नभ में सीतल चन्द्रमा, तासे सीतल हेम।
क्रोध अगन बुझावै तौ, सबसे सीतल प्रेम || १ ||
भावार्थ -- नभ में स्थित चन्द्रमा अत्यधिक शीतल है उससे भी शीतल हिम(बर्फ) है । यदि क्रोध की लगाई आग बुझाने में समर्थ हो तो, प्रेम उससे भी शीतल कहलाता है ॥
अग्यानी का अभिमान, जूँ रावन के सीस ।
गिरे बिनिइत बानी के बान लगे जब तीस || २ ||
भावार्थ : - अज्ञानी का घमंड रावण के शीश के सदृश्य हैं । जब विनम्र वाणी के तीस बाण उसका लक्ष्य करते हैं तो ये स्वत: ही नीचे आ गिरते हैं ॥
दूध मिलाई जोर के, जोरन दिये जमाए ।
सुथरे सुत माखन मिले, बिगरे काम न आए || ३ ||
भावार्थ : -- जिस प्रकार दूध की मलाई जोड़ कर फिर जोरण दे कर उसे जमाया जाता है उसी प्रकार पुत्र के गुणों को भी संचित कर उसे बढ़ावा दिया जाता है । सब कुछ ठीक रहा तो मलाई से नवनीत प्राप्त होगा और पुत्र के गुणों से सुख प्राप्त होगा, किन्तु बिगड़ने पर दोनों ही किसी काम के नहीं रहेंगे ॥
धरनी खोद खावन मैं, आगिन आगिन धाए ।
सुरुज मंडल बिँधन माहि , रहे रहा पिछवाए ।४।
चंदा सों लटकाए तू मंगल में भटकाए ||
अब लगि सुरुज मण्डलु मैं रहे रहिए अटकाए || ४-ख ||
एहि धरनि पाछे जेतक गई नहीं खंदाए |
कुल सत बरिस माहि ताहि खोदि खोदि करि खाए || ४-ग ||
खोदत खोदत असि त रे जावेगी बिरताइ |
चिड़िया चुगते होत का पुनि पाछे पछिताइ || ४ -घ ||
भावार्थ : -- रे मनुष्य ! धरती खंदक कर खादन में तो तेरी गति अति तीब्र है इसे खाने में तू आगे आगे दौड़ रहा है किन्तु शौर्य मंडल से बहिर्गमन हेतु तेरी गति अतिशय धीमी है चाँद पर तो तू लटका हुवा है, मंगल में भटका हुवा है और शार्या मंडल में अटका है । जितनी धरती तूने पिछले सौ सालों में खोद खोद कर खाई उतनी तेरे पूर्वजों ने सृष्टी सृजन से अब तक नहीं खोदी न खाई , यदि यह इसी प्रकार उत्खादित होती रही तो समाप्त हो जाएगी और तू शौर्य मंडल में ही अटके रह जाएगा | रे मनुष्य ! चिड़िया के खेत चुगने के पश्चात पश्चाताप करने से कुछ लाभ नहीं होता ॥
परख बहुतहि चुगु बिन कै बिचारु बिअ बिथुराए ।
कोउ बिकसे काल परे, कोउ काल अपराए | ५ |
भावार्थ : -- अत्यंत परिसखान के पश्चात विचारों के उत्तम उत्तम बीज बिखराए हैं । इनमें से कुछ बीज त समयपर ही अंकुरित हो जाएंगें, कुछ को अंकुरित होने में समय लगेगा ॥
धन देइ के नेहि रूप , माया सरूप कराल ।
या कर खेह गह कन कन, या कर परै अकाल | ६ |
भावार्थ : - धन की देवी का रूप अत्यंतस्नेही है और माया का स्वरूप अति विकराल है । धन की देवी के हाथों से खेत अधनधान्य से परिपूर्ण हो जाता है विकराली माया के हाथों से वह अकाल को प्राप्त होता है ॥
पेट जूँ भँवरी सों हो, भँवर लेउँ मैं पीठ ।
