बुधवार, 27 फ़रवरी 2013

----- ॥ मिनिस्टर राजू ८० ॥ -----

राजू : -- मास्टर जी ! हम भी 'अनुभूति' की भभूती मलेगें..,

            " तुम्हारे बाबूजी घूस लेते हैं ?? "

राजू : -- नहीं ! मास्टर जी!

             " घोटाला करते हैं ?? "

राजू : -- नहीं ! मास्टर जी !

             " कर चोरी,  डकैती, काला धन संग्रहण आदि आदि करते हैं "

राजू : -- नहीं ! नहीं ! नहीं ! आदि आदि मास्टर जी ! 

             " फिर तुम्हारे बाबूजी करते क्या हैं ?? "

राजू : -- मास्टर जी ! वही ! जो सब करते हैं, गंगा में जाके धोते हैं, हिमालय में चढ़
              के सुखाते हैं और पिघलते-बहते गृहस्थी के सांसारिक सागर में बिलीन हो
              जाते हैं..,

             " ओह ! तो तुम उसी सागर के मोती हो??आजकल मोती वोती का 'फैशन' कहाँ है
               लाल की  'नेहरू कट शेरवानी' का फैशन है !

राजू : --मास्टर जी ! ये फैशन तो 'मार' लेते हैं पर टेलर को कछु इनाम- सिनाम नहीं देते

             " उ का है न राजू इन्हें कोयरे में तो रतन दिखाई देते हैं और रतन मा कोयरे 


राजू  -- मास्टर जी ! एक तो उ महाराज थे जो भाइट खाके भी बिलैक ही रहे
             एक इ हैं जो बिलैक खाके भी खुद को भाइट- भाइट कहते हैं
             राजू ! एही तो कलियुग है नाम ही करिया है






कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

----- ॥ दोहा-दशम 363॥ -----,

सभा सदस बैठे रचे आपहि नेम विधान  तोड़ करे पुनि आपही न्याय का अवमान ॥१||  :-- देश के सांसद स्वयं नियम विधानों की रचना करते हैं तत्पश्चात स्वय...