फल कै सकल सार गहै , बिय को दैं बिथुराए ।
एक मूल गह फूल फले , कोटिक फल उपजाए ।१५१।
भावार्थ : -- फल का समस्त सार ग्रहण कर उसके बीज को भूमि पर बिखरा देना चाहिए। क्योंकि एक बीज भी यदि जड़ को प्राप्त होकर फलीभूत हो गया तब उसमें बहुतस फल प्राप्त हो सकते हैं ॥
मूड़ मूँडाए मेंडका, बैसा ऊँची साख ।
चरन धरत जँह दुर्जनै लाइ लाइ घर लाख ।१५२।
भावार्थ : -- सिर मूंडा कर मेढक ऊंची शाखा पर बैठा है । क्योंकि जहां दुष्ट जन अपने चरण रखते , वह लाखों घरों में आग लगा देते हैं ॥
मानख माथ तिलक गहे, गह मनि माथ उरंग ।
माया बहुसहि मायाइ, कीन्हिसि एकै अंग ।१५३।
भावार्थ : - मनुष्य के माथे पर तिलक ग्रहण किये है, सर्प अपने मस्तक पर लाल मणि ग्रहण किये है । स्वभाव में दोनों भिन्न हैं दोनों की देहाकृति पृथक हैं । किन्तु माया छल-कपट जानने वाली बड़ी भारी गुनिया है यह दोनों की देहाकृति एक करने में समर्थ होती है एवं मनुष्य को भी सर्प बना देती है ॥
सहाए को की संपदा, सो त बहुराइ जाए ।
सहावै जो सद्भावना, वाके कौन उपाए ।१५४।
भावार्थ : -- किसी की धन संपती सहायता करती है तो वह लौटाई जा सकती है । किन्तु संकटकाल में जब किसी की सदभावनाएँ सहायता करती हैं तो फिर उसके लौटाने का उपाय क्या है.....कोई नहीं ॥
जब हो निओजित लिखनी, जीउति ते लाचार ।
सबद निओजक दीजिये, न दीजै निज विचार |155|
भावार्थ :-- आजीविका से विवश होकर जब लेखनी नियोजित हो,तो नियोजक को शब्द देने चाहिए, अपने विचार नहीं देने चाहिए ॥
अंतर कालोपर कलुष, कागा ही कहिलाए ।
हंस ध्यान भगति बकुल, ताकू का कहिजाए |156|
भावार्थ : -- अंतर भी काला और बाहर भी कलुषित वो अवश्य ही कौआ कहलाता है । किन्तु जो हंस का रूप
वरण कर अंतस में कपट रखता है, उसे क्या कहेंगे ?
धरे अधरन मुकुती को सौ सौ वार फिराउँ ।
प्रियतम के एक दरस पे बलिहारी मैं जाउँ |157|
भावार्थ : -- अधरों पर जो मोती बिखरे हैं वह सारे वार फेरूँ । प्रियतम एक दृष्टि देख लेवें तो में उनपर ही न्यौछावर हो जाऊं ॥
भरे भेष भू भारती, हरी भरी भव भूम ।
सूर अरुन रथ सारथी कहि रहे घूम घूम |158|
भावार्थ : -- सूर्य देव अपने सारथि अरुण के रथ पर विचरण करते हुवे कह रहे हैं: -- भारत की पावन भूमि हरियाली का वेष वरण कर विभूतिमयी हो उठी ॥
अम्बर मौलि मेघ माल, मोती झर झर जाए ।
चुन चुन धरनि धर ढाँके, धौरौहर हरियाए |159|
भावार्थ : - आकाश पर बादलों का समूह आया है जिससे जल कण की बुँदे बरस रही हैं । धरती ने हरियाली की धरोहर स्वरूप सारी बूंदे एकत्रित कर संचयित कर लीं ॥
निर्मल नीर धरा धरे, आपा धरे अगास ।
बाढ़त ऊँचा तरु मरे, जिये कोमली घास |160|
भावार्थ : -- आकाश घमंड/मेघ का तो धरती निर्मल जल की धारक है बाढ़ आने पर ऊँचा घमंडी वृक्ष ही नष्ट होता है, कोमल घास सदा जीवित रहती है ॥
