शनिवार, 13 जुलाई 2013

----- ॥ दोहा-दशम 10॥ -----

मंदर मसीद माँगता, अल्लाह के सबूत । 
वाका जात बूझा तौ, खाया दौ सौ जूत ।१०१। 
भावार्थ : -- मंदिर मस्जिद में भगवान के होने का प्रमाण माँगता है । जब भगवान ने उसकी उत्पत्ति के प्रमाण मांगे तो बता नहीं पाया और दो सौ जूते खाया ॥ 

मद मुदित मति भूस भरे, देही दंभ दँबारि । 
बर बचन के वात धरे, अगन समन कहुँ धारि ।१०२।
भावार्थ : -- घमंड से चूर होकर मस्तिष्क में तो भूसा भर लिया और दंभ से देह को दावानल कर ली । बड़े बड़े बोलों की हवा धर ली, ये बता कहीं अग्नि शामक भी रखा है की नहीं ॥

मेरो   जी   मेरो   होए,   तेरो    तेरो   होए । 
दौनौ काल लै गयो, कौतुक केलि बिगोए ।१०३।   
भावार्थ : -- मेरा जी मेरा हुवा तेरा जी तेरा हुवा  । मरनी आई और ये तेरा मेरा का सारा खेल कौतुहल बिगाड़ के दोनों जी को अपने साथ ले गई ॥

काल चरित्तर गुनीये , पापी बहु चंडाल । 
कामिनि कंचन देहि कौ, लै जावैगा काल ।१०४। 
भावार्थ : -- काल के चरित्र को किंचित समझिये ये तो पापी और बहुंत ही चंडाल है । तेरी कोमल सी, कमनीय सी, कंचन सी काया को कल यह ले जाएगा ॥

गुरु मूसल सिस ओखरी, कन कन शब्द समाए ।
धौके धनकन सार लिए, थोथा दिये उड़ाए | 1 0 5 | 

भावार्थ : -- यदि गुरु मूस्ली है तो शिष्य ओखली है, और शिष्य के शब्द अनाज के  कण हैं । प्रहार करने पर सार कण तो प्राप्त हो जाते हैं और सार रहित आवरण मुसल द्वारा उड़ा दिया जाता है ॥ 

सात  सागर सरिल भरे, केहि काम नहि आए । 
तापस संग ताप धरे, उर अम्बर पर छाए | 1 0 6 |  

भावार्थ : -- सात समुद्र में जल ही जल भरा है, किन्तु खारा  होने कारण वह संसार मेंइसका उपयोग नहीं होता है किन्तु जब यह जल सूर्य का ताप ग्रहण करता है तो यही जल काश के हृदय में व्याप्त होकर जीवन स्वरूप हो जाता है  ॥ 

उसी प्रकार : -- "व्यक्तित्व तभी प्रभावशाली एवं सदात्म स्वरूप होकर संसार का कल्याण करता है , जब वह काष्टार्जित हो" 

नैन पलक ते ढाँप लिए, ऊँगरी दिये कान ।
रदन छादन सियत कहे, मैं हूँ मंत प्रधान |107 |

भावार्थ : -- आँख को तो पलकों से ढांक लिया  कानो में ऊँगली दे दी, मुख को होठ से सी कर कहते हैं मैं हूँ महामात्य !
 अब ये न पूछियो कि फिरंगियों ने भारत पर डेढ़ सौ सालों से भी अधिक राज कैसे कर लिया जब ऐसे नमूने मूरख शासक, उद्योगपति आदि आदि के हाथ देश  होगी तो डेढ़ सौ तो क्या सदियों तक राज किया जा सकता है ॥ 

गरजि गरजि नभ घन आए, आया संग चुनाव  । 
मंडुक मोरी में फिरे, शासक नगरी गाँव | 108 | 

भावार्थ : -- ढोल नगाढ़े बजाते हुवे बादल आ गए, साथ में चुनाव भी आ गया । मेंढक तो नाली में घूम रहा है, और शासक  गाँव और नगर में फिर रहे हैं ॥ 

अर्थात : --मेढक बाहर तभी निकलता है जब वर्षा  ऋतु आती है, और शासक या शासन  के  महत्वाकांक्षी बाहर तभी निकलते हैं जब चुनाव आता है अत: आप  किसी के बहकावे में न आएं यहाँ तक की  समाचार  साधनों  के  भी नहीं और अपने मत का हीरा गाँठ लगा कर अपने-अपने कार्य में लगे रहें ॥ 

कारूक अस काया गढ़ी  जैसे काचा कुंभ ।
रुधिर के तौ तरल भरे, छन में होए निशुंभ /109/ 
भावार्थ : -- विधाता ने काया को ऐसे रचा है जैसे यह कोई मिट्टी  की मटकी हो ।जिसमें जल स्वरूप रुधीर भर दिया, और मटकी जैसे ही यह पलभर में ही विषम हो जाती है ॥

आज मुये कल दुजा दिन, तान चदरिया सोए ।
आज कल लागत दीठे, आठ आठ अश्रु रोए /110/

भावार्थ : -- मृत्यु के बाद की स्थिति की और ध्यान न देते हुवे, जीवन का आनंद लेते रहे । और जब मृत्यु पास आई तो पूर्व करनी का स्मरण कर विलाप करने लगे ॥ 

निर्मम के रे करतली दाया मत का हीर | 
सो तो कसाई कर कस दावै जी को पीर || 
भावार्थ : -निर्मम निर्दयी के करतल में अपने मत का हीरा रख दिया देखो जिसको तुमने मत देकर सिहांसन का सुख दिया  वह कैसे कसाइयों के हाथों जीवों को कष्ट दे रहा है | 

जी तो सबके भीत है सबके भीतर प्रान | 
मार सबहि कहुँ पीर दए गहे सबकी देह समान || 
भावार्थ : - जी तो सबके भीतर है प्राण भी सबके भीतर होते हैं | चोट तो सबको पीड़ा देती है लाल रक्त धारण किए देह तो सबकी एक समान होती है पशु को इसलिए पीड़ा देते हो क्योंकि भगवान ने उसे वाणी नहीं दी वह तुम्हे कुछ बोल नहीं सकता | 



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