सोमवार, 22 जुलाई 2013

----- ॥ दोहा-दशम 20॥ -----

फूर फूर धौल सरूप, पातर पातर लाल /
राग रंगे रंजन करे, बरख घटा घन काल /२०१ /
भावार्थ : -- पुष्पों ने श्वेत रूप धारण कर लिया और पत्ते लाल ललामिक हो गए /  घनी काली घटा ने बरस कर मन का  रंजन करने वाले छ: राग : - श्री, वसंत,पंचम, भैरव,मेघ और नर-नारायण छेड़ दिए //

मंदिर लगे मदिरालय, गह गति जग बाम  / 
तुलसी गली गली फिरै, आँगन लहे बिश्राम /२०२ /
भावार्थ : -- समाज ने ऐसी उलटी गति धारण कर ली है कि, घरों /मंदिरों से तो मधुशालाएँ जुड़ गईं | आँगन विलुप्त प्राय हो गए ,और तुलसी गली नालियों में उत्पन्न हुई दिखाई देती है

बध बुराई निर्बुध का छाया जग अँधियार /
साँचे साजन गौन भए, कौन करे उजियार /२०३ /
भावार्थ : --  माया में लिप्त इस संसार में अज्ञान एवं दुराचरण का अन्धेरा छा गया है,  सद्चरित्र जन तो अप्रधान अर्थात निकृष्ट पद को प्राप्त हो गए हैं संसार में अब ज्ञान का प्रकाश कौन करेगा ?

जागत नैन जगत भै, सिन्धुहु भय आधार /
दिवस तीर तरंग धरा , रैन किये अधिकार /२०४ /
भावार्थ : -- संसार की आँखे खुलते ही सागर भी भयभीत हो जाता है / दिवस में तो वह धरती से लहरों को समेत लेता है, और रात्रि होते ही पुन: उस पर कब्जा कर लेता है //

आपन रखन राखन हुँत, आपन जामिक जाम /
चार अरि जग जनम गहे, आप कार परिनाम /२०५/
भावार्थ : - स्वयं की सुरक्षा करने हेतु स्वयं को ही रक्षक उत्पन्न करने होंगे क्योंकि इस संसार में चार शत्रु ( (काम, क्रोध, मद, लोभ ) स्वयं के कार्य परणामों के फलस्वरूप ही जन्में हैं ||

चारि चरन गुन ज्ञान कै, चारि चरन चलि आए /
ज्ञान शब्द ढराई कै, आगिन चरन बढ़ाएँ /२०६ /
भावार्थ : -- गुणों के चार चरणों का ज्ञान लेकर चार चरण चल कर आ गए / अब इस ज्ञान को शब्दों में ढालकर फिर आगे चरण बढाना होगा ||

सूरज ह्रदय अगन भरे, धरनी बरे न कोए । 
एक चकमक ज्वलकन ते बरत कोयलो होए |207|  

भावार्थ : -- सूर्य के ह्रदय में अग्नी भरी हुई है, किन्तु उससे पृथ्वी में कोई नहीं जलता । एक चकमक पत्थर जिससे चिंगारी उत्पन्न होती है, समस्त पृथ्वी को जला कर कोयला कर सकता है ॥ 

हमर देस के राउ जूँ, ठठेरे के बिलाउ । 
चाहे प्रान गवाउँ पर घोटाले कर खाउ |208|

ठठेरे के बिलाऊ = ढीठ, ऐसा व्यक्ति जिस पर किसी बात का प्रभाव न पड़े 

भावार्थ : --  हमारे देश के राजा ऐसे ढीठ है कि उनपर किसी बात का प्रभाव नहीं पड़ता उनका यह ब्रम्ह वाक्य है घोटाले कर कर के खाओ चाहे प्राण ही क्यों न गवाने पड़ें ॥  

कापर ता पर कापरै पहीनै मूलवान  । 
शब्द पति कह खरी खरी जावै चाहे जान |209| 

भावार्थ : -- शब्द पति ( कहने भर को राजा ) का यह कटु किन्तु सत्य वचन है कि, कपड़ों के ऊपर कपडे पहनो, मूल्यवान पहनो, भले ही जान चली जाए ॥ 

गाँठ दमड़ी लै लहुटे, चाहे चमड़ी जाए । 
कारी करनी ना छुटे, कहे देस के राए |210| 

भावार्थ : -- धन को लूट लूट के गंठियाओ, चाहे प्राण ही क्यों न चले जाएं । काली करातुते मत छोड़ना ऐसा भारत देश के राजा का मत है ॥ 

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