जे जग माया रेहड़ी, पंगत पँच पकवान /
बरत चरित फलिहार कर, राखौ जी के कान /१९१ /
भावार्थ : -- इस संसार में माया रूपी ठेला सजा है जिसमें पँच बड़िया बड़िया व्यंजनों की पंक्तियाँ सजी हैं ( पँच शब्द का प्रयोग सुन्दरता हेतु भी किया जाता है जैसे: --पँच परिधान अर्थात =सुन्दर वस्त्र ) / हमें चाहिए की हम व्रत/उपवास आचरण करते हुवे, केवल फलों का आहार अथवा न्यूनतम आहार ही लें और अपने जीवन की मान-मर्यादा रखें //
लकुटी माया मोहनी, मारे साँटे रोए /
कबहु बसन कबहु बासन , कबहुक सँजोइ जोए /१९२ /
भावार्थ : -- यह गुनिया माया छड़ी के समान है जिसके सोंटे पड़ते ही सांसारिक लोग कभी तो कपड़ों की कभी घर की और कभी सज्जा सामग्री के लिए रोने लगते हैं, अर्थात चाह करने लगते हैं //
माया मूरत मोहनी, सब सों सीस नवाएँ /
मरनी को अमरन करे, सो तो पूज सुहाए /१९३/
भावार्थ : -- माया की यह मूर्ति बड़ी ही मोह कारिणी है, जिसके सम्मुख सभी सिर झुकाते हैं यदि इसमें मृत्यु को अमरत्व में परिवर्तित करने की योग्यता हो ,तो फिर वह पूजा के योग्य है //
एक बीज भुइँ बोवन ते, एक तरुबर उपजाए /
एक साख फर सार गरभ, बहुसह बीज समाए /१९४/
भावार्थ : -- भमि में एक बीज के बोने से ,एक वृक्ष उग जाता है / और उस वृक्ष की एक शाखा के एक सार गर्भित फल में पुन: बहुत सारे बीज समाए होते हैं //
जों जग मनुज देह धरे, लौ सकल रस स्वाद ।
बिषय काम मैं रत रहो, एहि राजन के वाद /195/
भावार्थ : -- यदि संसार में मनुष्य देह मिली है, तो समस्त स्वाद का आनंद लो । एवं भौतिक पदार्थों की और अधिक कामना रखते हुवे "खाओ, पीओ और मौज करो" हमारे राजा का तो यही सिद्धांत है ॥
सागर जोड़ मेघ बने, मेघ जोड़ बन बारि ।
बारि जोड़ जड़ बीज जिए, जोड़ी मैं जिउ धारि /196/
भावार्थ :-- सागर के जुड़ने से ही मेघ बनते हैं, मेघों के जुड़ने से ही वर्षा होती है ॥ वर्षा के जोड़ से ही सुप्त बीज अंकुरित होता है। जोड़ी में रहने से ही प्राणीजगत का अस्तित्व है ॥
राम रमा बन बास के, बात करें सब कोए ।
चार कोस बस चारि के पग में छाले होए /197/
भावार्थ : -- वैदेही एवं श्री राम के वन वास की बाते तो सब बना लेते हैं, केवल चार कोस चलने से ही पाँव में छाले हो जाते हैं ॥ अर्थात : -- "वनवास का जीवन काटना अत्यधिक कठिन है"
पाथर के तौ अंक नहि, चढ़े कैसे पहाड़ ।
बादर के तौ पंख नहि, उड़े गगन कस बाड़ /198/
भावार्थ : -- पत्थर के तो हाथ पैर नहीं है, फिर वो पहाड़ पर कैसे चढ़गए। बादल के तो पंख नहीं है, फिर वे गगन में तेजी से कैसे उड़ रहे हैं ॥
मूक होइ बाचाल पंगु चढ़इ गिरिबर गहन ।
जासु कृपा सो दयाल द्रवउ सकल कलिमल दहन ॥
----- ॥ गोस्वामी तुलसी दास ॥ -----
सीख आपनी लीख के, फिरँगी बजाए ढोल ।
लीख पराई सीख तू, फिरता डावाँडोल /199/
भावार्थ : -- अपना ज्ञान लेकर अंग्रेजों का शहजादा तो गृहस्थी बसाए हुवे है |और पराई की लिपि सीख के 'पंजे' का शहजादा बिना लुगाई के मारामारा फिर रहा है ||
माँस खाए करटक होए, मछरी बगुला बंस ।
जोइ जन भए निरामिषे, तोइ कहिलाएँ हंस /200/
भावार्थ : -- मांस खाने वाले को कौवा कहते हैं, मछली खाने वाले को बगुला कहते हैं । किन्तु जो जन निरामिष होते हैं, उन्हें ही हंस कहते हैं ॥
बरत चरित फलिहार कर, राखौ जी के कान /१९१ /
भावार्थ : -- इस संसार में माया रूपी ठेला सजा है जिसमें पँच बड़िया बड़िया व्यंजनों की पंक्तियाँ सजी हैं ( पँच शब्द का प्रयोग सुन्दरता हेतु भी किया जाता है जैसे: --पँच परिधान अर्थात =सुन्दर वस्त्र ) / हमें चाहिए की हम व्रत/उपवास आचरण करते हुवे, केवल फलों का आहार अथवा न्यूनतम आहार ही लें और अपने जीवन की मान-मर्यादा रखें //
लकुटी माया मोहनी, मारे साँटे रोए /
कबहु बसन कबहु बासन , कबहुक सँजोइ जोए /१९२ /
भावार्थ : -- यह गुनिया माया छड़ी के समान है जिसके सोंटे पड़ते ही सांसारिक लोग कभी तो कपड़ों की कभी घर की और कभी सज्जा सामग्री के लिए रोने लगते हैं, अर्थात चाह करने लगते हैं //
माया मूरत मोहनी, सब सों सीस नवाएँ /
मरनी को अमरन करे, सो तो पूज सुहाए /१९३/
भावार्थ : -- माया की यह मूर्ति बड़ी ही मोह कारिणी है, जिसके सम्मुख सभी सिर झुकाते हैं यदि इसमें मृत्यु को अमरत्व में परिवर्तित करने की योग्यता हो ,तो फिर वह पूजा के योग्य है //
एक बीज भुइँ बोवन ते, एक तरुबर उपजाए /
एक साख फर सार गरभ, बहुसह बीज समाए /१९४/
भावार्थ : -- भमि में एक बीज के बोने से ,एक वृक्ष उग जाता है / और उस वृक्ष की एक शाखा के एक सार गर्भित फल में पुन: बहुत सारे बीज समाए होते हैं //
जों जग मनुज देह धरे, लौ सकल रस स्वाद ।
बिषय काम मैं रत रहो, एहि राजन के वाद /195/
भावार्थ : -- यदि संसार में मनुष्य देह मिली है, तो समस्त स्वाद का आनंद लो । एवं भौतिक पदार्थों की और अधिक कामना रखते हुवे "खाओ, पीओ और मौज करो" हमारे राजा का तो यही सिद्धांत है ॥
सागर जोड़ मेघ बने, मेघ जोड़ बन बारि ।
बारि जोड़ जड़ बीज जिए, जोड़ी मैं जिउ धारि /196/
भावार्थ :-- सागर के जुड़ने से ही मेघ बनते हैं, मेघों के जुड़ने से ही वर्षा होती है ॥ वर्षा के जोड़ से ही सुप्त बीज अंकुरित होता है। जोड़ी में रहने से ही प्राणीजगत का अस्तित्व है ॥
राम रमा बन बास के, बात करें सब कोए ।
चार कोस बस चारि के पग में छाले होए /197/
भावार्थ : -- वैदेही एवं श्री राम के वन वास की बाते तो सब बना लेते हैं, केवल चार कोस चलने से ही पाँव में छाले हो जाते हैं ॥ अर्थात : -- "वनवास का जीवन काटना अत्यधिक कठिन है"
पाथर के तौ अंक नहि, चढ़े कैसे पहाड़ ।
बादर के तौ पंख नहि, उड़े गगन कस बाड़ /198/
भावार्थ : -- पत्थर के तो हाथ पैर नहीं है, फिर वो पहाड़ पर कैसे चढ़गए। बादल के तो पंख नहीं है, फिर वे गगन में तेजी से कैसे उड़ रहे हैं ॥
मूक होइ बाचाल पंगु चढ़इ गिरिबर गहन ।
जासु कृपा सो दयाल द्रवउ सकल कलिमल दहन ॥
----- ॥ गोस्वामी तुलसी दास ॥ -----
सीख आपनी लीख के, फिरँगी बजाए ढोल ।
लीख पराई सीख तू, फिरता डावाँडोल /199/
भावार्थ : -- अपना ज्ञान लेकर अंग्रेजों का शहजादा तो गृहस्थी बसाए हुवे है |और पराई की लिपि सीख के 'पंजे' का शहजादा बिना लुगाई के मारामारा फिर रहा है ||
माँस खाए करटक होए, मछरी बगुला बंस ।
जोइ जन भए निरामिषे, तोइ कहिलाएँ हंस /200/
भावार्थ : -- मांस खाने वाले को कौवा कहते हैं, मछली खाने वाले को बगुला कहते हैं । किन्तु जो जन निरामिष होते हैं, उन्हें ही हंस कहते हैं ॥
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