सोमवार, 29 जुलाई 2013

----- ॥ दोहा-दशम 28 ॥ -----

बाहत घन भान ज्ञान  कै, आखर मत दै केर /
आप चाख प्रभु मुख धरे, जूँ सबरी ने बेर /२८१ /
भावार्थ : -- ठोक बजा कर एवं गंभीरता पूर्वक मनन के पश्चात  अपनी मीमांसा प्रकट करनी चाहिए / गंभीर विवेचन उसी प्रकार का मधुर फल देता है, जिस प्रकार से सबरी ने प्रभु श्री राम को दिए थे //

करुबर मधुरि झरबेरी, एकहि गाछ फरियाए /
जबलग मुख रस न पेरी, तबलग लगे सुहाए /२८२/
पेरना = रस निकालना 
भावार्थ : -- कड़वी और मीठी बेरियाँ एक ही वृक्ष में फलती हैं /जब तक मुख से उसके रस निकाल न ले और उसके गुण-धर्म को जान न लें , तब तक सारी ही बेरियाँ अच्छी लगती हैं //

मानख मुख साँस पियास, जस चपला अरु मीन । 
दोनों ही तिरछत रहीं, एक जल एक जल हीन /283/ 

भावार्थ : -- मनुष्य के मुख की सांस और प्यास, बिजली  और  मछली  के  समान  हैं ।  दोनों ही तड़पती है,एक जल में तो एक बिना जल ॥ 

खा खा कै आकंठ भरें लिए गाँठी बँधियाए ।
कहुँ गड़ियाए खोद गढ़े तिन की मति बतियाएँ /284/

भावार्थ : -- खा  खा  के  कंठ तक भर लिए, और गाँठ भी बाँध लिए, कहीं गड्ढा  खोद  की गाढ़ दिया, ऐसे महाआआनुभावों की बुद्धि को क्या कहेंगे ? 

अंग ढापन बसन धार, तन पोषन आहार । 
कुलोधारन  संस्कार   परोपकार   बिचार /285/ 

भावार्थ : -- वस्त्र अंग ढंकने हेतु, भोजन तन को पोषित करने  हेतु,संस्कार कुल का उद्धार करने हेतु, और विचार परोपकार करने हेतु धारण करना चाहिए ॥ 

मानख तेरो घट  भीत, गिनती  की  है साँस । 
गिन कै ही पो और खा, गिन कै ही कर बास /286/ 
भावार्थ:-- हे मनुष्य तेरे शरीर में गिनती की  साँसे हैं अर्थात पता  नहीं  ये  कब  समाप्त हो जाएँ । अत: तू गिन कर रोटी पका, संभाल कर उसे खा और चेत रख कर सो ॥  

तोषित के मन कामना, पूरे दो ही बूँद । 
अतोषित अपूरित रहे चाहे देउ समूँद /287/ 
भावार्थ : -- संतुष्ट की मनोकामना थोड़ा प्राप्त करने से ही पूर्ण हो जाती हैं ।  किन्तु  असंतुष्ट  को  कितना भी प्राप्त हो जाए, उसकी कामनाएं पूर्ण ही नहीं होती ॥

तीन बरस गए भूल मैं, तीन जुआ में हार । 
तीन गई सोवति अब चली जरन सरकार /288/ 
अर्थात : - तीन वर्ष खेलने खाने में बिता दी, तीन वर्ष युवा के विलास में बिता  दी  तीन  वृद्ध  वस्था प्राप्त कर सोती रही अब सरकार तन फूंकने चली ॥  

गिन केवल कर आँगुरी करै गिनत तै काहु ।
जो कर की गिनती करै सो करै न कहलाहु ।289।  

भावार्थ : -- हाथ की उँगलियों की गिनती करनी चाहिए, किए गए कार्य की नहीं । कार्य की गणना करने से, वह अकार्य सिद्ध होता है ।। 

निर्बुध कापर धोइरा चाहे रँग को संग । 
दुर्बुध कारा कोइरा लाहे ना को रंग ।290। 
भावार्थ : -- नासमझ, श्वेत पोत के समान होता है, जिस प्रकार श्वेत पोत पर कोई भी रंग चढ़ सकता है, उसी प्रकार नासमझ को सभी प्रकार से प्रशिक्षित किया जा सकता है । दुष्ट बुद्धि वाला काले पोत के समान होता है जिस प्रकार काले पोत में कोई भी रंग नहीं चढ़ता उसी प्रकार दुर्बुद्धि को किसी भी प्रकार से प्रशिक्षित नहीं किया जा सकता ।। 


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