बुधवार, 31 जुलाई 2013

----- ॥ दोहा-दशम 31॥ -----

जोग परे तब मुखरिते, आपन कर के काम  /
काई काल कल कवलिते , रहि जग केवल नाम /३११ /
भावार्थ : -- अवसर पड़ने पर अपने द्वारा किये गए कार्य ही शब्दायमान होते हैं /काया , कल काल कवलित हो जाएगी अर्थात अर्थात यह शरीर आने वाले समय में नष्ट हो जाएगा , संसार में केवल नाम ही रह जाएगा 

अर्थात : --अब यदी संविधान में कोई समस्या आ गई तो समाधान कौन करेगा, क्योंकि इसके रचनाकार तो निर्जीव हो चुके हैं 

साँचे पटका देइ के  , झूठ ढका ना जाए /
ए पट ऐसो करमनै , पार पार दरसाए  /३१२ /
भावार्थ : -- सत्य के आवरण  में असत्य को ढका नहीं जा सकता /सत्यता का आच्छादन इस प्रकार के कपडे से बुना हुवा होता है कि जिसके आर-पार देखा जा सकता है //

अर्थात : --"सत्य के स्पर्श से, असत्य को सत्य सिद्ध नहीं किया जा सकता "

झूठा पुतरा झोर दै , लांबा पुल बँधाए /
सच के जुग लगाईं कै,छल छाया दरसाए /३१३ /
भावार्थ : -- निरंतर झूठ बोलने वाले ने , नाप से भी बड़ा होने के कारण झूलता हुवा ,झूठ का एक पुल बनाया, जिसमें सच के जोड़ लगा दिए, और अपना कपट जाल दिखलाया /

अर्थात : -- "निन्यानवे झूठों को एक सच के द्वारा जोड़ा नहीं जा सकता,क्योंकि झूठ सच को भी शुन्य के बराबर कर देता है "

सुदामा अन बैर पड़े, मँगे किसन धन धान  /
ज्ञान भान धन माँगते, रही जाते सनमान /३१४ /
भावार्थ : -- सुदामा से जब अन्न देव रूठ गए तब उन्होंने  भगवान कृष्ण से धन संपदा  की मांग की /यदि सुदामा ने धन अर्जित करने के ज्ञानबोध की मांग की होती तो उनका सम्मान रह जाता //

एक झूठ के धार धरे दूजन झूठ अधार । 
एक पाप दुआरि खोरे दूजन  पाप दुआर /315/ 

भावार्थ : -- एक झूठ के आधार पर, दुसरा झूठ आधारित हो जाता है । पाप का एक द्वार,  दुसरे पाप के द्वार को भी खोल देता है । 

मानस पाँच भूतिक सन बाँधे जी अजहूँन । 
काल ले उड़ाहि एक दिन साँस साँस कौ  चून /316/

भावार्थ : -- मनुष्य का शरीर पंचभूत के साथ जीवन को आज तो बंधा है,किन्तु एक दिन मृत्यु आएगी, और समस्त सांस को उड़ा कर ले जाएगी ॥ 

भगत भजन पूजन करे प्रभु मैं चित्त रमाए । 
ऐसो कारजु कीजिये प्रभु तुझ में रलियाए /317/ 

भावार्थ : -- हे भगत ! तू भजन पूजा करके, भगवान में चित्त लगाता है ॥ ऐसा कार्य कर कि,  स्वयं भगवान तुझमें चित्त लगाए ॥ 

नारी उदरन ते जने बाढ़े पयसन धार । 
जीवन जाके कारने ताके देवें गार /318/ 

भावार्थ : -- नारी के ही गर्भ जन्में हैं और उसी का प्रेमरस पी कर बढे हैं । जिसके कारण ही जीवित हैं, उसी को अपशब्द कहते हैं ॥  

बिषय काम के जोग कर बस्तु कारे बियोग । 
बिषय काम को परिहर तब जोगी कर जोग /319/

भावार्थ : -- विषय में आसक्ति रख कर वस्तु को दूर करने से योग नहीं होता । पहले विषयासक्ति का त्याग करे तत पश्चात  योगी जन योग करें ॥ 

अर्थात : --"विषय आसक्ती के त्याग से वस्तु स्वत: ही दूर रहती है" 

कह रस राजन सिंगार  तामे सब रस जोग ।
प्रीति प्रतीति रति साधन सहित सँजोग बियोग /320/ 

भावार्थ : -- श्रृंगार रस को रासो का राजा इस लिए कहते क्योंकि रस के सभी यौगिक -विभाव अनुभाव और संचारी भाव का एवं  प्रेम-विश्वास और सौंदर्य के समस्त साधनों सहित संयोग एवं वियोग का अनूठा संगम होता है ॥ 

----- मिनिस्टर राजू ९९ -----

राजू : -- मास्टर जी !

'हाँ! बोलो

राजू : -- मास्टर जी! मस्जिद बनाने की जिद उसी को है, पुल भी उही बनाएगा, टेम्पुल भी उही बनाएगा.....
और मदिरालय में अश्लील नृत्यों का मंच भी उहिच्च बनाएगा.....तनिक इ तो बताइये ये सर्बोच्च नियायालय है की कोन्हों ठिकादार.....?

' राजू ! तू पहले न्यायालय को ठीक से लिखना सीख.....हाँ अब सुन.…उ का है की हमारे देश के लोगन की मानसिकता कुछ इस प्रकार की है, कि प्रत्येक गांधी ये समझते हैं की हम ही महात्मा है प्रत्येक दास समझते हैं की हम ही मालिक हैं और मोहन तो पता नहीं अपने आप को क्या क्या नहीं समझते.....प्रधान मंत्री तक समझते है.....सर्वोच्च न्यायालय तो यह समझते हैं की हम ही सब कुछ जानते हैं.…। 

मंगलवार, 30 जुलाई 2013

----- ॥ दोहा-दशम 30॥ -----

एक मूँठ जल एकहि धूल एकहि मूठिक अँजोर। 
बने बिटप लह लघुत मूल लाहन दे ना थोर | 301| 
    ----- ॥ स्वेट मार्डेन ॥ ----- 

भावार्थ : --एक मुट्ठी जल, एक मुट्ठी धूल और एक ही मुट्ठी प्रकाश लेकर छोटी सी जड़, वृक्ष में रूपांतरित होकर, फल फूल छाया वायु आदि स्वरूप में बहुत से लाभ देती है ॥ 

