शुक्रवार, 26 जुलाई 2013

----- ॥ दोहा-दशम 24॥ -----

जोबन जोहनी जुबती, जो बन पिय की नार /
माँगे जोबन चूकती, जो बन देइ उदार /२४१ /
भावार्थ : -- यौवन को संजोई युवती , जब प्रियतम की संगिनी हुई /तो प्रियतम ने यौवन के समस्त रूप-स्वरूप की कामना की, तब उस युवती से जो बना वह उदारता पूर्वक प्रियतम को दान किया //

सुधिजन को स्वान कहे, कारत बहुसहि पाप /
तत परत जब काल गहे, भूँके रतियन आप /२४२ /
भावार्थ :-- प्रबुद्ध जनों को स्वान कहते हुवे स्वयं तो बहुंत से पाप किये तट पश्चात जब काल कवलित होकर मृतप्राय हो गए तो रातो में स्वान बनकर स्वयं ही भोंकने लग गए //

पोथी पत्तर बाँच कै, कहि गए साधौ संत /
खाँच काँच चह आँच दै, प्रीत के नाहि अंत /२४३/
भावार्थ : -- ग्रन्थ पत्र  आदि बाँच बांच कर सद चरित्र प्रबुद्ध जन कह कह कर सिधार गए / प्रीटी को चाहे जड़ दो चाहे पटक दो चाहे तो उसे जला दो उसका अंत असंभव है  //

मति मलाई जोरी कै, आखर दिये जमाए /
बिलोइ बिलौनी लिखनी, सार तीर निकसाए /२४४ /
भावार्थ : -- विचारों की मलाई जोड़ कर उसमें अक्षरों का जामन दिया / बिलौनीस्वरूप लेखनी के बिलोने पर उसमें जो सार रूपी माखन प्राप्त हवा उसे किनारे कर लिया //

साधू सोहत शब्द लिए, राया दैत अदेस । 
भवन भगवन चासत दिए पहरी जोगत देस |245| 

भावार्थ : -- भद्रजन  सिद्धांत-वाक्यों का प्रतिपादन करते हुवे सुशोभित होते हैं राजन आदेश देते हुवे सुधोभित होता है । और अपने भवन में भगवान का  ध्यान कर अन्यथा प्रदर्शन न करते हुवे रक्षक, देश-प्रदेश की रक्षा करते हुवे सुशोभित होते हैं ॥ 

केस रचना कर बालक सिर पै धारे चोट । 
कारे ऐनक नक् धरे काढ़े दिन के  खोट /246|

भावार्थ : -- केश संवार कर शीश ऊपर शिखा आधारित कर बालक, नाक के ऊपर काला ऐनक धारण कर दिवस में दोष निकाल रहा है ( कि यह काला क्यों दिखाई दे रहा है) जबकि दोष उसकी आँखों में है ॥ 

उजरे जन कौ तौ राउ देखें कांच लगाए । 
कारे कारे कोयरे भली भाँति दिख जाए |247| 

भावार्थ : -- सज्जनों  को  तो  राजन  आँख  में  कांच लगा लगा कर देखते हैं । काला  कोयला और दुर्जन उन्हें भली भांति दिख जाते हैं ॥

साधू सोहत शब्द लिए, राया दैत अदेस । 
भवन भगवन चासत दिए पहरी जोगत देस |248| 

भावार्थ : -- भद्रजन  सिद्धांत-वाक्यों का प्रतिपादन करते हुवे सुशोभित होते हैं राजन आदेश देते हुवे सुधोभित होता है । और अपने भवन में भगवान का  ध्यान कर अन्यथा प्रदर्शन न करते हुवे रक्षक, देश-प्रदेश की रक्षा करते हुवे सुशोभित होते हैं ॥ 

सोना के तौ भवन उठाए, मस्तक नीच धसाए । 
पितर के कर ना चुकाए, ते कुंजर कहलाए |249|
 
भावार्थ : --बहुंत धनवान होकर जग ऊंची अटारी तो बना ली, किन्तु  माथा  ऊँचा  नहीं  किया उसे भूमि में धंसा दिया ऊँची अटारी ले कर भी जो पितृ ऋण से मुक्त नहीं होता वह कुंजड़ा कहलाता है ॥ 

दानाचरण होए प्रथम पितर देउ कर जोएँ । 
राज पाट धन आचरण स्वान भूखे सोएँ |250|

भावार्थ : -- दान  आचरण  में प्रथम होने पर, पितृ पूर्वज और देव गण भी दान का अंश प्राप्त करते हैं।  राज  पाट और  धन के  आचरण में प्रथम होने से पितृ पूर्वज और देवादि तो क्या कुत्ते भी भूखे सोते हैं ॥ 

" शास्त्रानुसार : -- "देह पंच तत्व का संगठन है, देह का विघटन पंच तत्व का विघटन है" अर्थात : -- जब हमारा या हमारे पूर्वजों का देहावसान होता है तो देह पंच तत्व में ही विलीन होती है अत: पंचतत्व की सेवा ही पूर्वजों की सेवा है ॥ 

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----- ॥ दोहा-दशम 363॥ -----,

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