रविवार, 12 मई 2013

----- मिनिस्टर राजू ८८ -----


राजू : -- " राजनीति के सिद्धांत में राष्ट्र की रक्षा सभी उपायों से करने के आदेश हैं,
               इसलिए राजा,राजकुमार, औए अमात्य सबका विसर्जन किया जा सकता है....."
                                                              ----- ।। जय शंकर प्रसाद ।। -----

               मास्टर जी ! इस सूक्ति का अर्थ समझाइये नाँ.....

               " परसों किया था न दो अमात्यों का बिसर्जन अब महामात्य का बिसर्जन बाकी है"

राजू : -- किन्तु मास्टर जी ! आपने तो सर्जन करने कहा था बिसर्जन करने को थोड़े न कहा
            था ..,

            " राजू! राजू! तू ज्यादा बोल के मुझे डरा मत नहीं तो बछुआ के पेट में मरोड़ उठेगी न
              तो वह अपनी बेसुरी आव़ाज से बे-उनबानी तकरीर पड़ना शुरू कर देगा, उसकी
               बेसुरी तकरीरों से तो पड़ोसीयों के भी  बैरक उखड़ गए फिर मेरी तो बिसात ही क्या
               है.....                

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

----- ॥ दोहा-दशम 363॥ -----,

सभा सदस बैठे रचे आपहि नेम विधान  तोड़ करे पुनि आपही न्याय का अवमान ॥१||  :-- देश के सांसद स्वयं नियम विधानों की रचना करते हैं तत्पश्चात स्वय...