धन के साध धरम रखे, बिद्या रखे अभ्यास । 
कोमलता राजन रखे कुलीन नारी बास |302| 
 ----- ॥ चाणक्य ॥ -----

भावार्थ : -- धर्म की रक्षा, धन के साधन करते है, विद्या की रक्षा, अभ्यास करता है । राजन की रक्षा, उसकी कोमलता करती है, घर की रक्षा सद्चरित्र  नारी/सेना करती है । 

कवन कुल में दोष नहीं, कौन नहीं गह रोग । 
कौन उर नहीं दुखार्ति कौन सके लखि रोक |303| 
    ----- ॥ नीति सार ॥ -----

भावार्थ :-- किसके कुल में दोष नहीं, कौन व्याधि से पीड़ित  नहीं,  कौन  कष्ट  में  नहीं  पड़ता, लक्ष्मी को 
निरंतर कौन रोक सका है ॥ 

मुख मंडूक कलरव भला बसाह हल मैं जुताए । 
बसह के बल चाक चले टिल ते तेल निकसाए ।304। 
      ----- । खलील जिब्रान ।। -----
भावार्थ : -- मेंढक केवल शोर ही करता रहता है, और हल में बैल ही जोता जाता है । बैल के ही बल से तिल का तेल  निकलता है मेढक के टरटराने से नहीं ।। 

प्रभुता  में  लघुता  बसे, लघुता  में प्रभु  धाम /
तिन बिनायक सीस लगे , ताड़ धरे बड़ नाम /३०५ /
 ------ || दयाराम सतसई || ------

भावार्थ : --लघुता में प्रभुत्व निवास करता है, और प्रभुता लघुता का भवन है / लघु तृण (दूब ) सिद्धि विनायक के मस्तक पर चढ़ता है , ताड़ वृक्ष का केवल बड़ा नाम है //

सत असत न साधु असाधु, मनोज्ञ ना अमनोज्ञ । 
बानि बिनु न धर्म अधर्म बानिहि के सब जोग /306/ 

भावार्थ : -- वाणी के बिना न धर्म का ज्ञान होता न अधर्म का और न  सत्य न असत्य न साधु न असाधु न मनोज्ञ न अमनोज्ञ का ही ज्ञान होता । वाणी ही वह साधन है जो इन सबका बोध कराती है ॥ 
----- ॥ छान्दोग्योपनिषद ॥ ----- 

आचरण के कौसलता , ऐसो कारूक कार /
निज अति सुधी सिद्ध करे,  जे दूजन अनुहार /३०७ /
भावार्थ : -- व्यवहार कुशलता ऐसी कलाकार है , जो दूसरों की तुलना में स्वयं को अधिक बुद्धिमान सिद्ध कर देती है //
 ----- ॥ रेमंड मार्टीमर ॥ -----

धन लोलुप धन बस होए बिनयन बस अभिमान । 
मूढ़ अभिलखित पूरोए साँच भास बिद्वान /308/ 

भावार्थ : - धन के लोभी को धन से, अभिमानी को विनय पूर्वक, मुर्ख की अभिलाषा को पूर्ण कर एवं विद्वान को 
सत्यभाषण से वश में किया जाता है ॥ 
 -----  ॥ हितोपदेश ॥ ----- 

पुरनियाँ ना तितौ भाए, जितौ नउ नन्द भाए । 
ससि तितै प्रात न लवने, जितौ साँझि लौनाए । ३०९ । 
----- ॥ महर्षि वाल्मीकि ॥ -----

भावार्थ : -- बिता हुवा उत्सव उतना आनंद नहीं देता, जितना की आने वाला देता है । चंद्रमा जितना सांयकाल में सुशोभित होता है उतना प्रात: काल में नहीं । 

नाना धर्मन जग लहे, नाना अर्थ बिचार /
कुंचित मन अंतर गहे, केवालात्मन सार /३१० /
----- || एक चीनी कहावत  || -----

भावार्थ : -- संसार में विभिन्न प्रकार के धर्म हैं, जिनमें अर्थ-विचार भी विभिन्न स्वरूप में प्राप्त हैं । "संकीर्ण मन वाले व्यक्ति उन धर्मों में केवल अंतर देखते हैं, और शुद्ध स्वभाव वाले अर्थात उदार वादी उनमें सार-सत्य ही देखते हैं" ॥ 
  


----- ॥ दोहा-दशम 29॥ -----

ते राजन सौ धिक्कार, जे ताज आपन भूम /
धार भूत लब्ध लाभनै, सरनै दुजन पहूम /२९१ / 
भावार्थ : -- उस राष्ट्र प्रधान को सौ सौ धिक्कार है, जो अपनी मातृ भूमि को त्याग कर जीवन की आधार भूत आवश्यकताएं जैसे की स्वास्थ, शिक्षा, आहार-विहार को प्राप्त करने हेतु  पराए राष्ट्र की भूकी के शरणागत होता है

अर्थात : -- "किसी राष्ट्र के सर्वोच्च आसंदी पर आसित अधिकार प्राप्त प्रमुख का यह कर्त्तव्य है की वह अपने राष्ट्र में आधार भूत आवश्यकताओं की उत्तम व्ययवस्था करे और स्वयं उन्हीं व्यवस्थाओं का प्रयोग कर उसकी उत्तमता का दर्शन-प्रतिभू बने"

पाहन जलाधार धरे, तरनी खेवनहार /
दोनों ह्रदय भेद करे, कारे बिपरित कार /२९२/
भावार्थ : -- पाषण जलमग्न होता है और नौका पार लगाती है   /यदी दोनों को छिद्रित कर दिया जाए तो फिर इनकी प्रकृति  परिवर्तित हो जाती है अर्थात पाषाण पार लगा देता है और नौका जल मग्न हो जाती है //

चना गाछ गह गुन घना, उपजत पावैं पान /
काचे फलियन सुखत कन, दलियन दाल पिसान /२९३/  
भावार्थ : -- चने के झाड़ में बहुंत ही गुण होते हैं, उगते ही वह पत्र स्वरूप में खाया जाता / फलीभूत होते ही फलियाँ खाई जाती हैं, सूखे कणों को  दलने से दाल प्राप्त होती है, और पिष्टवर्ति अर्थात बेसन प्राप्त होता है, और बेसन से बहुंत प्रकार के पकवान बनाए जा सकते हैं, कहा भी गया है : --'चना तुझमें गुण घना'

