शब्द सुदि शब्द ही बदी, शब्द ही दिवस रैन ।
असत कहे अँधियार है , उजियारे सत बैन ।५८ ।
भावार्थ : -सब्द ही शुक्ल है शब्द ही कृष्ण है शब्द ही दिन-रात हैं । असत्य वचन अंधियार है सत्य वचन उजियार ॥
मन बानिजै समान है, देह द्रव्य के मान ।
सेवा सौदा भान कै , लहि लखि हरि कर दान । ५ ९ ।
भावार्थ : -- यह मन व्यापारी के समान है, और देह धन-पूंजी के समान । सेवा का पण ठान कर तत्पश्चात पुण्य रूपी प्राप्त लाभ को भगवान के हाथ दान करना चाहिए ॥
बानी मानस भेदिनी, चीन सकै तो चीन ।
काक पिक पेखे एक सम, बोलत लागे भीन |६ ० |
भावार्थ : -- वाणी मनुष्यों के मनोमस्तिष्क का रहस्योद्घाटन कर उसके स्वभाव का परिचय देने में समर्थ होती यदि पहचान सको तो पहचानो कौंआ और कोयल देखने में एक जैसे दिखते हैं किन्तु बोली ही से चिन्हांकित होते हैं ॥
मरे मन की कलुषाई, सो तो मरनी होए । ५ १ ।
भावार्थ : -- मर गया! मर गया!! सारे यही कहते फिरते हैं और मरता कोई नहीं है सब चौरासी लाख योनियों में इसी पृथ्वी में विचरते रहते हैं । जब मन की अपवित्रता एवं उसके दोष समाप्त होते हैं और जीव परम गति को प्राप्त होता है, वही वास्तविक मृत्यु है ॥
बानिजै की बानी जी, बही जग उलटि धार ।
उधारी बही रोकड़ा, रोकड़ बही उधार । ५ २ ।
भावार्थ : -- व्यापारियों का व्यापार वही है ससार की उलटी धार जैसा। उधारियाँ तो रोकड़ बही में लिखी है और रोकड़ बही तक उधारी की है ॥
उजयारी रिपु रैन कइँ , रैनि कर रिपु पतंग ।
अपुने रिपु हम आपहीं जने चारि के संग । ५ ३ ।
भावार्थ : -- रजनी उजाला की शत्रु है, रजनी का शत्रु सूर्य है । हमारा शत्रु कोई नहीं काम,क्रोध,लोभ,मोह इन चार शत्रुओं की सानिध्यता से हम स्वयं अपने ही शत्रु उत्पन्न करते हैं ॥
बाँधे कौधन प्रेम घट, घन घन रस सँजोएँ ।
रस रीते कहा लाहिए , पिया पियासा होए /5 4 /
भावार्थ : -- सखी ! यदि करधनी में प्रेम का घट रखा है तो उसमें अधिकाधक रस संजो के रखें, रस की रिक्तता से लाभ भी क्या है इससे तो प्रियतम प्यासे ही रह जाता है ॥
जनमे सो तो गवाइँ जिअ , धरि गए मुख पै नाम ।
जनमे जप लिए राइ कै, गाँठे किए बस दाम | 5 5 |
भावार्थ : - जन्म दाताओं ने पालन पोषण करते जीवन गँवा दिया और मुख पर अपना नाम रख गए | किन्तु सन्तति माता पिता के उस नाम को विस्मृत कर राजा, नेता, धनी के नामों की माला जपते दर्शित हो रहे हैं जन्म दाताओं की केवल सम्पति अधीन किए हैं नाम नहीं ॥
भाव : -- "जितना नाम हम औरों का जपते हैं, उतना यदि अपने मात-पिता का जपे तो हमारा ही उद्धार हो जाए"
टीला टीली तुरग चढ़, लिए सत फेरी फेर ।
ढाई घर ढिलाई के , ढाई मैं भए ढेर । ५ ६ ।
भावार्थ : -- टीला और टीली ने घोड़ चढ़ी कर सात फेरे ले लिए । ढाई घर चलने के पश्चात गठ बंधन शिथिल पढ़ गया शेष ढाई घर में तो ढेर ही गए ॥
तू बूझे जग कौन है, मैं कहुँ यहु दस देस ।
चिद गगन घन अंतरमन ,जाने ना लव लेस /५ ७ ।
भावार्थ : -- तुमने पूछा इस संसार का परिचय क्या है ? मैने कहा ये जो दस बीस देश हैं यही संसार है ॥ फिर तो मैने समस्त ब्रम्हाण एवं ब्रह्म स्वरूपी अपनी अंतरात्मा को यत्किंचित भी नहीं जाना ॥
शब्द सुदि शब्द ही बदी, शब्द ही दिवस रैन ।
असत कहे अँधियार है , उजियारे सत बैन ।५८ ।
भावार्थ : -सब्द ही शुक्ल है शब्द ही कृष्ण है शब्द ही दिन-रात हैं । असत्य वचन अंधियार है सत्य वचन उजियार ॥
मन बानिजै समान है, देह द्रव्य के मान ।
सेवा सौदा भान कै , लहि लखि हरि कर दान । ५ ९ ।
भावार्थ : -- यह मन व्यापारी के समान है, और देह धन-पूंजी के समान । सेवा का पण ठान कर तत्पश्चात पुण्य रूपी प्राप्त लाभ को भगवान के हाथ दान करना चाहिए ॥
बानी मानस भेदिनी, चीन सकै तो चीन ।
काक पिक पेखे एक सम, बोलत लागे भीन |६ ० |
भावार्थ : -- वाणी मनुष्यों के मनोमस्तिष्क का रहस्योद्घाटन कर उसके स्वभाव का परिचय देने में समर्थ होती यदि पहचान सको तो पहचानो कौंआ और कोयल देखने में एक जैसे दिखते हैं किन्तु बोली ही से चिन्हांकित होते हैं ॥
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