अज्ञानी के दुर्बादन, जूँ बालक के गार ।
अंतर मति अँधियार किए, बाहिर उजरी चाम ।
सुथरे कापर पहिर लिए सेवा चौगुन दाम । 145।
कहत साधौ ऐसन को, मांगे दौ ना भीख । देख दुआरि भेरि लियो, गाँठन बाँधे सीख । 146।
भावार्थ : -- अंतर मन की बुद्धि में अन्धेरा कर लिया, और "सौंदर्य आवरिका" में जा जा कर चमड़ी उजली कर ली । उसपर उज्जवल वस्त्र धारण कर अब सेवा के चार गुने दाम मांग रहे है । 1 ।
भावार्थ : -- साधू सज्जन कहते हैं कि ऐसे लोग तुमसे किसी भी प्रकार की भीख मांगे तो मत दो यह शिक्षा लेते हुवे उन्हें तो देखते ही अपने घर के द्वार बंद कर दो । 2 ।
बैठा कागा भीत पर, ढोल नगाढ़े संग ।
धरे अधर फर निबौली, रागे करुवर रंग । 147।
लिखनी लाख लेख लिखे, लिखे न जन की लीख ।
ताकी तेते लोग लखै, जाकी जेती दीख । 148।
भावार्थ : --ढोल नगाढ़े लेकर, भीत पर कौआ बैठा है । उसके मुँह में तो जैसे निम्बौली रखी है तभी तो ऐसे कड़वे राग अलाप रहा है । 1 ।
भावार्थ : -- लिखनी से तो लाखों लेख लिख दिए, किन्तु जनमानस की भाषा नहीं लिखी । जिसकी दृष्टि जहां तक होती है, उसके दर्शक भी वहीँ तक होते हैं ।२ ।
पोथी पानि मसि पन पनि , पत पंगत दिए हाँक
शब्द मुकुता मोल लिए, भाव कहे सो राख /१४९ /
पोथी पानि मसि पन पनि, पत पंगत लिए हाँक /
शब्द मुकुता मोल दिए,भाव लहे सो लाख /१५० /
भावार्थ : -- पोथी, हाट है और लेखक हटवार जो पृष्ठों की पंक्तियाँ रखे हांक लगा रहा है जैसे कि: -- 'शब्द ले लो शब्द', मुंह बोले भाव देकर शब्दों के कुछ मोती मोल लिए |
पोथी हाटहै और लेखक हटवार जो पृष्ठों की पंक्तियाँ रखे हांक लगा रहा है जैसे कि: -- 'शब्द ले लो शब्द' / शब्दों के कुछ मोती मोल दिए और भाव मिला वो बहुंत अधिक था |
कास कुटिल कर कानन्हि , फटकारत दुइ धार ।१४१।
भावार्थ : -- अज्ञानी के निंदा वचन ऐसे होते हैं जैसे बालकों की गालियां । समझाने से समझ आए तो ठीक, नहीं समझ आए तो कान को कस कर टेड़ा करते हुवे फटकार कर दो थप्पड़ देकर उन्हें सुधारें॥
अज्ञानी के दुर्बादन, जूँ बालक के गार ।
दुर्बिदाह मन नाहरै, तन तन तीन पहार ।१४२।
भावार्थ : -- अज्ञानी के निंदा वचन बालक की गाली के जैसे होते हैं जिन्हें सुधारना सरल है । किन्तु अर्धज्ञानी अर्थात जो किंचित ज्ञान पर ही इतरा बैठा हो उसका मन तो राजा है और तन, सरयूपारी द्विज के तीन गोत्रों गर्ग,गौतम और शांडिल्य के समुदाय रूपी तीन पहाड़ों के ज्ञान से भी सर्वोच्च स्वरूप में तना रहता है, ऐसों को सुधारना कठिन है ॥
दाता कुटुम समाय गए, भूखनहु तोषन पाए ।
एक टूक खावै स्वान , एक खाई गौ माए |143|
भावार्थ : -- दाता ने इतना दिया की कुटुंब समा गया, भूखा भी तृप्त हुवा । एक टुकडा स्वान को मिला, एक गौ माता को अर्पित हुवा ॥
भावार्थ : -- कुछ समय के लिए भगवान का नाम लिया, कुछ समय ग्रहस्थ जीवन को दिया । कर्मनिष्ठ होकर जीवन कर्त्तव्य पूर्ण कर, शेष समय विश्राम किया ॥
दाता कुटुम समाय गए, भूखनहु तोषन पाए ।
एक टूक खावै स्वान , एक खाई गौ माए |143|
एक पहर हरि नाम लिये, एक दीन्ह गह धाम ।
कर्मठ करतब कारि कै, सेष करे बिसराम |144|
भावार्थ : -- कुछ समय के लिए भगवान का नाम लिया, कुछ समय ग्रहस्थ जीवन को दिया । कर्मनिष्ठ होकर जीवन कर्त्तव्य पूर्ण कर, शेष समय विश्राम किया ॥
अंतर मति अँधियार किए, बाहिर उजरी चाम ।
सुथरे कापर पहिर लिए सेवा चौगुन दाम । 145।
कहत साधौ ऐसन को, मांगे दौ ना भीख । देख दुआरि भेरि लियो, गाँठन बाँधे सीख । 146।
भावार्थ : -- अंतर मन की बुद्धि में अन्धेरा कर लिया, और "सौंदर्य आवरिका" में जा जा कर चमड़ी उजली कर ली । उसपर उज्जवल वस्त्र धारण कर अब सेवा के चार गुने दाम मांग रहे है । 1 ।
भावार्थ : -- साधू सज्जन कहते हैं कि ऐसे लोग तुमसे किसी भी प्रकार की भीख मांगे तो मत दो यह शिक्षा लेते हुवे उन्हें तो देखते ही अपने घर के द्वार बंद कर दो । 2 ।
बैठा कागा भीत पर, ढोल नगाढ़े संग ।
धरे अधर फर निबौली, रागे करुवर रंग । 147।
लिखनी लाख लेख लिखे, लिखे न जन की लीख ।
ताकी तेते लोग लखै, जाकी जेती दीख । 148।
भावार्थ : --ढोल नगाढ़े लेकर, भीत पर कौआ बैठा है । उसके मुँह में तो जैसे निम्बौली रखी है तभी तो ऐसे कड़वे राग अलाप रहा है । 1 ।
भावार्थ : -- लिखनी से तो लाखों लेख लिख दिए, किन्तु जनमानस की भाषा नहीं लिखी । जिसकी दृष्टि जहां तक होती है, उसके दर्शक भी वहीँ तक होते हैं ।२ ।
पोथी पानि मसि पन पनि , पत पंगत दिए हाँक
शब्द मुकुता मोल लिए, भाव कहे सो राख /१४९ /
पोथी पानि मसि पन पनि, पत पंगत लिए हाँक /
शब्द मुकुता मोल दिए,भाव लहे सो लाख /१५० /
भावार्थ : -- पोथी, हाट है और लेखक हटवार जो पृष्ठों की पंक्तियाँ रखे हांक लगा रहा है जैसे कि: -- 'शब्द ले लो शब्द', मुंह बोले भाव देकर शब्दों के कुछ मोती मोल लिए |
पोथी हाटहै और लेखक हटवार जो पृष्ठों की पंक्तियाँ रखे हांक लगा रहा है जैसे कि: -- 'शब्द ले लो शब्द' / शब्दों के कुछ मोती मोल दिए और भाव मिला वो बहुंत अधिक था |
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