दुःख दहक सुख सीतल हिम, दोनों ज्ञान चढ़ाए /
एक कर सैल सील लहे, दुज गाढ़त निकसाए /२९४/ 
भावार्थ : -- दहन करने वाली दुःख ज्वाल और शीतल करने वाले सुख हिम ने ज्ञान को चढ़ाया, एक के हाथ वह कठोर शिला स्वरूप हो गया, तथा दुसरे के हाथ वह अपेक्षा कृत अधिक गाढ़ा हो गया

अर्थात : -- ज्ञान कभी भी व्यर्थ नहीं जाता, सुख-संपती में वह उत्तम चरित्र का निर्माण करता है, एवं दुःख-विपत्ति में वह और अधिक गहरा हो जाता है

जो कर कै गिनती करै सो तौ करै न होए । 
धरै त्रिगुनी करत गुना वाकौ समउ सिखोए ।295। 

भावार्थ : -- कार्य कर उसका बखान करने से कार्य, अकार्य में परिवर्तित हो जाता है। और जो काली धन-संपत्ति का संकलन कर एक कार्य को तिगुना करके बताता है, उसे फिर समय ही सिखाता है ।। 

सरद काल फरे सरीफा आम बौरे बसंत ।
आए बरखा जमुनि धर झर बेरी हेमंत |296| 

भावार्थ : -- शरद काल में सरीफा ( सीता फल) फलता है । बसंत में आम के बौर आते ॥ वर्षा आते है तो जामुन लाती है । हेमंत के आते बेर फलते हैं ॥ 

भोजन मैं मधु सार अरु सरिद बरा जल धार । 
रहे निस दिन निर्मला राखे भवन सँभार |297|

भावार्थ : -- भोज्य पदार्थ में मधु, और पेय में गंगा जल ॥ यदि इन दोनों को संभाल कर रखा जाए तो ये कभी दूषित नहीं होते, सदैव निर्मल रहते हैं  ॥ 

गुन कहो तौ जग मिताए अवगुन कहत रिसाए । 
गुन अवगुण दोउ कहाए रिस रखे न मिताए |298| 

भावार्थ : --जगत के गुण कहो तो वह मित्र बन जाता है, अवगुण कहो तो शत्रु हो जाता है ॥ यदि गुण अवगुण दोनों कहो, तो वह मित्र रहता है न शत्रु ॥ 

सज्जन कौ ना करष सके जग धन सम्पद कोए । 
वाके परस प्रसंग ते लोहन सुबरन होए |299| 
भावार्थ : --सदाचारी को संसार की कोई भी धन संपदा आकर्षित नहीं कर सकती । क्योंकि उसके स्पर्श और व्याप्त स्वरूप से लोहा भी स्वर्ण हो जाता है ।। 

निर्मल रस की गागरी पद घुँघरु लिए बँधाए । 
सुर कामिनि बन नागरी पत पत खनकत जाए |300| 
 
उत्तर : -- देव नागरी लिपि जिसमें हिंदी, संस्कृत, मराठी आदि भाषाएँ लिखी जाती हैं , घटा 
भावार्थ : -- सुन्दर अप्सरा स्वरूप घटा, देवताओं के नगर उपवन में निर्मल जल/रस की घाघरी लिए, चरणों में घुंघरू बाँधे, पत्रों पर खनकती जा रही है ॥ 

सोमवार, 29 जुलाई 2013

----- ॥ दोहा-दशम 28 ॥ -----

बाहत घन भान ज्ञान  कै, आखर मत दै केर /
आप चाख प्रभु मुख धरे, जूँ सबरी ने बेर /२८१ /
भावार्थ : -- ठोक बजा कर एवं गंभीरता पूर्वक मनन के पश्चात  अपनी मीमांसा प्रकट करनी चाहिए / गंभीर विवेचन उसी प्रकार का मधुर फल देता है, जिस प्रकार से सबरी ने प्रभु श्री राम को दिए थे //

करुबर मधुरि झरबेरी, एकहि गाछ फरियाए /
जबलग मुख रस न पेरी, तबलग लगे सुहाए /२८२/
पेरना = रस निकालना 
भावार्थ : -- कड़वी और मीठी बेरियाँ एक ही वृक्ष में फलती हैं /जब तक मुख से उसके रस निकाल न ले और उसके गुण-धर्म को जान न लें , तब तक सारी ही बेरियाँ अच्छी लगती हैं //

मानख मुख साँस पियास, जस चपला अरु मीन । 
दोनों ही तिरछत रहीं, एक जल एक जल हीन /283/ 

भावार्थ : -- मनुष्य के मुख की सांस और प्यास, बिजली  और  मछली  के  समान  हैं ।  दोनों ही तड़पती है,एक जल में तो एक बिना जल ॥ 

खा खा कै आकंठ भरें लिए गाँठी बँधियाए ।
कहुँ गड़ियाए खोद गढ़े तिन की मति बतियाएँ /284/

भावार्थ : -- खा  खा  के  कंठ तक भर लिए, और गाँठ भी बाँध लिए, कहीं गड्ढा  खोद  की गाढ़ दिया, ऐसे महाआआनुभावों की बुद्धि को क्या कहेंगे ? 

अंग ढापन बसन धार, तन पोषन आहार । 
कुलोधारन  संस्कार   परोपकार   बिचार /285/ 

भावार्थ : -- वस्त्र अंग ढंकने हेतु, भोजन तन को पोषित करने  हेतु,संस्कार कुल का उद्धार करने हेतु, और विचार परोपकार करने हेतु धारण करना चाहिए ॥ 

मानख तेरो घट  भीत, गिनती  की  है साँस । 
गिन कै ही पो और खा, गिन कै ही कर बास /286/ 
भावार्थ:-- हे मनुष्य तेरे शरीर में गिनती की  साँसे हैं अर्थात पता  नहीं  ये  कब  समाप्त हो जाएँ । अत: तू गिन कर रोटी पका, संभाल कर उसे खा और चेत रख कर सो ॥  

तोषित के मन कामना, पूरे दो ही बूँद । 
अतोषित अपूरित रहे चाहे देउ समूँद /287/ 
भावार्थ : -- संतुष्ट की मनोकामना थोड़ा प्राप्त करने से ही पूर्ण हो जाती हैं ।  किन्तु  असंतुष्ट  को  कितना भी प्राप्त हो जाए, उसकी कामनाएं पूर्ण ही नहीं होती ॥

