शनिवार, 9 फ़रवरी 2013

----- मिनिस्टर राजू 78 -----

राजू  --  मास्टर जी ! वो जो हमार मंतरी हैं...

           " कौन से ?? घरवाले की घरवाली ??

राजू : -- मास्टर जीईई ! हमार देस मा  घर के मंतरी घरवाली कहाँ होती है
             घरवाले ही तो होते हैं..... तो हम कह रहे थे कि हमार घरबाले मंत्री
             जो हैं  उ  मंतरी  कम  अउर  'दंड पासक'  अर्थात 'जल्लाद' अधिक
             लगते हैं तनिक इ तो बताइये उ जो नयन के नीचे मस्सा लगाए हैं
             उ बास्तविक अर्थात ओरिजनल है की दृश्य में  सजीवता  दरसाने
             के लिए यूँही स्वांग भरे हैं

            " अब हम का बताएं राजू ! पहले तो हमको इनके इस " रौद्र रूप "
               से ही भय लगता है अब इनकी इस रौद्र रस की कविता का
               अनुप्रास अलंकार हमारे भय को और अधिक प्रबल कर देवत है
               
                अजमल चल..,
                अफजल चल..,
                " ........" अब तू भी चल.....

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