कहबत मैं बूँद कहाइ , सुकुति गृह मुकुति होइ /
धरनी कन कन उपजाइ, जननी जीवन जोइ /२५१ /
भावार्थ :-- कहावत में तो वह बूंद कहलाई किन्तु सीप में समा कर वह मुक्ति स्वरूप हो गई / धरती ने जब ग्रहण किया तो अन्न कण उपजाए और माता ने गर्भ में जीवन संजो लिया //
जल की तौ छाईं छली , दरपन छबि भरमाए /
साँचे ह्रदय देहि ढली, लावन श्री कहलाए /२५२/
भावार्थ : -- जल पर पड़ने वाली छाया तो कपट से भारी हुई है और दर्पण की छवि भ्रमित करने वाली है //
सद्चरित्र हृदय में ढली हुई देह ही 'लावण्यश्री' अर्थात सौन्दर्यमूर्त कहलाती है //
एक गाछी की नाउ मैं, एक नाईं के गाछ ।
एक जल बीच तीर रही,एक गोरी के पाछ /253/ भावार्थ : -- पेड़ के एक ही ताने से बनी हुई नाव में, एक विचित्र प्रकार का पेड़ है एक जल के मध्य तैर रही है और एक गोरी के पीछे ॥
कुञ्ज कुटीरे की गली पकडे ककड़ी चोर ।
पण ग्रंथि के महाबली बैठे आपन ठोर /254/
ककड़ी चोर = छोटा अपराधी
भावार्थ : -- लताओं से घिरे एवं ढके हुवे मार्ग पर ककड़ी चोर पकड़ा गया । जुआ-हाट के महाबली तो अपने घर
में सुरक्षित बैठे हैं ॥
एक पहरी बोर नहाए, दूजे पहिरे खाए ।
तीजे सोचे अब कोउ कारज केरा जाए |255|
अर्थात = "समय का आदर करें, अन्यथा समय आपका आदर नहीं करेगा"
ताप पावत गगन चढ़े पाए पौ बरस आए ।
जे घमंड घमंड गढ़े पल भर मैं बिथुराए /256/
भावार्थ : -- उष्मा प्राप्त कर आकाश में चढ़ जाते है और पवन प्राप्त कर बरस भी जाते हैं । घमंड से भरे घन एक क्षण में ही छिन्न भिन्न हो जाते हैं ॥
ओट बैठे महामन्त कोट कनक परिखात ।
प्रजा की नीच आपनी ऊँची कर ली जात /257/
भावार्थ : -- किले के चारों और खोदी खाई पर सोने के परकोट ( चार दिवारी) की ओट में बैठे महामात्य ने अपनी जाति ऊंची कर ली, जनता की नीची कर दी ॥
अँधेरे पाख की रैन नदिया नैया बाँध ।
कंदील धर कनिहारी ढूंड रही है चाँद /258/भावार्थ : -- अमावस की रात में नदी में नौका उतार कर, कर्णधारणी कंदील लिए चाँद को ढूंड रही है ॥
तीन जुग तौ देखि लिया आदि माधि अरु अंत ॥
काया माया के लाह परिहरे न महमंत /259/
भावार्थ :- महामात्य ने, जीवन की तीनों अवस्था बाल, युवा और वृद्धा को देख लिया, अभी भी उन्होंने न धन-
संपत्ति के लोभ का त्याग किया और न ही देह के आकर्षण का त्याग किया ॥
यह तन काँचा मंदरा, खाँचे हीरे लाल ।
है मन साँचा मंदिरा वाके करें सँभाल /260/
भावार्थ : -- यह तन तो कांच का दर्पण है जो क्षणभंगुर है, जिसमें रत्न जडित हो रहे हैं अर्थात केवल तन की ही देख भाल हो रही है । आत्म सत्व ही सच्चा भवन है जो चिरायु है अत: इस आत्म सत्व की देखभाल करें ॥
धरनी कन कन उपजाइ, जननी जीवन जोइ /२५१ /
भावार्थ :-- कहावत में तो वह बूंद कहलाई किन्तु सीप में समा कर वह मुक्ति स्वरूप हो गई / धरती ने जब ग्रहण किया तो अन्न कण उपजाए और माता ने गर्भ में जीवन संजो लिया //
जल की तौ छाईं छली , दरपन छबि भरमाए /
साँचे ह्रदय देहि ढली, लावन श्री कहलाए /२५२/
भावार्थ : -- जल पर पड़ने वाली छाया तो कपट से भारी हुई है और दर्पण की छवि भ्रमित करने वाली है //
सद्चरित्र हृदय में ढली हुई देह ही 'लावण्यश्री' अर्थात सौन्दर्यमूर्त कहलाती है //
एक गाछी की नाउ मैं, एक नाईं के गाछ ।
एक जल बीच तीर रही,एक गोरी के पाछ /253/ भावार्थ : -- पेड़ के एक ही ताने से बनी हुई नाव में, एक विचित्र प्रकार का पेड़ है एक जल के मध्य तैर रही है और एक गोरी के पीछे ॥
कुञ्ज कुटीरे की गली पकडे ककड़ी चोर ।
पण ग्रंथि के महाबली बैठे आपन ठोर /254/
ककड़ी चोर = छोटा अपराधी
भावार्थ : -- लताओं से घिरे एवं ढके हुवे मार्ग पर ककड़ी चोर पकड़ा गया । जुआ-हाट के महाबली तो अपने घर
में सुरक्षित बैठे हैं ॥
एक पहरी बोर नहाए, दूजे पहिरे खाए ।
तीजे सोचे अब कोउ कारज केरा जाए |255|
अर्थात = "समय का आदर करें, अन्यथा समय आपका आदर नहीं करेगा"
ताप पावत गगन चढ़े पाए पौ बरस आए ।
जे घमंड घमंड गढ़े पल भर मैं बिथुराए /256/
भावार्थ : -- उष्मा प्राप्त कर आकाश में चढ़ जाते है और पवन प्राप्त कर बरस भी जाते हैं । घमंड से भरे घन एक क्षण में ही छिन्न भिन्न हो जाते हैं ॥
ओट बैठे महामन्त कोट कनक परिखात ।
प्रजा की नीच आपनी ऊँची कर ली जात /257/
भावार्थ : -- किले के चारों और खोदी खाई पर सोने के परकोट ( चार दिवारी) की ओट में बैठे महामात्य ने अपनी जाति ऊंची कर ली, जनता की नीची कर दी ॥
अँधेरे पाख की रैन नदिया नैया बाँध ।
कंदील धर कनिहारी ढूंड रही है चाँद /258/भावार्थ : -- अमावस की रात में नदी में नौका उतार कर, कर्णधारणी कंदील लिए चाँद को ढूंड रही है ॥
तीन जुग तौ देखि लिया आदि माधि अरु अंत ॥
काया माया के लाह परिहरे न महमंत /259/
भावार्थ :- महामात्य ने, जीवन की तीनों अवस्था बाल, युवा और वृद्धा को देख लिया, अभी भी उन्होंने न धन-
संपत्ति के लोभ का त्याग किया और न ही देह के आकर्षण का त्याग किया ॥
यह तन काँचा मंदरा, खाँचे हीरे लाल ।
है मन साँचा मंदिरा वाके करें सँभाल /260/
भावार्थ : -- यह तन तो कांच का दर्पण है जो क्षणभंगुर है, जिसमें रत्न जडित हो रहे हैं अर्थात केवल तन की ही देख भाल हो रही है । आत्म सत्व ही सच्चा भवन है जो चिरायु है अत: इस आत्म सत्व की देखभाल करें ॥
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