तीन बरस गए भूल मैं, तीन जुआ में हार । 
तीन गई सोवति अब चली जरन सरकार /288/ 
अर्थात : - तीन वर्ष खेलने खाने में बिता दी, तीन वर्ष युवा के विलास में बिता  दी  तीन  वृद्ध  वस्था प्राप्त कर सोती रही अब सरकार तन फूंकने चली ॥  

गिन केवल कर आँगुरी करै गिनत तै काहु ।
जो कर की गिनती करै सो करै न कहलाहु ।289।  

भावार्थ : -- हाथ की उँगलियों की गिनती करनी चाहिए, किए गए कार्य की नहीं । कार्य की गणना करने से, वह अकार्य सिद्ध होता है ।। 

निर्बुध कापर धोइरा चाहे रँग को संग । 
दुर्बुध कारा कोइरा लाहे ना को रंग ।290। 
भावार्थ : -- नासमझ, श्वेत पोत के समान होता है, जिस प्रकार श्वेत पोत पर कोई भी रंग चढ़ सकता है, उसी प्रकार नासमझ को सभी प्रकार से प्रशिक्षित किया जा सकता है । दुष्ट बुद्धि वाला काले पोत के समान होता है जिस प्रकार काले पोत में कोई भी रंग नहीं चढ़ता उसी प्रकार दुर्बुद्धि को किसी भी प्रकार से प्रशिक्षित नहीं किया जा सकता ।। 


----- ॥ दोहा-दशम 27॥ -----

सात सुरों की बाँसुरी, कर धरे घन स्याम /
दोधारी सरूप धरी, एक दाहिन एक बाम /२७१ -क /

एक लय लगन लीन  करी , माँगे हियरा दान /
दुजी  हरिनन दीन करी , माँग करे दे प्रान /२७१-ख /
भावार्थ : --घन श्याम ने के हाथों में सप्त स्वर की बाँसुरी है / जिसने दोधारी स्वरूप वरन किया हवा है जिसमें एक में हीत है तो दूसरी विपरीत है //

एक लय अनुराग में मग्न करती हुई ह्रदय की मांग करती है तो दूसरी हिरन की दुर्दशा करती हुई प्राण दान की मांग करती है ( हिरण का यह प्राकृतिक गुण धर्म है कि वह संगीत में मग्न हो जाता है,फिर मृगया चारी उसका सरलता पूर्वक वध कर देते हैं ) //

चार कोन चौसठ खंड , आठ आठ पड़काल /
चाल गहि हाथ आपनै , जाने को कर काल /२72-क/

चार कोन चौसठ खंड , आठ आठ पड़काल /

 काल न जान घेरे कँह, हाथ आपनै चाल /२७२-ख / 

पड़काल= सीड़ियाँ
भावार्थ : -- आठ पहर और चौसठ घड़ियों घिरे इस जीवन की चार दिशाएं हैं जिसपर चाल चलना तो अपने हाथ है किन्तु काल करना/मृत्यु कारित करना, न जाने किसके हाथ में हैं और जाने कहाँ घेर ले //

जबतै  रस की बादरी फेर गई है पीठ । 
ऊपर धरी कर ऊँगरी जोग रही है दीठ । 273-क। 

बिना भगति भगवन नहीं सुर बिना नहीं गान । 
बिनु सान के बान नहीं जल बिन नहीं किसान । 273-ख। 

भावार्थ : -- जबसे जल की बदली ने मुख फेर लिया ।  तबसे हाथों की उंगलियाँ की धारण की हुई आँखें उसकी
प्रतीक्षा में हैं । 1 । 

भक्ति बिना भगवान नहीं, सुर के बिना गान नहीं । बिना  शाण-पाषाण  के  बाण  नहीं, बिना जल के किसान नहीं ॥ 

बैसे मारे पालथी पोथी पीठ सजाए । 
बंचन प्रबन जोग करें ज्ञानी ढोंग रचाए । 274-क।  

बढ़नी धूरि बुहारि कै तहँ संदुकची खोल । 
पाति पाति परचन कर आखर आखर बोल । 274-ख। 

 भावार्थ : -- विचित्र आसन जमाए हुवे जिन सज्जनों की पीठ के पीछे पुस्तकालय सुसज्जित है । ठगी का अभ्यास करते हुवे उनका चित ठगी की ओर प्रवृत्त है, और ज्ञानी का रूप धारण किये हुवे वे पहुंचे हुवे पाखंडी है । 1 । 

 पहले झाडू से धूल झाड फिर अपनी पुस्तकों की संदुकची खोल  । उच्चार कर पुस्तकों के पृष्ठों से पहले परिचय कर फिर ज्ञानी बन । 2 । 

अर्थात : -- "पुस्त- प्रदर्शन भर से कोई ज्ञानी नहीं होता"  

ताके उदयन होत दिन अस्त गमनु तब रैन ।
बहोर काहु चन्द्र बदन चाहत चक के नैन । 275-क।

ताके उदयन होत दिवस धरे दिवाकर नाम ।
अस्त गत हो रयनि रजस साज संजोउ सुधाम ।275-।    

भावार्थ : - जिसके उदित होने पर दिन होता है, और अस्त होने पर रात होती है । तो फिर चकोर के लोचन चन्द्रमा को क्यूँ चाहते है| 1| 

उसका नाम सूर्य है, जिसके उदित होने पर दिवस और अस्त होने पर रैन विराजित होती है, चन्द्रमा तो केवल सजावट सामग्री है 

लोह पंथ गामिनी कौ ढारे लोहन काल । 
लांबी पटरी चाक तै चारत बिजुरी बाल ।276-क। 

कारी कारी कोयली लोहन देइ निकाल । 
लौह पंथ गामिनी के तेहि धरनी अकाल ।276-ख / 

भावार्थ : -- लोह पथ गामिनी इस्पात से निर्मित होती है । लम्बी पटरियों पर उसके चक्के बिजली से चलते है ।1। 
जो धरती काला काला कोयला और लोहा निकालती है उसी धरती पर लौह पंथ गामिनी  का अकाल है |2|   

लौह पथ गामिनी = रेलगाडी  

जीवन पावत जी उठे मरनि ते मरी जाए । 
उदर धरे बस एक मुठे सो ही संत कहाए ।277-क।  

मोह माया और नार दोनौ एक ही रंग । 
जे मन हो एक आधार मानो दोनौ संग । 277-। 

भावार्थ : -- यदि जीवन मिला तो जी उठे, मृत्यु मिली तो मर बैठे । थोड़ा ही भोजन किया, उसको जग ने संत कहा। 1 । 
धन संपत्ति का मोह और नारी का मोह दोनों एक जैसे ही हैं । इनमें से किसी एक में भी मनुष्य की आसक्ति हो तो वह नारी से भी अछूता नहीं है । 2 । 

