एक तरफ कलम बहादुर, दूज कलम शमशीर ।
चले हर्फ़े कमान पै, सखुन दाँ के तीर |211|
भावार्थ : -- एक छोर पर कलम का धनी है, दुसरे छोर पर कलम तलवार बनी है शब्दों के धनुष पर काव्य रसिकों के तीर चल रहे हैं ॥
दहने दस्त दहशत में, बदले शेर ठियाए ।
अखबर खोह दहाड़ता, दाहिन ले दे पाए |212|
भावार्थ : -- जंगल में शेर ने मूंह बाँध कर अर्थात बिना दहाड़ते हुवे दहशत में अपना ठिकाना बदल लिया अब वह समाचारों की गुफा में परिक्रमा करता हुवा या कठिनता पूर्वक दिखा ॥
दातादिल दरिया करे, दिए तरकारी नाज /
मोती लाल जुवाहिरे, किए सरकारी काज /२१३ /
भावार्थ : -- डाटा ने तो उदारता पूर्वक दाना -पानी दिया, किन्तु सरकारी कुकर्मों ने उसे मोती मानिक आदि जवाहिरात जैसा कीमती बना दिया //
बँदा खाब गफलत में, ओढ़े मोटी खाल /
आप लालो जवाहिरे, दूजन खान ख्याल /२१४/
भावार्थ : -- सरकारी बन्दे अपने बदन पे मोटी-मोटी खाल ओढ़ के ख्वाबे-गफलत में हैं अर्थात गहरी नींद में हैं /खुद के खाने में लाल मानिक जैसे जवाहर चाहिए और दुसरे का खाना-ख्याली है अर्थात भोजन सपना है //
मुलक दौलत नाम करे वो तो सल्लेलाह ।
आपन इंतजाम करे सो तो नाही शाह /215/
अर्थात = मुल्क को दौलत मंद करके दुनिया में उसका नाम करे ऐसे शाह का क्या कहना, मगर जो खुद के ही नाम और खुद के ही दौलते-इंतजाममें रहे फिर शाह नहीं ॥
सारे चसके चाख लिए दै दै साही भोज ।
अब को सीराँ चासनी साह रहा है खोज /216/
भावार्थ : -- राजसी भोज दे दे कर राजा ने, सारे चस्के चख लिए (अर्थात ऊंचे से ऊंचा पद,ऊंचा घर, ऊँचे कपडे, ऊँची ऊँची उड़ाने आदि) अब वह कौन सी अमृत, कौन सी चाशनी चखने के लिए लालायित है पता नहीं ?
जहरे-क़ातिल में बुझे फावड़िया से दाँत ।
चाटुक मार आस्तीन गाड़े राखे आँत /217/
मार आस्तीन = आस्तीन का सांप
भावार्थ = चाटुकार आस्तीन के सांप होते हैं, जो घातक विष में डुबोए हुवे अपने नुकीले दांत को आँतों में गाड़े रखते हैं ॥
देहक़ान बसा झोपड़ा महलो-मालो साह ।
हक़ मिलै न हक्क़े-नाहक़ माँगे कौन पनाह /218/
देह्काँ = किसान/गांववासी
हक्के-नाह़क = न्याय
भावार्थ : -- किसान/गांववासी का झोपड़े में भी निर्वाह नहीं, और राजा राजसी जीवन व्यतीत कर रहा है । न अधिकार मिले, न ही न्याय मिले, अब वह किसकी शरण में जाए ॥
संगे-सान पै हुनर कर धारें तीर कमान ।
नीम खैंच तब छाँड़िये जब हो नज़र निसान /219/
भावार्थ : -- किरमिच के पत्थर पर अच्छी तरह से तराश कर फिर तीर को कमान में रखें । गहरे खिंच कर तीर तभी छोड़ें जब निशाना आँख की सीध पर हो ॥
अर्थात : "सुन्दर शब्दों को संग्रह करें और उचित अवसर पर प्रयोग में लाएं"
मसले दस दुवारि खड़े पीठ क़ुतुब की लाट ।
साह ख़्वाब गफलत मैं सों सरकारी खाट /220/
भावार्थ :--समस्याएँ मुंह बाए खडी हैं और सुलझाए के लिए नीति शास्त्रों की भी थप्पी लगी हैं । किन्तु राजा
तो सरकारी सुख सुविधाओं का आनंद लेते हुवे नींद मग्न हैं ॥
