मंगलवार, 30 जुलाई 2013

----- ॥ दोहा-दशम 29॥ -----

ते राजन सौ धिक्कार, जे ताज आपन भूम /
धार भूत लब्ध लाभनै, सरनै दुजन पहूम /२९१ / 
भावार्थ : -- उस राष्ट्र प्रधान को सौ सौ धिक्कार है, जो अपनी मातृ भूमि को त्याग कर जीवन की आधार भूत आवश्यकताएं जैसे की स्वास्थ, शिक्षा, आहार-विहार को प्राप्त करने हेतु  पराए राष्ट्र की भूकी के शरणागत होता है

अर्थात : -- "किसी राष्ट्र के सर्वोच्च आसंदी पर आसित अधिकार प्राप्त प्रमुख का यह कर्त्तव्य है की वह अपने राष्ट्र में आधार भूत आवश्यकताओं की उत्तम व्ययवस्था करे और स्वयं उन्हीं व्यवस्थाओं का प्रयोग कर उसकी उत्तमता का दर्शन-प्रतिभू बने"

पाहन जलाधार धरे, तरनी खेवनहार /
दोनों ह्रदय भेद करे, कारे बिपरित कार /२९२/
भावार्थ : -- पाषण जलमग्न होता है और नौका पार लगाती है   /यदी दोनों को छिद्रित कर दिया जाए तो फिर इनकी प्रकृति  परिवर्तित हो जाती है अर्थात पाषाण पार लगा देता है और नौका जल मग्न हो जाती है //

चना गाछ गह गुन घना, उपजत पावैं पान /
काचे फलियन सुखत कन, दलियन दाल पिसान /२९३/  
भावार्थ : -- चने के झाड़ में बहुंत ही गुण होते हैं, उगते ही वह पत्र स्वरूप में खाया जाता / फलीभूत होते ही फलियाँ खाई जाती हैं, सूखे कणों को  दलने से दाल प्राप्त होती है, और पिष्टवर्ति अर्थात बेसन प्राप्त होता है, और बेसन से बहुंत प्रकार के पकवान बनाए जा सकते हैं, कहा भी गया है : --'चना तुझमें गुण घना'

दुःख दहक सुख सीतल हिम, दोनों ज्ञान चढ़ाए /
एक कर सैल सील लहे, दुज गाढ़त निकसाए /२९४/ 
भावार्थ : -- दहन करने वाली दुःख ज्वाल और शीतल करने वाले सुख हिम ने ज्ञान को चढ़ाया, एक के हाथ वह कठोर शिला स्वरूप हो गया, तथा दुसरे के हाथ वह अपेक्षा कृत अधिक गाढ़ा हो गया

अर्थात : -- ज्ञान कभी भी व्यर्थ नहीं जाता, सुख-संपती में वह उत्तम चरित्र का निर्माण करता है, एवं दुःख-विपत्ति में वह और अधिक गहरा हो जाता है

जो कर कै गिनती करै सो तौ करै न होए । 
धरै त्रिगुनी करत गुना वाकौ समउ सिखोए ।295। 

भावार्थ : -- कार्य कर उसका बखान करने से कार्य, अकार्य में परिवर्तित हो जाता है। और जो काली धन-संपत्ति का संकलन कर एक कार्य को तिगुना करके बताता है, उसे फिर समय ही सिखाता है ।। 

सरद काल फरे सरीफा आम बौरे बसंत ।
आए बरखा जमुनि धर झर बेरी हेमंत |296| 

भावार्थ : -- शरद काल में सरीफा ( सीता फल) फलता है । बसंत में आम के बौर आते ॥ वर्षा आते है तो जामुन लाती है । हेमंत के आते बेर फलते हैं ॥ 

भोजन मैं मधु सार अरु सरिद बरा जल धार । 
रहे निस दिन निर्मला राखे भवन सँभार |297|

भावार्थ : -- भोज्य पदार्थ में मधु, और पेय में गंगा जल ॥ यदि इन दोनों को संभाल कर रखा जाए तो ये कभी दूषित नहीं होते, सदैव निर्मल रहते हैं  ॥ 

गुन कहो तौ जग मिताए अवगुन कहत रिसाए । 
गुन अवगुण दोउ कहाए रिस रखे न मिताए |298| 

भावार्थ : --जगत के गुण कहो तो वह मित्र बन जाता है, अवगुण कहो तो शत्रु हो जाता है ॥ यदि गुण अवगुण दोनों कहो, तो वह मित्र रहता है न शत्रु ॥ 

सज्जन कौ ना करष सके जग धन सम्पद कोए । 
वाके परस प्रसंग ते लोहन सुबरन होए |299| 
भावार्थ : --सदाचारी को संसार की कोई भी धन संपदा आकर्षित नहीं कर सकती । क्योंकि उसके स्पर्श और व्याप्त स्वरूप से लोहा भी स्वर्ण हो जाता है ।। 

निर्मल रस की गागरी पद घुँघरु लिए बँधाए । 
सुर कामिनि बन नागरी पत पत खनकत जाए |300| 
 
उत्तर : -- देव नागरी लिपि जिसमें हिंदी, संस्कृत, मराठी आदि भाषाएँ लिखी जाती हैं , घटा 
भावार्थ : -- सुन्दर अप्सरा स्वरूप घटा, देवताओं के नगर उपवन में निर्मल जल/रस की घाघरी लिए, चरणों में घुंघरू बाँधे, पत्रों पर खनकती जा रही है ॥ 

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