जीवन पावत जी उठे मरनि ते मरी जाए । 
उदर धरे बस एक मुठे सो ही संत कहाए । 278-क।  

मोह माया और नार दोनौ एक ही रंग । 
जे मन हो एक आधार मानो दोनौ संग ।278-ख /

भावार्थ : -- यदि जीवन मिला तो जी उठे, मृत्यु मिली तो मर बैठे । थोड़ा ही भोजन किया, उसको जग ने संत कहा। 1 । 
धन संपत्ति का मोह और नारी का मोह दोनों एक जैसे ही हैं । इनमें से किसी एक में भी मनुष्य की आसक्ति हो तो वह नारी से भी अछूता नहीं है । 2 ।  

जे निर्धन निचाई कै  मान करे धनवान । 
जान  गुण  गुनाई कै ते पाथर के मान । 229-क। 

ज्ञानी ऊँच बिठाई कै करे ज्ञान का मान । 
जाने गुन गुनाई कै तेहि पारखी जान ।229-ख।

भावार्थ : -- जो निर्धन को नीचा दिखाकर केवल धनवान का सम्मान करते हैं । वे गुण की गिनती भी नहीं जानते, वे मुर्ख होते हैं । 1। ( गुण तीन होते है : -- सत्य, रजस और तामस )  

जो ज्ञानी को उच्च स्थान देते हैं और ज्ञान का सम्मान करते है । वह गुणों की गिनती जानते हैं और पारखी होते हैं ।2।  

साँची प्रीत हरिनी सी टुटे टाक टंकाए । 
झूठी माटी मटुक की ढेस लगे बिसमाए । 230-क। 

साँचे मीत सुनार से टुटे प्रीत टंकाए । 
झूठे कुम्भी कार से करकट मैं फेकाएँ ।230-ख । 

भावार्थ : -- सच्ची प्रीत स्वर्ण जैसी होती है, टूटने पर टांका लगाने से जुड़ जाती है।झूठी प्रीत मिटटी के घड़े के जैसे होती है, थोड़ी सी समस्या होने पर टूट जाती है । 1 । 

सच्चे मित्र स्वर्णकार के जैसे होते है जो अपने  मित्र की टूटी प्रीत को, टूटे स्वर्ण आभूषण स्वरूप में ग्रहण कर उसे पुन: जोड़ देते हैं । झूठे मित्र,कुम्भी कार के जैसे होते हैं जो अपने मित्र की टूटी हुई प्रीत को टूटा कुम्भ के रूप में ग्रहण कर उसे कचरे में फेंक देते हैं । 2 ।   

रविवार, 28 जुलाई 2013

----- ॥ दोहा-दशम 26॥ -----

बेचन हाँक लगाइ दिए, नेह हाट के कूल /
मोती  लाल जबाहिरे, हरुबर बाके मूल /२६१ /
भावार्थ : -- प्रीत का विक्रय करने हेतु हाट ( बाज़ार) के किनारे हांक लगाई जैसे : -- प्रीत ले लो प्रीत
सारे मोती , सारे माणिक्य सारे रत्न उस प्रीत के मूल्य के सम्मुख हलके लगे //

प्रियबर नैन भवन बसे, भाउ पलक पख दौन /
बदन प्रिय प्रन बचन लसे, वा सों सोहन कौन /२६२ /
भावार्थ : -- जिसके नयनों के भवन में प्रियवर का वास हो और पलक की दो पंखुड़ी पर प्रीत का वास हो मुख पर प्रिय से की गई प्रतिज्ञा वचन का वास हो फिर उसके समान सुन्दर कौन हो सकता है //

काँचा ह्रदय कोइलिया, लाइ लगन लह राख /
साँचा सोन सोइ लिया, कर कुंदन गह लाख /२६३/
भावार्थ : -- कच्चा अर्थात कपटी ह्रदय  कोयला के दृश होता है उसे जिसने भी लिया वह प्रेम के अगन में जल कर भस्म हो गया / सच्चा ह्रदय सोने के सदृश्य होता है वैसा ह्रदय जिसने भी लिया, प्रेम की अगान में तप कर फिर वह कुंदन सा चमकने लगा //

तिनते प्रीत निबाहिये, लगन बँधे जिन संग /
भव सागर तर जाइये, पावत सोए प्रसंग /२६४/
भावार्थ : -- उनसे प्रीत निबाहना चाहिए जिनके संग लगन बंधे हों / क्योंकि अटूट प्रेम बंधन का प्रसंग प्राप्त होने से  संसार रूपी समुद्र को भी पार किया जा सकता है ( ऐसा संत साधू कह गए हैं ) //

धुनि सार के भान नहीं लै पत पत्तर छाप ।
ते मत जगत मान नहीं जे गुन गाहे न आप /265/

भावार्थ : - शब्द के सार का तो ज्ञान  नहीं  है, और  ( अन्य साधन भी सम्मिलित है ) के स्वामी बने समाचार पत्रों को छाप रहें हैं । संसार में उन्हीं विचारों का सम्मान  होता  है,विचारक  जिनका अनुकरण स्वयं करता है ॥

छाँट छाँट निकास लई छापैं दूजन दोस । 
आपन मुठी कास लई दुर्मत के कर पोस /266/

भावार्थ : -- दुसरे के दोषों को तो छांट छांट कर निकालते हैं और छाप देते हैं अथवा चिन्हांकित करते हैं । और अपने दोषों को छुपा कर रखने वाले बुराइयों के पोषक होते हैं ।। 

सुमिरन गोचर चिन्ह के भास ज्ञान परिभास । 
मानख सार गहन कर जाने निज इतिहास ।267/ 

भावार्थ : --आप्त (प्राप्य) एवं व्याप्त ग्रंथों तथा दृष्टिवान चिन्हों  की  भाषा  एवं  परिभाषा  से ज्ञान के सार को 
ग्रहण कर, मनुष्य को अपना  इतिहास की  जानकारी होती है ।। 

मुख सों ऐसो आगरो बानी के जहँ पुंज । 
बरतन में न ताव करें राखें कुंचित कुंज /268/ 
भावार्थ : --मुंह ऐसे आगार के समान है, जहां वाणी कि पूंजी संचयित है । इसे  व्यवहार में लाने  हेतु शीघ्रता न करें और चाबी लगा कर रखें ।। 

