शुक्रवार, 17 मई 2013

----- मिनिस्टर राजू ९ १ -----

राजू: -- मास्टर जी ! कल ये दिल्ली की पुलिस, किस नाटक के फाटक
            को कौन से निबन्ध से बंद कर रही थी ?

" राजू ! राजू! दिल्ली की पुलिस कहाँ साहित्य कार है ये नाटक-निबन्ध लिखना थोड़े ही जानती है
  ये तो मुलाजमत-नामा माने की सेवा-पुस्तिका लिखती है.....कल इसने उस किताब में एक
  'ज़मज़मा' माने की गीत लिख दिया..,

राजू : -- मुलाजमत-नामा में..... 'ज़मज़मा'..... मास्टर जी ! फिर का हुवा ?

" फिर.....फिर का होना है मुलाजमत-नामा हीट हो गया"

राजू :-- मास्टर जी ! फिर तो हमारी सरकार इन्हें नामो-एहतराम से नवाजना चाहिए 
            कोई पुरस्कार-परितोष का उद्घोष करना चाहिए ?

" राजू ! तू जितना छोटा है उतनी ही छोटी बात भी करता है.....सरकार इनके नाम से पुरूस्कार की उद्घोषणा करेगी जैसे कि....."पुलिस रत्न"

राजू : -- मास्टर जी ! "पुलिस रत्न" के फले भी तो कुछ लगना चाहिए..,

" उसके लिए समाचार पत्रों को एक एक पृष्ठ का विज्ञापन दिया है, और बिजली से चलने वाले समाचार संसाधनों को आधे आधे घंटे के विज्ञापन दी हैं

राजू : -- मास्टर जी ! ये महामात्य की "बर्तनी' अभी तक नहीं सुधरी है.....भारत निर्माण कहते हैं तो
             भारत निर्वाण लगता है.....




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