बुधवार, 24 जुलाई 2013

----- ॥ दोहा-दशम 22 ॥ -----

छलकी जल की घाघरी, कर धर बदरी लाइ /
सर सर सरिता सागरी, भर भर सीच सुहाइ /२२१ /
भावार्थ : - छलकती हुई जल की घाघरी, बदरी अपने हाथों में धरी ले आई / जो जलाशय ,तालाब, नदियों और सागरों को  भरते हुवे धरती को सींचते हुवे सुहावनी लगी //

पलकावली तमाल बन, काल कलिंदी नैन /
बिपिन बिहारी देस मन, संकेत रुपन सैन /२२२ /
भावार्थ : -- पलक पंक्तियाँ  कालिंदी किनारे के तमाल वृक्ष बने , और काली यमुना नयन बने / मन,विहार करने का वनस्थान बना और नयनों के संकेत  स्थली चिन्ह बने //

सोम सुगँधित सरयु चरी, स्वर ग्राम कर जोग /
गिरधर अधरन बाँसुरी, राधा का सँजोग / २२३ /
भावार्थ : -- सप्त स्वर से युक्त होकर, कोमल सुगन्धित वायु बही / गिरधर के अधरों पर बाँसुरीहै और राधा का संग है //

दौ दृग देखे दिवस है, दौ दृग देखे रैन ।
दौ दृग देखे पहर है, दो दृग से सब सैन /224/

भावार्थ : -- दोनों आँखों से देखेंगे तो दिन है, दो आँखों से देखेंगे तो रात है । दो आँखों से देखे तो ही समय है, समस्त क्रिया संकेत दो आँखों पर ही ठहरे हुवे हैं ॥ 

जहाँ पिया तँह हूँ नहीं, जहाँ मैं तँह पियाए ।
मैं प्रियतम की सहायक , प्रियतम मोर सहाए |225| 

भावार्थ : -- जहां  प्रियतम  है वहां मैं नहीं हूँ, जहां मैं हूँ वहीँ प्रियतम हैं । मैं प्रियतम की सहायक हूँ, प्रियतम 
मेरे सहायक हैं ॥ 

भाखा आपनी बोलिए, लिये पराई सीख ।  
रंग रस घोरें आपने, ले दूजन की लीख |226| 

भावार्थ : -- "पराए की सिखाई नहीं बोलनी चाहिए" या पराए से सीख(ज्ञान)लेकर, अपनी भाषा ही बोलनी चाहिए या पराई भाषाएँ तो सिखनी  चाहिए  और बोलनी अपनी चाहिए । यदि लिपि भी पराई हो तो अपनी ही सभ्यता और संस्कृति के रंग भरने चाहिए क्योंकि भारत की संस्कृति एवं सभ्यता सबसे प्राचीन और सबसे श्रेष्ठ है ॥ 

श्री रामायन ग्रन्थ के देखौ अद्भुद मेल । 
दस्यु तौ बरज्ञान लिखै, ज्ञानी रह रन खेल |227| 

भावार्थ : -- श्री  रामायण  ग्रन्थ  का  यह अनोखा खेल देखो । डाकू तो उत्तम ज्ञान ग्रन्थ की रचना कर रहा ज्ञानी युद्ध कर रहे हैं ॥  

दसानन के नाभि कुंड, ज्ञान के अमृत कोष । 
पाछे सठ आनन गिरे, पहिले एक सर सोष |228|  

भावार्थ : --  रावण के नाभि कुंड में ज्ञान रूपी अमृत का कोष था । भगवन  ने  पहले एक सायक से  उसे शोषित किया, ( शेष तीस) फिर उसके अज्ञानी शीश-समूह को नीचे गिराया ॥ 

शब्द सागर बूँद कोष, भए मुकुति मूलवान । 
पावन हार को चाहिए, दें विचार को दान |229| 

भावार्थ : -- शब्द-सागर के बूँद कोष में बहुंत से अनमोल मोत हैं । पाने वाले को उसे विचारों को दान कर देना चाहिए ॥    

कर्म देही समान है, छाईं भाग सरूप । 
ता पर श्रमन धूप पड़े तबहि छाइ के मान |230| 

 भावार्थ : -- कर्म देही के  समान  हैं, और छाया  भाग्य  स्वरूप होती है, अर्थात देह रूपी कर्म के  बिना छाया रूपी भाग्य का भी अस्तित्व नहीं होती और देह पर  जब परिश्रम रूपी धुप  पड़ती है, तभी  परछाई रूपी भाग्य लक्षित होता है॥ 

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----- ॥ दोहा-दशम 363॥ -----,

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