तन को ढाँपत कापरा अंतस मन को साँच ।
जीवन  ढाँप सदाचरन लाज कामिनी काँच ।269। 
भावार्थ : -- शरीर को कपड़ा ढंकता है, आत्म तत्व को सत्य ढंकता है ।। जीवन सदाचरण से ढंका जाता है और स्त्री की सुन्दरता, लज्जा से ढंकी जाती है ।। 

जे तन तेरो रे मना नाहीं थिरबत ठौर । 
बिधि बँधिआयौ पिंजरौ परखन जी के चोर /270/ 

भावार्थ : -- हे  मन ! ये तन तेरा स्थायी निवास नहीं है ।  तेरे सत्व  के गुण-दोषों  को परखने के लिए यह विधाता का बांधा हुवा पिंजरा है ॥ 




शनिवार, 27 जुलाई 2013

----- ॥ दोहा-दशम 25॥ -----

कहबत मैं बूँद कहाइ , सुकुति गृह मुकुति होइ /
धरनी कन कन उपजाइ, जननी जीवन जोइ /२५१ /
भावार्थ :-- कहावत में तो वह बूंद कहलाई किन्तु सीप में समा कर  वह मुक्ति स्वरूप हो गई / धरती ने जब ग्रहण किया तो अन्न कण उपजाए और माता ने गर्भ में जीवन संजो लिया //

जल की तौ छाईं छली , दरपन छबि भरमाए /
साँचे ह्रदय देहि ढली, लावन श्री कहलाए /२५२/
भावार्थ : -- जल पर पड़ने वाली छाया तो कपट से भारी हुई है और दर्पण की छवि भ्रमित करने वाली है //
सद्चरित्र  हृदय में ढली हुई देह ही 'लावण्यश्री' अर्थात सौन्दर्यमूर्त कहलाती है //

एक गाछी की नाउ मैं, एक नाईं के गाछ । 
एक जल बीच तीर रही,एक गोरी के पाछ /253/ 
भावार्थ : -- पेड़ के एक ही ताने से बनी हुई नाव में, एक विचित्र प्रकार का पेड़ है एक जल के मध्य तैर रही है और एक गोरी के पीछे ॥ 

कुञ्ज कुटीरे की गली पकडे ककड़ी चोर । 
पण ग्रंथि के महाबली बैठे आपन ठोर /254/

ककड़ी चोर = छोटा अपराधी 
भावार्थ : -- लताओं से घिरे एवं ढके हुवे मार्ग पर ककड़ी चोर पकड़ा गया । जुआ-हाट के महाबली तो अपने घर 
में सुरक्षित बैठे हैं ॥

एक पहरी बोर नहाए, दूजे पहिरे खाए । 
तीजे सोचे अब कोउ कारज केरा जाए |255|

अर्थात = "समय का आदर करें, अन्यथा समय आपका आदर नहीं करेगा"

ताप पावत गगन चढ़े पाए पौ बरस आए । 
जे घमंड घमंड गढ़े पल भर मैं बिथुराए /256/ 

भावार्थ : --  उष्मा प्राप्त कर आकाश में चढ़ जाते है और पवन प्राप्त कर बरस भी जाते हैं । घमंड से भरे घन एक क्षण में ही छिन्न भिन्न हो जाते हैं ॥ 

ओट बैठे महामन्त कोट कनक परिखात ।
प्रजा की नीच आपनी ऊँची कर ली जात /257/ 

भावार्थ : -- किले के चारों और खोदी खाई पर सोने के परकोट ( चार दिवारी)  की  ओट में बैठे महामात्य ने अपनी जाति ऊंची कर ली, जनता की नीची कर दी ॥ 

अँधेरे पाख की रैन नदिया नैया बाँध । 
कंदील धर कनिहारी ढूंड रही है चाँद /258/
भावार्थ : -- अमावस की रात में नदी में नौका उतार कर, कर्णधारणी कंदील लिए चाँद को ढूंड रही है ॥ 

तीन जुग तौ देखि लिया आदि माधि अरु अंत ॥  
काया माया के लाह परिहरे न महमंत /259/ 

भावार्थ :- महामात्य ने, जीवन की तीनों अवस्था बाल, युवा और वृद्धा को देख लिया, अभी भी उन्होंने न धन-
संपत्ति के लोभ का त्याग किया और न ही देह के  आकर्षण का त्याग किया ॥ 

यह तन काँचा मंदरा, खाँचे हीरे लाल । 
है मन साँचा मंदिरा वाके करें सँभाल /260/ 

भावार्थ : -- यह तन तो कांच  का  दर्पण  है  जो  क्षणभंगुर है, जिसमें रत्न जडित हो रहे हैं  अर्थात  केवल  तन की ही देख भाल हो रही है । आत्म सत्व ही सच्चा भवन है जो चिरायु है अत: इस आत्म सत्व की देखभाल करें ॥ 



शुक्रवार, 26 जुलाई 2013

----- ॥ दोहा-दशम 24॥ -----

जोबन जोहनी जुबती, जो बन पिय की नार /
माँगे जोबन चूकती, जो बन देइ उदार /२४१ /
भावार्थ : -- यौवन को संजोई युवती , जब प्रियतम की संगिनी हुई /तो प्रियतम ने यौवन के समस्त रूप-स्वरूप की कामना की, तब उस युवती से जो बना वह उदारता पूर्वक प्रियतम को दान किया //

सुधिजन को स्वान कहे, कारत बहुसहि पाप /
तत परत जब काल गहे, भूँके रतियन आप /२४२ /
भावार्थ :-- प्रबुद्ध जनों को स्वान कहते हुवे स्वयं तो बहुंत से पाप किये तट पश्चात जब काल कवलित होकर मृतप्राय हो गए तो रातो में स्वान बनकर स्वयं ही भोंकने लग गए //

पोथी पत्तर बाँच कै, कहि गए साधौ संत /
खाँच काँच चह आँच दै, प्रीत के नाहि अंत /२४३/
भावार्थ : -- ग्रन्थ पत्र  आदि बाँच बांच कर सद चरित्र प्रबुद्ध जन कह कह कर सिधार गए / प्रीटी को चाहे जड़ दो चाहे पटक दो चाहे तो उसे जला दो उसका अंत असंभव है  //

