दरसन ते दोहा दीन, बरन दुइ चंद चार /
एक धुनी में अरथ तीन, भरे भाउ भंडार /231/
भावार्थ : -- दोहा, देखने में तो अर्थहीन प्रतीत होता है जिसमें केवल दो चार अक्षर होते हैं किन्तु इसके एक शब्द के अंतत: तीन अर्थ होते हैं और बिंदु में सिन्धु के सदृश्य इसमें भाव का तो भण्डार ही भरा होता है //
कन लहि बिंदु, बिंदु बूँद, बूँद बूँद लह कुंभ /
कुंभ कुंभ लह नदी नद, साधे सिंधु कुटुंब /२३२ /
भावार्थ : -- कण से बिंदु, बिंदु से बूंद बनी , बूंद बूंद से गागर भरा / गागरों से छोटी नदी बनी छोटी नदियों से बड़ी नदी बनी और एक दोहे में सागर का पूरा कुटुंब समा गया //
दोहा दिये रथाकार, दुइ पद चरनन चार /
अर्थ भाउ बाह मसि पथ पत पत रथ संचार /२३४ /
भावार्थ ; -- दोहा को रथ का आकार दिया, दो पदों को बैठक स्थली एवं चार चरणों को रथ के पहिये बनाए / अर्थ और भाव अश्व बने और लेखनी को सारथिं बनाकर पत्र पृष्ठों के मार्ग पर रथ को संचारित किया //
बरन बरन बृंदा बन, भाउ भवन अम्बारि /
दरसे मोहन राधिका, दोहा दरसन कारि /२३४ /
भावार्थ : -- वर्ण-वर्ण वृदावन बने, और भाव भवन-मंडप बने / मोहन -रिधाए के दर्शन देते हुवे यह दोहा तो दर्शनीय प्रतीत होता है //
गज की गौरौवित चाल, बहुरइ नीचक भाल /
दीर्घ गति मति ऊंच किए चारत कुटिल कुचाल /२३५ /
भावार्थ :-- हाथी की गौरवान्वित चाल होती है फिर भी उसका मस्तक नीचे होता है/ और ऊँट(दीर्घ गति को ऊंट कहते हैं ) अपनी बुद्धि उंची किए धृष्टता भरी तिर्यक चाल चलता है //
कंजन कलस सुरा रहे सो तो कंज न होए ।
सुरा कलस कंजन रहे कंज कहे ना कोए /236/
भावार्थ : -- यदि अमृत के कलश में मदिरा रहे तो वह अमृत नहीं कहलाता । और यदि मदिरा के पात्र में अमृत रहे तो वह भी अमृत नहीं कहलाता ॥
अर्थात: -- यदि मदिरा का प्रचार करना अपराध है तो उसके चिन्हपात्र में जल का या अन्य पदार्थों का प्रचार करना भी अपराध होना चाहिए ।।
चिनिया चिनिया बादाम ले बादामी दाम ।
थोरहि में उल्लू बने हिन्द देस के बाम |237|
भावार्थ : - इंडिया गेट के पास चिनिया, चिनिया "चिनिया बादाम" "चिनिया बादाम" ऐसा सुनकर उसे
कोई बादाम के भाव में ले लिया । और थोड़े से ही में बौरा गया ॥
दो देस के दो मूरख दोनों मिलाए आँख ।
आपन भाखा परिहरे बोले पराए भाख |238|
भावार्थ : -- दो देश के दो मुर्ख जब एक स्थान पर मिले तो उनकी मुर्खता इस प्रकार लक्षित हुई कि, दोनों ने अपने देश की भाषा को त्याग कर पराए देश की भाषा को अपनाया ॥
बयस बिरति महमंत की जम पुर लिये बुलाए ।
ऐतक कारा देख के काल डरत बहुराए |239|
भावार्थ : -- महामात्य की आयु हो आई तो यमराज ने उन्हें यमलोक आने का न्योता दिया । "बापुरे ! इतना काला" ऐसा कहकर मृत्यु भी वापस लौट गई ॥
``दो देस के दौ बटेउ कैसे बखत गवाएँ ।
आधे पहर भेष भरे शेष बाहिँ सम्हाए |240|
