शुक्रवार, 19 जुलाई 2013

----- ॥ दोहा-दशम 16॥ -----

आरत होए भगति करें , आरत होए बिश्राम । 
आरत आरती जोगती, आरत मुख हरि नाम ।१६१। 
आरत = शान्ति
आर्त = पीड़ा
आरती =ईश्वर की वंदना स्तुति
भावार्थ : -- दुःख /पीड़ा होने पर ही सब भक्ति करते हैं और शान्ति हो जाने पर फिर भूल जाते हैं । इस प्रकार दुःख एवं पीड़ा हो या सुख शांति दोनों ही भक्तों के मुख से आरती और प्रभु के स्मरण की प्रतीक्षा में रहती हैं ॥

गाहे चसत सत चंद्रमा, कहत सबहि भरमाए । 
जुग जुग गगन लगन लहे, असत असित दमकाए /१ ६२ /
भावार्थ : -- सत्य का दिप्तियुक्त चन्द्रमा अस्त हो गया , मति भ्रमित किये सभी ऐसा कहते हैं । यह चन्द्रमा तो युगों से आकाश से संयुक्त है जिसे वह असत्य की काल रात्रि होने पर प्रकाशित कर देता है ॥

लघुमन माही प्रभु बसे, प्रभु मन मह मह भूत । 
जूँ सूता कापर रचे, धूनि अंक जस सूत ।१६३।  
भावार्थ : -- इस लघु अंतर मन में ही उस ईश्वर का वास है और ईश्वर के इस आवास में पञ्च भूत (अर्थात अवनि ,अग्नि, अनिल, अनल एवं अर्ण) का वास है । जिस प्रकार धागों से मिलकर वस्त्र निर्मित होते हैं, और जिस प्रकार  किंचित शब्दों और अंकों से एक वृहत सूत्र निर्मित होता है, उसी प्रकार  पंचभूत से मिलकर
यह शरीर निर्मित होता है ॥

जनक जनी बिन मोल लिए, जनिमन जग जन्माए । 
जीवक जीवन जीउ  पर, कौड़ी मोल बिकाए ।१६४। 
भावार्थ : -- जन्म दाता एवं जन्म दायिनी ने संतानों को इस जगत में कोई मूल्य लिये ही बिना जन्म दिया । किन्तु संतानों ने उस जीवन और उस जीव को कौड़ियों के मूल्य विक्रय कर दिया ॥

बैसे राउ सिंहासन, धरे राँच पट तीर । 
छान बिलग ना कर सके, झूठ सांच के छीर |165| 

भावार्थ : -- राजा सुन्दर पटावार्ण धारण  कर सिंहासन पर तो विराज  गए किन्तु उन्हें झूठ-सच का अलग करना नहीं 
आता ॥  

लागी दिल पे लीजिये, लब पे तिस्न समूँद । 
प्रेम का नाम जापिये, प्रेम ओस की बूँद ।166| 

भावार्थ : -- यदि हृदय पर आसक्ति  हो तो,  अधरों पर समुद्र की सी प्यास लिए प्रेम  का नाम भजते रहिये, क्यों की प्रेम ओस की बूंद के सदृश है, जिसके लिए तो समुद्र  की तृष्णा भी जाग उठती है ॥ 

दान ले के पेट भरे, भरे बहुरि आकंठ । 
भरे नासिक लग अतुरै ,बांधे सौ सौ गंठ |167|

भावार्थ : -- नेता-मंत्री, दान( मत)  ले कर तो पेट भरते हैं, फिर खा  खा  कर  कंठ तक भर  लिया फिर तत्काल ही नासिका भी भर गई, शेष को सौ सौ गांठों में बाँध लिया ॥  

घट घट मैं मंदिर गढ़े, थापे हिय के देव । 
कंठ साँस माल्य चढ़े, आत्मनम स्वमेव |168|

भावार्थ : -- प्रत्येक शरीर देवालय के स्वरूप में रच कर, वहाँ ह्रदय रूपी देव की स्थापना की जिसके कंठ में सांस की मालिका चढा कर ईश्वर/प्रियतम स्वयं आत्म रूप में स्थित हुवे ॥ 

अर्थात : -- "यह आत्मा ही ईश्वर का स्वरूप है" 

धर्म सोई श्रेयस्कर, जो दुःख देय न कोए । 
जामे सकल जीव जगत, सुखसहुँ बासित होए  |169| 

भावार्थ : -- धर्म वही श्रेष्ठतम है,जो किसी को कष्ट नहीं पहुंचाता हो तथा जिसके अनुपालन में  समस्त प्राणी जगत सुखपूर्वक वास करते हों ॥ 

यक्ष प्रश्न = धर्म कौन सा श्रेष्ठ है? 
युधिष्ठिर = जो दुखों से छुटकारा दिलाए । 

जग महँ फुरित रहे सदा सदाचरित के फूर । 
तन मूर्तित छन भंगुर, बही संगम सुदूर |170|

 भावार्थ : -- तन की  रचना का स्वरूप इस प्रकार का है कि यह नश्वर है, जिसके  अस्थि-पुष्प  अन्तत:  प्रयाग  में ही बहेंगे। किन्तु सदाचरण के अस्थि-पुष्प संसार में सदैव प्रफुलित एवं विस्तारित रहेंगे ॥  

अर्थात : -- " उत्तम चरित्र प्रत्येक युग में वंदनीय(पूज्यनीय) है" 

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