मति मलाई जोरी कै, आखर दिये जमाए /
बिलोइ बिलौनी लिखनी, सार तीर निकसाए /२४४ /
भावार्थ : -- विचारों की मलाई जोड़ कर उसमें अक्षरों का जामन दिया / बिलौनीस्वरूप लेखनी के बिलोने पर उसमें जो सार रूपी माखन प्राप्त हवा उसे किनारे कर लिया //

साधू सोहत शब्द लिए, राया दैत अदेस । 
भवन भगवन चासत दिए पहरी जोगत देस |245| 

भावार्थ : -- भद्रजन  सिद्धांत-वाक्यों का प्रतिपादन करते हुवे सुशोभित होते हैं राजन आदेश देते हुवे सुधोभित होता है । और अपने भवन में भगवान का  ध्यान कर अन्यथा प्रदर्शन न करते हुवे रक्षक, देश-प्रदेश की रक्षा करते हुवे सुशोभित होते हैं ॥ 

केस रचना कर बालक सिर पै धारे चोट । 
कारे ऐनक नक् धरे काढ़े दिन के  खोट /246|

भावार्थ : -- केश संवार कर शीश ऊपर शिखा आधारित कर बालक, नाक के ऊपर काला ऐनक धारण कर दिवस में दोष निकाल रहा है ( कि यह काला क्यों दिखाई दे रहा है) जबकि दोष उसकी आँखों में है ॥ 

उजरे जन कौ तौ राउ देखें कांच लगाए । 
कारे कारे कोयरे भली भाँति दिख जाए |247| 

भावार्थ : -- सज्जनों  को  तो  राजन  आँख  में  कांच लगा लगा कर देखते हैं । काला  कोयला और दुर्जन उन्हें भली भांति दिख जाते हैं ॥

साधू सोहत शब्द लिए, राया दैत अदेस । 
भवन भगवन चासत दिए पहरी जोगत देस |248| 

भावार्थ : -- भद्रजन  सिद्धांत-वाक्यों का प्रतिपादन करते हुवे सुशोभित होते हैं राजन आदेश देते हुवे सुधोभित होता है । और अपने भवन में भगवान का  ध्यान कर अन्यथा प्रदर्शन न करते हुवे रक्षक, देश-प्रदेश की रक्षा करते हुवे सुशोभित होते हैं ॥ 

सोना के तौ भवन उठाए, मस्तक नीच धसाए । 
पितर के कर ना चुकाए, ते कुंजर कहलाए |249|
 
भावार्थ : --बहुंत धनवान होकर जग ऊंची अटारी तो बना ली, किन्तु  माथा  ऊँचा  नहीं  किया उसे भूमि में धंसा दिया ऊँची अटारी ले कर भी जो पितृ ऋण से मुक्त नहीं होता वह कुंजड़ा कहलाता है ॥ 

दानाचरण होए प्रथम पितर देउ कर जोएँ । 
राज पाट धन आचरण स्वान भूखे सोएँ |250|

भावार्थ : -- दान  आचरण  में प्रथम होने पर, पितृ पूर्वज और देव गण भी दान का अंश प्राप्त करते हैं।  राज  पाट और  धन के  आचरण में प्रथम होने से पितृ पूर्वज और देवादि तो क्या कुत्ते भी भूखे सोते हैं ॥ 

" शास्त्रानुसार : -- "देह पंच तत्व का संगठन है, देह का विघटन पंच तत्व का विघटन है" अर्थात : -- जब हमारा या हमारे पूर्वजों का देहावसान होता है तो देह पंच तत्व में ही विलीन होती है अत: पंचतत्व की सेवा ही पूर्वजों की सेवा है ॥ 

गुरुवार, 25 जुलाई 2013

----- ॥ दोहा-दशम 23॥ -----

दरसन ते दोहा दीन, बरन दुइ चंद चार /
एक धुनी में अरथ तीन, भरे भाउ भंडार /231/
भावार्थ : -- दोहा, देखने में तो अर्थहीन प्रतीत होता है जिसमें केवल दो चार अक्षर होते हैं  किन्तु इसके एक शब्द के अंतत: तीन अर्थ होते हैं और बिंदु में सिन्धु  के सदृश्य इसमें भाव का तो भण्डार ही भरा होता है //

कन लहि बिंदु, बिंदु बूँद, बूँद बूँद लह कुंभ /
कुंभ कुंभ लह नदी नद, साधे सिंधु कुटुंब /२३२ /
भावार्थ : -- कण से बिंदु, बिंदु से  बूंद बनी , बूंद बूंद से गागर भरा /  गागरों से छोटी नदी बनी छोटी नदियों से बड़ी नदी बनी और एक दोहे में सागर का पूरा कुटुंब समा गया //

दोहा दिये रथाकार, दुइ पद चरनन चार / 
अर्थ भाउ बाह मसि पथ पत पत रथ संचार /२३४ /
भावार्थ ; -- दोहा को रथ का आकार दिया, दो पदों को बैठक स्थली एवं चार चरणों को रथ के पहिये बनाए / अर्थ और भाव अश्व बने और लेखनी को सारथिं बनाकर पत्र पृष्ठों के मार्ग पर रथ को संचारित किया //

बरन बरन बृंदा बन, भाउ भवन अम्बारि /
दरसे मोहन राधिका, दोहा दरसन कारि /२३४ /
भावार्थ : -- वर्ण-वर्ण वृदावन बने, और भाव भवन-मंडप बने / मोहन -रिधाए के दर्शन देते हुवे यह  दोहा तो दर्शनीय प्रतीत होता है //

गज की गौरौवित चाल, बहुरइ नीचक भाल /
दीर्घ गति मति ऊंच किए चारत कुटिल कुचाल /२३५ /
भावार्थ :-- हाथी की गौरवान्वित चाल होती है फिर भी उसका मस्तक नीचे होता है/ और ऊँट(दीर्घ गति  को ऊंट कहते हैं ) अपनी बुद्धि उंची किए धृष्टता भरी तिर्यक चाल चलता है //

कंजन कलस सुरा रहे  सो तो कंज न होए ।  
सुरा कलस कंजन रहे कंज कहे ना कोए /236/

भावार्थ : -- यदि  अमृत  के कलश में मदिरा रहे तो वह अमृत नहीं कहलाता । और यदि मदिरा के पात्र में अमृत रहे तो वह भी अमृत नहीं कहलाता ॥ 

अर्थात: -- यदि मदिरा का प्रचार करना अपराध है तो उसके चिन्हपात्र में जल का या अन्य पदार्थों का प्रचार करना भी अपराध होना चाहिए ।। 

