गुरुवार, 28 फ़रवरी 2013

----- मिनिस्टर राजू ८१ -----


राजू : --मास्टर जी ! इ सरकार है की बइला-भैसा है, केतना भी बीन बजाओ  
            इ सुनने बाले नई..,

           " राजू ! इ जाती हुई आत्मा हैं,  और आत्मा को भी कोई धर सकता है का"

राजू  -- मास्टर जी ! हमको तो इ भागते भूत लागत हैं हम तो लंगोटी धर लिए हैं..,  

           " राजू ! राजू ! तुम केतना भी लंगोटी धरो कोरट उसक प्रमाण मानेगा ही नहीं
              उ तो भूतों को छोड़ने के लिए ही बैठे हैं ना अब इस अंधी कोरट को कौन
             समझाए " हाथ कंगन को आरसी का".....


बुधवार, 27 फ़रवरी 2013

----- ॥ मिनिस्टर राजू ८० ॥ -----

राजू : -- मास्टर जी ! हम भी 'अनुभूति' की भभूती मलेगें..,

            " तुम्हारे बाबूजी घूस लेते हैं ?? "

राजू : -- नहीं ! मास्टर जी!

             " घोटाला करते हैं ?? "

राजू : -- नहीं ! मास्टर जी !

             " कर चोरी,  डकैती, काला धन संग्रहण आदि आदि करते हैं "

राजू : -- नहीं ! नहीं ! नहीं ! आदि आदि मास्टर जी ! 

             " फिर तुम्हारे बाबूजी करते क्या हैं ?? "

राजू : -- मास्टर जी ! वही ! जो सब करते हैं, गंगा में जाके धोते हैं, हिमालय में चढ़
              के सुखाते हैं और पिघलते-बहते गृहस्थी के सांसारिक सागर में बिलीन हो
              जाते हैं..,

             " ओह ! तो तुम उसी सागर के मोती हो??आजकल मोती वोती का 'फैशन' कहाँ है
               लाल की  'नेहरू कट शेरवानी' का फैशन है !

राजू : --मास्टर जी ! ये फैशन तो 'मार' लेते हैं पर टेलर को कछु इनाम- सिनाम नहीं देते

             " उ का है न राजू इन्हें कोयरे में तो रतन दिखाई देते हैं और रतन मा कोयरे 


राजू  -- मास्टर जी ! एक तो उ महाराज थे जो भाइट खाके भी बिलैक ही रहे
             एक इ हैं जो बिलैक खाके भी खुद को भाइट- भाइट कहते हैं
             राजू ! एही तो कलियुग है नाम ही करिया है






सोमवार, 18 फ़रवरी 2013

----- मिनिस्टर राजू 79 -----

राजू : -- मास्टर जी ! तनिक इ तो बताइये की मस्जिद के खुलते ही, माने की
             संसद सत्र सूरु होते ही उ आबरू के अब्बा की खामोसी की मौसी काहे
             मर जाती है..,

            " का है की उहाँ बाँग देना पड़ता है न माने की कोन्हु कछु पूछता है तो
               बोलना-बतियाना पड़ता है..,

राजू : -- मास्टर जी ! उहाँ का पूछते हैं..??

            " इही की अबकी घोटाला लाटरी का 'माल' कहाँ छुपाया "

राजू:-- लो उ तो खुदई 'मालामाल बिकली' हैं उ कौन हवाले से पूछेंगे
           मास्टर जी एतना अभिनय तो अभिनय-साला में नहीं देखें है

शनिवार, 9 फ़रवरी 2013

----- मिनिस्टर राजू 78 -----

राजू  --  मास्टर जी ! वो जो हमार मंतरी हैं...

           " कौन से ?? घरवाले की घरवाली ??

राजू : -- मास्टर जीईई ! हमार देस मा  घर के मंतरी घरवाली कहाँ होती है
             घरवाले ही तो होते हैं..... तो हम कह रहे थे कि हमार घरबाले मंत्री
             जो हैं  उ  मंतरी  कम  अउर  'दंड पासक'  अर्थात 'जल्लाद' अधिक
             लगते हैं तनिक इ तो बताइये उ जो नयन के नीचे मस्सा लगाए हैं
             उ बास्तविक अर्थात ओरिजनल है की दृश्य में  सजीवता  दरसाने
             के लिए यूँही स्वांग भरे हैं

            " अब हम का बताएं राजू ! पहले तो हमको इनके इस " रौद्र रूप "
               से ही भय लगता है अब इनकी इस रौद्र रस की कविता का
               अनुप्रास अलंकार हमारे भय को और अधिक प्रबल कर देवत है
               
                अजमल चल..,
                अफजल चल..,
                " ........" अब तू भी चल.....

बुधवार, 6 फ़रवरी 2013

----- ।। कृति एवं कृतिकार ।। -----

कृतिकार एवं कृति परस्पर अवलंबित हैं,
कृतिकार कृति का सर्जन करता है एवं कृति
कृतिकार को सृजित करती है.....


शनिवार, 2 फ़रवरी 2013

----- मिनिस्टर राजू 77 -----

राजू : -- मास्टर जी !

             " हूँ '
राजू : -- मास्टर जीईई !

             " हूँऊऊऊउ"
राजू : -- मास्टर जी ! " चीटीं के पग नूपुर बाजे साहेब उ भी सुनते हैं "

" इ तुमने कहाँ से सीखा ? हमने तो नाहीं सिखाया"

राजू :-- मास्टर जी ! इ हमने गीता प्रेस के "दान के महिमा- अंक" से सिखा..,

" एक ठो बात कहते हैं के नूपुर बजाओ के नगाड़े बजाओ उ नाही सुनने वाले.....

----- ॥ दोहा-दशम 363॥ -----,

सभा सदस बैठे रचे आपहि नेम विधान  तोड़ करे पुनि आपही न्याय का अवमान ॥१||  :-- देश के सांसद स्वयं नियम विधानों की रचना करते हैं तत्पश्चात स्वय...