ना रस लूँ मैं चिरपरा, ना रस लूँ मैं मीठ | ७ |
भावार्थ : -- उदर यदि भँवरा के सरिस हो जाए तो में इसे पीछे घुमा लूँ । फिर ना तो लावण्यता का मिठास चखूँ और ना ही मधुरता का लावण्य रखूँ ॥
अपुनै कलुष सँवार कै, अपुनै मुख उघराएँ ।
आप कहु मधुर कहै, पराए लोन लगाएँ | 8 |
भावार्थ : -- अपने पाप कर्म को संवार कर अपने ही मुख से कहने चाहिए । स्वयं के मुख से कहे हुवे पाप कर्म भी मधुरता उत्पन्न करेंगें अन्य का मुख इसे बड़ा चढ़ा कर कहेगा ॥
पाथ मिले पहाड़ रचे, पद पद पथतर खाँच ।मिलत मसि धानी पथ मुख, पत पत को दिए राँच । ९ ।
भावार्थ : -- आदि कवि ब्रम्हा जी को जब जल, वायु एवं अग्नि ( सूर्य) प्राप्त हुवे तो उन्होंने चरण-चरण पर पत्रों को खचित करते हुवे पहाड़ रच दिए जैसे ही पथ के मुहाने पर मसि धानी मिली तो पत्तों पत्तों को रंग दिया ॥उसी प्रकार साहित्यकारों ने भी साधन उपलब्ध होते ही, पत्थर मिले तो पत्थर को चिन्हांकित करदिया पहाड़ मिले तो पहाड़ पर चिन्ह उकेर कदिए, जैसे ही मसि पथ धानी से परिचय हुवा तो पत-पत्रों को रच दिया अब यह संगणक मिला है !
गहन गहन गहिअ घन कर, कापर डोरी बाँध ।
अरन कौ बरन करै सो, सूरज हसि की चाँद । १ ० ।
भावार्थ : -- गहरे जल में डूबकी लगाते मेघ रूपी वस्त्रों की रश्मियाँ बांधे नीर को वरण करता हुवा यह सूर्य है, अथवा चाँद ?
क्रोध अगन बुझावै तौ, सबसे सीतल प्रेम || १ ||
भावार्थ -- नभ में स्थित चन्द्रमा अत्यधिक शीतल है उससे भी शीतल हिम(बर्फ) है । यदि क्रोध की लगाई आग बुझाने में समर्थ हो तो, प्रेम उससे भी शीतल कहलाता है ॥
अग्यानी का अभिमान, जूँ रावन के सीस ।
गिरे बिनिइत बानी के बान लगे जब तीस || २ ||
भावार्थ : - अज्ञानी का घमंड रावण के शीश के सदृश्य हैं । जब विनम्र वाणी के तीस बाण उसका लक्ष्य करते हैं तो ये स्वत: ही नीचे आ गिरते हैं ॥
दूध मिलाई जोर के, जोरन दिये जमाए ।
सुथरे सुत माखन मिले, बिगरे काम न आए || ३ ||
भावार्थ : -- जिस प्रकार दूध की मलाई जोड़ कर फिर जोरण दे कर उसे जमाया जाता है उसी प्रकार पुत्र के गुणों को भी संचित कर उसे बढ़ावा दिया जाता है । सब कुछ ठीक रहा तो मलाई से नवनीत प्राप्त होगा और पुत्र के गुणों से सुख प्राप्त होगा, किन्तु बिगड़ने पर दोनों ही किसी काम के नहीं रहेंगे ॥
धरनी खोद खावन मैं, आगिन आगिन धाए ।
सुरुज मंडल बिँधन माहि , रहे रहा पिछवाए ।४।
चंदा सों लटकाए तू मंगल में भटकाए ||
अब लगि सुरुज मण्डलु मैं रहे रहिए अटकाए || ४-ख ||
एहि धरनि पाछे जेतक गई नहीं खंदाए |
कुल सत बरिस माहि ताहि खोदि खोदि करि खाए || ४-ग ||
खोदत खोदत असि त रे जावेगी बिरताइ |
चिड़िया चुगते होत का पुनि पाछे पछिताइ || ४ -घ ||