अर्थात : -- " उच्चता में ही विनाश के चिन्ह लक्षित होते हैं,
जबकि विनम्रता अमर होती है"
मूड़ मूँडाए मेंडका, बैसा ऊँची साख ।
चरन धरत जँह दुर्जनै लाइ लाइ घर लाख ।१५२।
भावार्थ : -- सिर मूंडा कर मेढक ऊंची शाखा पर बैठा है । क्योंकि जहां दुष्ट जन अपने चरण रखते , वह लाखों घरों में आग लगा देते हैं ॥
मानख माथ तिलक गहे, गह मनि माथ उरंग ।
माया बहुसहि मायाइ, कीन्हिसि एकै अंग ।१५३।
भावार्थ : - मनुष्य के माथे पर तिलक ग्रहण किये है, सर्प अपने मस्तक पर लाल मणि ग्रहण किये है । स्वभाव में दोनों भिन्न हैं दोनों की देहाकृति पृथक हैं । किन्तु माया छल-कपट जानने वाली बड़ी भारी गुनिया है यह दोनों की देहाकृति एक करने में समर्थ होती है एवं मनुष्य को भी सर्प बना देती है ॥
सहाए को की संपदा, सो त बहुराइ जाए ।
सहावै जो सद्भावना, वाके कौन उपाए ।१५४।
भावार्थ : -- किसी की धन संपती सहायता करती है तो वह लौटाई जा सकती है । किन्तु संकटकाल में जब किसी की सदभावनाएँ सहायता करती हैं तो फिर उसके लौटाने का उपाय क्या है.....कोई नहीं ॥
जब हो निओजित लिखनी, जीउति ते लाचार ।
सबद निओजक दीजिये, न दीजै निज विचार |155|
भावार्थ :-- आजीविका से विवश होकर जब लेखनी नियोजित हो,तो नियोजक को शब्द देने चाहिए, अपने विचार नहीं देने चाहिए ॥
अंतर कालोपर कलुष, कागा ही कहिलाए ।
हंस ध्यान भगति बकुल, ताकू का कहिजाए |156|
भावार्थ : -- अंतर भी काला और बाहर भी कलुषित वो अवश्य ही कौआ कहलाता है । किन्तु जो हंस का रूप
वरण कर अंतस में कपट रखता है, उसे क्या कहेंगे ?
धरे अधरन मुकुती को सौ सौ वार फिराउँ ।
प्रियतम के एक दरस पे बलिहारी मैं जाउँ |157|
भावार्थ : -- अधरों पर जो मोती बिखरे हैं वह सारे वार फेरूँ । प्रियतम एक दृष्टि देख लेवें तो में उनपर ही न्यौछावर हो जाऊं ॥
भरे भेष भू भारती, हरी भरी भव भूम ।
सूर अरुन रथ सारथी कहि रहे घूम घूम |158|
भावार्थ : -- सूर्य देव अपने सारथि अरुण के रथ पर विचरण करते हुवे कह रहे हैं: -- भारत की पावन भूमि हरियाली का वेष वरण कर विभूतिमयी हो उठी ॥
अम्बर मौलि मेघ माल, मोती झर झर जाए ।
चुन चुन धरनि धर ढाँके, धौरौहर हरियाए |159|
भावार्थ : - आकाश पर बादलों का समूह आया है जिससे जल कण की बुँदे बरस रही हैं । धरती ने हरियाली की धरोहर स्वरूप सारी बूंदे एकत्रित कर संचयित कर लीं ॥
निर्मल नीर धरा धरे, आपा धरे अगास ।
बाढ़त ऊँचा तरु मरे, जिये कोमली घास |160|
भावार्थ : -- आकाश घमंड/मेघ का तो धरती निर्मल जल की धारक है बाढ़ आने पर ऊँचा घमंडी वृक्ष ही नष्ट होता है, कोमल घास सदा जीवित रहती है ॥
अर्थात : -- " उच्चता में ही विनाश के चिन्ह लक्षित होते हैं,
जबकि विनम्रता अमर होती है"
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