रविवार, 28 जुलाई 2013

----- ॥ दोहा-दशम 26॥ -----

बेचन हाँक लगाइ दिए, नेह हाट के कूल /
मोती  लाल जबाहिरे, हरुबर बाके मूल /२६१ /
भावार्थ : -- प्रीत का विक्रय करने हेतु हाट ( बाज़ार) के किनारे हांक लगाई जैसे : -- प्रीत ले लो प्रीत
सारे मोती , सारे माणिक्य सारे रत्न उस प्रीत के मूल्य के सम्मुख हलके लगे //

प्रियबर नैन भवन बसे, भाउ पलक पख दौन /
बदन प्रिय प्रन बचन लसे, वा सों सोहन कौन /२६२ /
भावार्थ : -- जिसके नयनों के भवन में प्रियवर का वास हो और पलक की दो पंखुड़ी पर प्रीत का वास हो मुख पर प्रिय से की गई प्रतिज्ञा वचन का वास हो फिर उसके समान सुन्दर कौन हो सकता है //

काँचा ह्रदय कोइलिया, लाइ लगन लह राख /
साँचा सोन सोइ लिया, कर कुंदन गह लाख /२६३/
भावार्थ : -- कच्चा अर्थात कपटी ह्रदय  कोयला के दृश होता है उसे जिसने भी लिया वह प्रेम के अगन में जल कर भस्म हो गया / सच्चा ह्रदय सोने के सदृश्य होता है वैसा ह्रदय जिसने भी लिया, प्रेम की अगान में तप कर फिर वह कुंदन सा चमकने लगा //

तिनते प्रीत निबाहिये, लगन बँधे जिन संग /
भव सागर तर जाइये, पावत सोए प्रसंग /२६४/
भावार्थ : -- उनसे प्रीत निबाहना चाहिए जिनके संग लगन बंधे हों / क्योंकि अटूट प्रेम बंधन का प्रसंग प्राप्त होने से  संसार रूपी समुद्र को भी पार किया जा सकता है ( ऐसा संत साधू कह गए हैं ) //

धुनि सार के भान नहीं लै पत पत्तर छाप ।
ते मत जगत मान नहीं जे गुन गाहे न आप /265/

भावार्थ : - शब्द के सार का तो ज्ञान  नहीं  है, और  ( अन्य साधन भी सम्मिलित है ) के स्वामी बने समाचार पत्रों को छाप रहें हैं । संसार में उन्हीं विचारों का सम्मान  होता  है,विचारक  जिनका अनुकरण स्वयं करता है ॥

छाँट छाँट निकास लई छापैं दूजन दोस । 
आपन मुठी कास लई दुर्मत के कर पोस /266/

भावार्थ : -- दुसरे के दोषों को तो छांट छांट कर निकालते हैं और छाप देते हैं अथवा चिन्हांकित करते हैं । और अपने दोषों को छुपा कर रखने वाले बुराइयों के पोषक होते हैं ।। 

सुमिरन गोचर चिन्ह के भास ज्ञान परिभास । 
मानख सार गहन कर जाने निज इतिहास ।267/ 

भावार्थ : --आप्त (प्राप्य) एवं व्याप्त ग्रंथों तथा दृष्टिवान चिन्हों  की  भाषा  एवं  परिभाषा  से ज्ञान के सार को 
ग्रहण कर, मनुष्य को अपना  इतिहास की  जानकारी होती है ।। 

मुख सों ऐसो आगरो बानी के जहँ पुंज । 
बरतन में न ताव करें राखें कुंचित कुंज /268/ 
भावार्थ : --मुंह ऐसे आगार के समान है, जहां वाणी कि पूंजी संचयित है । इसे  व्यवहार में लाने  हेतु शीघ्रता न करें और चाबी लगा कर रखें ।। 

तन को ढाँपत कापरा अंतस मन को साँच ।
जीवन  ढाँप सदाचरन लाज कामिनी काँच ।269। 
भावार्थ : -- शरीर को कपड़ा ढंकता है, आत्म तत्व को सत्य ढंकता है ।। जीवन सदाचरण से ढंका जाता है और स्त्री की सुन्दरता, लज्जा से ढंकी जाती है ।। 

जे तन तेरो रे मना नाहीं थिरबत ठौर । 
बिधि बँधिआयौ पिंजरौ परखन जी के चोर /270/ 

भावार्थ : -- हे  मन ! ये तन तेरा स्थायी निवास नहीं है ।  तेरे सत्व  के गुण-दोषों  को परखने के लिए यह विधाता का बांधा हुवा पिंजरा है ॥ 




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