भावार्थ : -- रे मनुष्य ! धरती खंदक कर खादन में तो तेरी गति अति तीब्र है इसे खाने में तू आगे आगे दौड़ रहा है किन्तु शौर्य मंडल से बहिर्गमन हेतु तेरी गति अतिशय धीमी है चाँद पर तो तू लटका हुवा है, मंगल में भटका हुवा है और शार्या मंडल में अटका है । जितनी धरती तूने पिछले सौ सालों में खोद खोद कर खाई उतनी तेरे पूर्वजों ने सृष्टी सृजन से अब तक नहीं खोदी न खाई , यदि यह इसी प्रकार उत्खादित होती रही तो समाप्त हो जाएगी और तू शौर्य मंडल में ही अटके रह जाएगा | रे मनुष्य ! चिड़िया के खेत चुगने के पश्चात पश्चाताप करने से कुछ लाभ नहीं होता ॥
परख बहुतहि चुगु बिन कै बिचारु बिअ बिथुराए ।
कोउ बिकसे काल परे, कोउ काल अपराए | ५ |
भावार्थ : -- अत्यंत परिसखान के पश्चात विचारों के उत्तम उत्तम बीज बिखराए हैं । इनमें से कुछ बीज त समयपर ही अंकुरित हो जाएंगें, कुछ को अंकुरित होने में समय लगेगा ॥
धन देइ के नेहि रूप , माया सरूप कराल ।
या कर खेह गह कन कन, या कर परै अकाल | ६ |
भावार्थ : - धन की देवी का रूप अत्यंतस्नेही है और माया का स्वरूप अति विकराल है । धन की देवी के हाथों से खेत अधनधान्य से परिपूर्ण हो जाता है विकराली माया के हाथों से वह अकाल को प्राप्त होता है ॥
पेट जूँ भँवरी सों हो, भँवर लेउँ मैं पीठ ।
ना रस लूँ मैं चिरपरा, ना रस लूँ मैं मीठ | ७ |
भावार्थ : -- उदर यदि भँवरा के सरिस हो जाए तो में इसे पीछे घुमा लूँ । फिर ना तो लावण्यता का मिठास चखूँ और ना ही मधुरता का लावण्य रखूँ ॥
अपुनै कलुष सँवार कै, अपुनै मुख उघराएँ ।
आप कहु मधुर कहै, पराए लोन लगाएँ | 8 |
भावार्थ : -- अपने पाप कर्म को संवार कर अपने ही मुख से कहने चाहिए । स्वयं के मुख से कहे हुवे पाप कर्म भी मधुरता उत्पन्न करेंगें अन्य का मुख इसे बड़ा चढ़ा कर कहेगा ॥
पाथ मिले पहाड़ रचे, पद पद पथतर खाँच ।मिलत मसि धानी पथ मुख, पत पत को दिए राँच । ९ ।
भावार्थ : -- आदि कवि ब्रम्हा जी को जब जल, वायु एवं अग्नि ( सूर्य) प्राप्त हुवे तो उन्होंने चरण-चरण पर पत्रों को खचित करते हुवे पहाड़ रच दिए जैसे ही पथ के मुहाने पर मसि धानी मिली तो पत्तों पत्तों को रंग दिया ॥उसी प्रकार साहित्यकारों ने भी साधन उपलब्ध होते ही, पत्थर मिले तो पत्थर को चिन्हांकित करदिया पहाड़ मिले तो पहाड़ पर चिन्ह उकेर कदिए, जैसे ही मसि पथ धानी से परिचय हुवा तो पत-पत्रों को रच दिया अब यह संगणक मिला है !
गहन गहन गहिअ घन कर, कापर डोरी बाँध ।
अरन कौ बरन करै सो, सूरज हसि की चाँद । १ ० ।
भावार्थ : -- गहरे जल में डूबकी लगाते मेघ रूपी वस्त्रों की रश्मियाँ बांधे नीर को वरण करता हुवा यह सूर्य है, अथवा चाँद ?
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