चले हर्फ़े कमान पै, सखुन दाँ के तीर |211|
भावार्थ : -- एक छोर पर कलम का धनी है, दुसरे छोर पर कलम तलवार बनी है शब्दों के धनुष पर काव्य रसिकों के तीर चल रहे हैं ॥
दहने दस्त दहशत में, बदले शेर ठियाए ।
अखबर खोह दहाड़ता, दाहिन ले दे पाए |212|
भावार्थ : -- जंगल में शेर ने मूंह बाँध कर अर्थात बिना दहाड़ते हुवे दहशत में अपना ठिकाना बदल लिया अब वह समाचारों की गुफा में परिक्रमा करता हुवा या कठिनता पूर्वक दिखा ॥
दातादिल दरिया करे, दिए तरकारी नाज /
मोती लाल जुवाहिरे, किए सरकारी काज /२१३ /
भावार्थ : -- डाटा ने तो उदारता पूर्वक दाना -पानी दिया, किन्तु सरकारी कुकर्मों ने उसे मोती मानिक आदि जवाहिरात जैसा कीमती बना दिया //
बँदा खाब गफलत में, ओढ़े मोटी खाल /
आप लालो जवाहिरे, दूजन खान ख्याल /२१४/
भावार्थ : -- सरकारी बन्दे अपने बदन पे मोटी-मोटी खाल ओढ़ के ख्वाबे-गफलत में हैं अर्थात गहरी नींद में हैं /खुद के खाने में लाल मानिक जैसे जवाहर चाहिए और दुसरे का खाना-ख्याली है अर्थात भोजन सपना है //
मुलक दौलत नाम करे वो तो सल्लेलाह ।
आपन इंतजाम करे सो तो नाही शाह /215/
अर्थात = मुल्क को दौलत मंद करके दुनिया में उसका नाम करे ऐसे शाह का क्या कहना, मगर जो खुद के ही नाम और खुद के ही दौलते-इंतजाममें रहे फिर शाह नहीं ॥
सारे चसके चाख लिए दै दै साही भोज ।
अब को सीराँ चासनी साह रहा है खोज /216/
भावार्थ : -- राजसी भोज दे दे कर राजा ने, सारे चस्के चख लिए (अर्थात ऊंचे से ऊंचा पद,ऊंचा घर, ऊँचे कपडे, ऊँची ऊँची उड़ाने आदि) अब वह कौन सी अमृत, कौन सी चाशनी चखने के लिए लालायित है पता नहीं ?
जहरे-क़ातिल में बुझे फावड़िया से दाँत ।
चाटुक मार आस्तीन गाड़े राखे आँत /217/
मार आस्तीन = आस्तीन का सांप
भावार्थ = चाटुकार आस्तीन के सांप होते हैं, जो घातक विष में डुबोए हुवे अपने नुकीले दांत को आँतों में गाड़े रखते हैं ॥
देहक़ान बसा झोपड़ा महलो-मालो साह ।
हक़ मिलै न हक्क़े-नाहक़ माँगे कौन पनाह /218/
देह्काँ = किसान/गांववासी
हक्के-नाह़क = न्याय
भावार्थ : -- किसान/गांववासी का झोपड़े में भी निर्वाह नहीं, और राजा राजसी जीवन व्यतीत कर रहा है । न अधिकार मिले, न ही न्याय मिले, अब वह किसकी शरण में जाए ॥
संगे-सान पै हुनर कर धारें तीर कमान ।
नीम खैंच तब छाँड़िये जब हो नज़र निसान /219/
भावार्थ : -- किरमिच के पत्थर पर अच्छी तरह से तराश कर फिर तीर को कमान में रखें । गहरे खिंच कर तीर तभी छोड़ें जब निशाना आँख की सीध पर हो ॥
अर्थात : "सुन्दर शब्दों को संग्रह करें और उचित अवसर पर प्रयोग में लाएं"
मसले दस दुवारि खड़े पीठ क़ुतुब की लाट ।
साह ख़्वाब गफलत मैं सों सरकारी खाट /220/
भावार्थ :--समस्याएँ मुंह बाए खडी हैं और सुलझाए के लिए नीति शास्त्रों की भी थप्पी लगी हैं । किन्तु राजा
तो सरकारी सुख सुविधाओं का आनंद लेते हुवे नींद मग्न हैं ॥
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें