रविवार, 21 जुलाई 2013

----- ॥ दोहा-दशम 18॥ -----

तीन पाँख की तीतरी , चरन धरी तरियाइ । 
लै डूबकी डूब तरी, निकसी धोइ नहाइ ।१८१।  

भावार्थ :-- एक तीतली जिसके तीन पंख हैं तालाब में चरण रख दुबकी लगाते  तैरते हुवे नहा धोकर निकल आई ॥ 
उत्तर = समोसा 

मसि बन घन पत गगन किए आखर धुनी द्यूत । 
भाव अर्थ के बूँद लिए , बारि बरखी चहूँत ।१८२। 
भावार्थ : -- गगन को पृष्ठ बनाया और  मसि (स्याही ) स्वयं बदली बनी , अक्षरों से शब्दों की बिजली बनाई । भाव एवं अर्थों को बूंद बनाए मसि रूपी वर्षा, चारों ओर बरस रही है ॥

रँग गही जूँ मदयंती, पिस पिस पाथर संग । 
पाए मसि पथ पद पंथी , मिस मिस शब्द सुरंग ।१८३। 
भावार्थ : --जैसे पत्थर में पिस पिस कर मेंहदी रँग प्राप्त करती है ॥ लेखनी से लेखक ने भी  शब्दों को मिटा मिटा कर सुन्दर पद प्राप्त किया ।

सैल सील शब्द सुरतत, लेखूँ सौ सौ बार । 
मनो काम गति सथ चरे , कासत कर लै धार ।१८४। 
भावार्थ : -- पाषाण के सदृश्य कठोर एवं शीलवान शब्द को ध्यान कर सौ सौ बार लिखा । किन्तु मन के द्वारा ग्रहण की गई कामनाओं  मन की सरणी में अभिलाषाएँ हाथों को कास कर पकड़ते हुवे साथ चल रही हैं ॥

अंतर चित मैला किये ढूंड रहा भगवान । 
ज्यूँ कस्तूरी नाभि लिए मृग ढूंडे पर थान |185|
भावार्थ : -- अपने अंत:करण को मलिन कर, तू भगवान को ढूंड रहा है । जिस प्रकार कस्तुरी, मृग की नाभि में ही होती है, और वह उसे अन्य स्थानों पर ढूंडता है ॥ 

अर्थात : -- भगवान मनुष्य के अंत:करण में ही समाए हैं । मनुष्य को अंतस मन की मलिनता को शुद्ध करते हुवे, स्वयं का ही अनुकरण कर भगवत प्राप्ति हेतु प्रयासरत रहना चाहिए ॥

शिव जी के स्वरूप सर्प, देखे कंठन बंध । 
तहाँ फिरँगी कापर के, बांधे गल में फंद |186| 

भावार्थ : -- कंठ में सर्प लिए शिव जी का स्वरूप देखकर ही फिरंगियों ने गले में कपडे का फंदा बनाया होगा ॥ 

कान तूल ठुसाए राय, आँखिन कांच चढ़ाए । 
उचक ऊँच उड़ता फिरे, नीचक बात बताए |187|

भावार्थ : -- कानों  में  रूई  ठूंस  कर  और  आँखों  में  कांच चढ़ा कर राजा, उचक उचक कर ऊंचा तो उड़ता फिर रहा है, और बात नीचे की कर रहा है॥

साधु  जन  की  सुख बानी, जैसे गुठली आम । 
सार गर्भ गुण ग्रहन कर, शब्द के लिजै दाम |188| 

भावार्थ : -- बुद्ध-प्रबुद्धों के कहे गए विचार, आम  और  उसकी गुठली के समान होते हैं । उनके वचनों का सार तत्व के गुणों को  ग्रहण  करके  शब्दों  को गुठली के समान रोपित कर नए विचार गढ़े जा सकते हैं ॥ 

जे भवन नाही उपजै, सदगुन धर्म अचार । 
ते भवन जन न जानिबै, का श्रुतिसुख का गार | 189|

भावार्थ : -- जिस घर में सद्गुण एवं धर्म के आचरण उत्पन्न नहीं होते । उस घर के सदस्यों को, श्रेष्ठ वाणी एवं दुर्वचन में अंतर ज्ञात नहीं होता ॥  

ऐतक तापित दिवस मैं, पहिरे कापर मोट । 
देस पराए ए देखि कै, होए हँस लोट पोट |190| 

भावार्थ : -- इतने तपते दिन में भी मोटे मोटे कपड़े पहने हैं । पराए देश के लोग (भारतीयों की) ऐसी वेश भूषा को देख कर हँस हँस के लोट-पोट हो रहे हैं ॥   

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