मंगलवार, 16 जुलाई 2013

----- ॥ दोहा-दशम 13॥ -----

कनक कनक मिलाए लौन , हरिना मनि हरियार । 
जोग परै तौ मधुराए, बहुलै करुबर खार ।१३१। 

हरिना = पीलापन लिए हुवे 

मनि =शोभा =हल्दी 
हरिन्मणि = पन्ना ,मरकत मनि 
भावार्थ : -- आटे में हल्दी से पीलापन ग्रहण की हुई  हरी तरकारियों में यथोचित नमक हो तो वे स्वादिष्ट लगती हैं और सोने में हरे रंग की आभा देता हुवे पन्ने की लावण्यता का मिश्रण  यदि यथोचित हो तो सोना सुन्दर लगता है किन्तु अधिक हो तो दोनों ही कड़वे और कसैले लगते हैं ॥

माया   के  भगवान  कौ , चाहे  सब  संसार । 
तिनको चहना चाहिये, ज्ञान गमन गुन सार ।१३२।  
भावार्थ :-- कलुषित कर्म जनित धन के धनवानों का सम्मान सभी जन करता है । ऐसे जनों को केवल ज्ञान विषयों के सार तत्त्वों की अभिलाषा करनी चाहिए ॥
अर्थात : -- मनुष्य ही समय का रचनाकार है, लब्ध प्रतिष्ठित व्यक्तियों के कु एवं सुविचारों से समस्त जन प्रभावित होते हैं यही विचारभिव्यक्तियाँ समय की  शिल्पी हैं । जनसामान्य को चाहिए कि वे केवल ज्ञान वान  व्यक्तियों के श्रेष्ठ विचारों को ही आत्मसात करते हुवे समय के सूत्रधार स्वयं बने ॥

दान कृतकर होत तहाँ , जहां दया के जोग । 
कुकृत तज तिन्ह दाइया , दया जोग जौ लोग  ।१३३। 
भावार्थ : -- जहां दया का योजन या भाव होता है तथा पाप युक्त निकृष्ट कर्मों का त्याग कर जो दया के योग्य व्यक्तियों को दिया जाए वह दान पुण्यमय व् मंगलकारी होता है 

लख चौरासी जोनिहि पर, मानख जीवन पाए ।
ऐसो काज कर राखिए, परम गतिहि गहियाए  /134/

भावार्थ : -- चौरासी लाख योनियों में भटकने के पश्चात यह मानव योनि प्राप्त हुई है ।इस  श्रेष्ठ योनि  में ऐसे कार्य कर संजोने चाहिए, जिससे मृत्यु पश्चात यह शरीर परम गति को प्राप्त हो ॥  

सरसई  के असीस सन वादन रागे रंग । 
कंठ कल रव नाद गहे, सबद सूक्ति प्रसंग |135| 

भावार्थ : -- श्री सरस्वती के आशीर्वाद ही से वाद्य यन्त्र आकर्षक स्वर उत्पन्न करते हैं, कंठ श्रुतिमधुर कोमल, मंद ध्वनी का आनंद देते हैं, और शब्द सूक्ति स्वरूप में प्रासंगिक होते हैं ॥ 

स्वर माया अनुपम भइ वादन का कहि जाए । 
दुर्वादनहू गाउते , मधुकर सरिस सुहाए |136| 

भावार्थ : - स्वरों की माया अद्भुत है, और वाद्य यंत्रों का तो क्या कहना । यदि उनके साथ निन्दित वचन गाए जाएँ तो वह भी भँवरे की गुंजार के सदृश सुहावने प्रतीत होते हैं ॥   

जल पावत पत  हरियरे, पुहुपहु रागे रंग । 
वादन ते सुर रसमसे ,  कल कविता के संग |137|

भावार्थ : - जिस प्रकार जलकणों को प्राप्त कर पत्तों में हरियाली छा जाती है और पुष्प रंग  युक्त होकर आकर्षक हो जाते हैं, उसीप्रकार वाद्य यन्त्र व् श्रुतिमधुर कविता के साथ स्वर भी रसमय हो जाता है ॥ 

वादन के डोरी संग, सबद मनीच पिरोए । 
सात सुरन के गाँठि दए, घारे कंठन कोए |138| 

भावार्थ : - वाद्य यंत्रों के तारों में शब्दों के पुष्प या मोती पिरोकर,फिर उसे सप्त स्वर के गांठों से बाँध, किसी के कंठ में उतार देना,यही संगीत है ॥ 

चाहे मनीच पिरोइए, चाहे मानिक लाल ।
जेते रतनन पोइये, कहिलावै सो माल |139-क || 


चाहे राजा रंक कइँ चाहे धनि कर काए | 
चाहे दारिद कि न भई अंत काल बिनसाए || १३९-ख || 
भावार्थ : -- पुष्प पिरोये, चाहे मोती पिरोय, चाहे माणिक्य लाल ही क्यों न पिरोय  ।कितने ही रत्न पिरोये   अन्तत: वह माला ही कहलाएगी | 
उसी प्रकार चाहे वह निर्धन की हो अथवा धनवान की या राजा की हो अथवा भृत्य की होती अन्तत: नश्वर काया ही है ॥ 

जो बिय बोवै प्रीत के, लाहै लोहित फूल । 
जे बिय बिए बिपरीत के,पावै सो तो सूल  |140|

भावार्थ : -- यदि प्रेम के बीज बोयेंगे तो सुन्दर लाल पुष्प प्राप्त होंगे । किन्तु जो विपरीत अर्थात घृणा के बीज बोवेंगे तो उन्हें कांटे ही मिलेंगे ॥  

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