चिनिया चिनिया बादाम ले बादामी दाम । 
थोरहि में उल्लू बने हिन्द देस के बाम |237|

भावार्थ : -  इंडिया गेट के पास चिनिया, चिनिया "चिनिया बादाम" "चिनिया बादाम" ऐसा सुनकर उसे 
कोई बादाम के भाव में ले लिया । और थोड़े से ही में बौरा गया ॥ 

दो देस के दो मूरख दोनों मिलाए आँख । 
आपन भाखा परिहरे बोले पराए भाख |238| 

भावार्थ : -- दो देश के दो मुर्ख जब एक स्थान पर मिले तो उनकी मुर्खता इस प्रकार लक्षित हुई कि, दोनों ने अपने देश की भाषा को त्याग कर पराए देश की भाषा को अपनाया ॥ 

बयस बिरति महमंत की जम पुर लिये बुलाए । 
ऐतक कारा देख के काल डरत बहुराए |239| 

भावार्थ : -- महामात्य  की आयु  हो आई तो यमराज ने उन्हें यमलोक आने का न्योता दिया । "बापुरे ! इतना काला" ऐसा कहकर मृत्यु भी वापस लौट गई ॥  

``दो देस के दौ बटेउ कैसे बखत गवाएँ । 
आधे पहर भेष भरे शेष बाहिँ सम्हाए |240| 

भावार्थ : -- दो देश के दो जमाई, किस प्रकार से समय निरादर कर रहें हैं । आधा पहर इन्हें अपनी वेष-भूषा वरण करने में लग रहा है, आधा उसको सम्हाने में ॥ 

बुधवार, 24 जुलाई 2013

----- ॥ दोहा-दशम 22 ॥ -----

छलकी जल की घाघरी, कर धर बदरी लाइ /
सर सर सरिता सागरी, भर भर सीच सुहाइ /२२१ /
भावार्थ : - छलकती हुई जल की घाघरी, बदरी अपने हाथों में धरी ले आई / जो जलाशय ,तालाब, नदियों और सागरों को  भरते हुवे धरती को सींचते हुवे सुहावनी लगी //

पलकावली तमाल बन, काल कलिंदी नैन /
बिपिन बिहारी देस मन, संकेत रुपन सैन /२२२ /
भावार्थ : -- पलक पंक्तियाँ  कालिंदी किनारे के तमाल वृक्ष बने , और काली यमुना नयन बने / मन,विहार करने का वनस्थान बना और नयनों के संकेत  स्थली चिन्ह बने //

सोम सुगँधित सरयु चरी, स्वर ग्राम कर जोग /
गिरधर अधरन बाँसुरी, राधा का सँजोग / २२३ /
भावार्थ : -- सप्त स्वर से युक्त होकर, कोमल सुगन्धित वायु बही / गिरधर के अधरों पर बाँसुरीहै और राधा का संग है //

दौ दृग देखे दिवस है, दौ दृग देखे रैन ।
दौ दृग देखे पहर है, दो दृग से सब सैन /224/

भावार्थ : -- दोनों आँखों से देखेंगे तो दिन है, दो आँखों से देखेंगे तो रात है । दो आँखों से देखे तो ही समय है, समस्त क्रिया संकेत दो आँखों पर ही ठहरे हुवे हैं ॥ 

जहाँ पिया तँह हूँ नहीं, जहाँ मैं तँह पियाए ।
मैं प्रियतम की सहायक , प्रियतम मोर सहाए |225| 

भावार्थ : -- जहां  प्रियतम  है वहां मैं नहीं हूँ, जहां मैं हूँ वहीँ प्रियतम हैं । मैं प्रियतम की सहायक हूँ, प्रियतम 
मेरे सहायक हैं ॥ 

भाखा आपनी बोलिए, लिये पराई सीख ।  
रंग रस घोरें आपने, ले दूजन की लीख |226| 

भावार्थ : -- "पराए की सिखाई नहीं बोलनी चाहिए" या पराए से सीख(ज्ञान)लेकर, अपनी भाषा ही बोलनी चाहिए या पराई भाषाएँ तो सिखनी  चाहिए  और बोलनी अपनी चाहिए । यदि लिपि भी पराई हो तो अपनी ही सभ्यता और संस्कृति के रंग भरने चाहिए क्योंकि भारत की संस्कृति एवं सभ्यता सबसे प्राचीन और सबसे श्रेष्ठ है ॥ 

श्री रामायन ग्रन्थ के देखौ अद्भुद मेल । 
दस्यु तौ बरज्ञान लिखै, ज्ञानी रह रन खेल |227| 

भावार्थ : -- श्री  रामायण  ग्रन्थ  का  यह अनोखा खेल देखो । डाकू तो उत्तम ज्ञान ग्रन्थ की रचना कर रहा ज्ञानी युद्ध कर रहे हैं ॥  

दसानन के नाभि कुंड, ज्ञान के अमृत कोष । 
पाछे सठ आनन गिरे, पहिले एक सर सोष |228|  

भावार्थ : --  रावण के नाभि कुंड में ज्ञान रूपी अमृत का कोष था । भगवन  ने  पहले एक सायक से  उसे शोषित किया, ( शेष तीस) फिर उसके अज्ञानी शीश-समूह को नीचे गिराया ॥ 

शब्द सागर बूँद कोष, भए मुकुति मूलवान । 
पावन हार को चाहिए, दें विचार को दान |229| 

भावार्थ : -- शब्द-सागर के बूँद कोष में बहुंत से अनमोल मोत हैं । पाने वाले को उसे विचारों को दान कर देना चाहिए ॥    

कर्म देही समान है, छाईं भाग सरूप । 
ता पर श्रमन धूप पड़े तबहि छाइ के मान |230| 

 भावार्थ : -- कर्म देही के  समान  हैं, और छाया  भाग्य  स्वरूप होती है, अर्थात देह रूपी कर्म के  बिना छाया रूपी भाग्य का भी अस्तित्व नहीं होती और देह पर  जब परिश्रम रूपी धुप  पड़ती है, तभी  परछाई रूपी भाग्य लक्षित होता है॥ 

----- ॥ दोहा-दशम 363॥ -----,

सभा सदस बैठे रचे आपहि नेम विधान  तोड़ करे पुनि आपही न्याय का अवमान ॥१||  :-- देश के सांसद स्वयं नियम विधानों की रचना करते हैं तत्पश्चात स्वय...