भावार्थ : -- दो देश के दो जमाई, किस प्रकार से समय निरादर कर रहें हैं । आधा पहर इन्हें अपनी वेष-भूषा वरण करने में लग रहा है, आधा उसको सम्हाने में ॥
कन लहि बिंदु, बिंदु बूँद, बूँद बूँद लह कुंभ /
कुंभ कुंभ लह नदी नद, साधे सिंधु कुटुंब /२३२ /
भावार्थ : -- कण से बिंदु, बिंदु से बूंद बनी , बूंद बूंद से गागर भरा / गागरों से छोटी नदी बनी छोटी नदियों से बड़ी नदी बनी और एक दोहे में सागर का पूरा कुटुंब समा गया //
दोहा दिये रथाकार, दुइ पद चरनन चार /
अर्थ भाउ बाह मसि पथ पत पत रथ संचार /२३४ /
भावार्थ ; -- दोहा को रथ का आकार दिया, दो पदों को बैठक स्थली एवं चार चरणों को रथ के पहिये बनाए / अर्थ और भाव अश्व बने और लेखनी को सारथिं बनाकर पत्र पृष्ठों के मार्ग पर रथ को संचारित किया //
बरन बरन बृंदा बन, भाउ भवन अम्बारि /
दरसे मोहन राधिका, दोहा दरसन कारि /२३४ /
भावार्थ : -- वर्ण-वर्ण वृदावन बने, और भाव भवन-मंडप बने / मोहन -रिधाए के दर्शन देते हुवे यह दोहा तो दर्शनीय प्रतीत होता है //
गज की गौरौवित चाल, बहुरइ नीचक भाल /
दीर्घ गति मति ऊंच किए चारत कुटिल कुचाल /२३५ /
भावार्थ :-- हाथी की गौरवान्वित चाल होती है फिर भी उसका मस्तक नीचे होता है/ और ऊँट(दीर्घ गति को ऊंट कहते हैं ) अपनी बुद्धि उंची किए धृष्टता भरी तिर्यक चाल चलता है //
कंजन कलस सुरा रहे सो तो कंज न होए ।
सुरा कलस कंजन रहे कंज कहे ना कोए /236/
भावार्थ : -- यदि अमृत के कलश में मदिरा रहे तो वह अमृत नहीं कहलाता । और यदि मदिरा के पात्र में अमृत रहे तो वह भी अमृत नहीं कहलाता ॥
अर्थात: -- यदि मदिरा का प्रचार करना अपराध है तो उसके चिन्हपात्र में जल का या अन्य पदार्थों का प्रचार करना भी अपराध होना चाहिए ।।
चिनिया चिनिया बादाम ले बादामी दाम ।
थोरहि में उल्लू बने हिन्द देस के बाम |237|
भावार्थ : - इंडिया गेट के पास चिनिया, चिनिया "चिनिया बादाम" "चिनिया बादाम" ऐसा सुनकर उसे
कोई बादाम के भाव में ले लिया । और थोड़े से ही में बौरा गया ॥
दो देस के दो मूरख दोनों मिलाए आँख ।
आपन भाखा परिहरे बोले पराए भाख |238|
भावार्थ : -- दो देश के दो मुर्ख जब एक स्थान पर मिले तो उनकी मुर्खता इस प्रकार लक्षित हुई कि, दोनों ने अपने देश की भाषा को त्याग कर पराए देश की भाषा को अपनाया ॥
बयस बिरति महमंत की जम पुर लिये बुलाए ।
ऐतक कारा देख के काल डरत बहुराए |239|
भावार्थ : -- महामात्य की आयु हो आई तो यमराज ने उन्हें यमलोक आने का न्योता दिया । "बापुरे ! इतना काला" ऐसा कहकर मृत्यु भी वापस लौट गई ॥
``दो देस के दौ बटेउ कैसे बखत गवाएँ ।
आधे पहर भेष भरे शेष बाहिँ सम्हाए |240|
भावार्थ : -- दो देश के दो जमाई, किस प्रकार से समय निरादर कर रहें हैं । आधा पहर इन्हें अपनी वेष-भूषा वरण करने में लग रहा है, आधा उसको सम्हाने में ॥
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