रविवार, 29 दिसंबर 2013

----- ॥ दोहा-दशम १०९ ॥ -----

कुबचनी दुर्बादिन के, मुख पर मौन सुहाए । 
मोरी जेतक मुख खुरे, तेतक बाँस उठाए ।१०९१।
भावार्थ : -- कुवचन और बुरा बुरा कहने वालों के मुख पर मौन ही अच्छा लगता है ।  मोरी का मुख जितना खुला होता है वह उतनी ही दुर्गंध देती है ॥

जीव धारन तन चाहिए, तन को चाहिए साँस। 
साँससो जल चाहिए जो, भया हिरन संकास ।१०९२। 
भावार्थ : -- जीवन की धारणा हेतु देह की आवश्यकता होती है, देह को साँस की आवश्यकता होती है । साँस को उस जल की आवश्यकता होती है जो स्वर्ण के मूल्य का हो गया ॥

खल की साज समाज मैं, ताल मैं ज्यूँ मीन । 
मल सन जल दुबरो कियो, आप भई बहु पीन ।१०९३। 
भावार्थ : --  दुष्टों की साज-सज्जा, पवित्रता, सच्चापन समाज में ऐसा है जैसे जल में मीन का होना ॥ वह अपने मल से जल को तो मैला कर दुर्बल अर्थात अयोग्य कर देती है, और स्वयं हट्टीकट्टी होकर सुपोषित रहती है ॥

पारसमनि सोइ भलि जो, लोहन कंचन कारि । 
वा सौंह अंतर धारिए, जो जल अनहु न छाँरि।१०९४। 
भावार्थ : -- स्पर्शमणि वाही अच्छी है, जो केवल लोहे को स्वर्ण करे । उस मनि के स्पर्श से दूर ही रहना चाहिए, जो दाना-पानी को भी स्वर्ण कर दे ॥

जिन कहत पयोधि जग  तँह, मुकतइँ मुकुत समाए । 
जो तप चरन चिन्ह चरे, चुनि चुनि झोर धराए ।१०९५। 
भावार्थ : -- संसार जिस जलाकर को पयोधि कहता है, वहाँ मोती ही मोती बिखरे हैं । जो तपन के चरण चिन्हों का अनुशरण करता है, वही उन्हें चुनता है और अपनी झोली सजाता है ॥

नभ पटल नौ बत्सल के, लिख आगम संदेस ।
प्रथम किरन जोग रहि भर नौ नौ भूषन भेस ।१०९६।  
भावार्थ : -- नभ के पटल पर नववर्ष के आगमन का सन्देश लिख प्रथम किरण नए नए आभूषण एवं वस्त्रों से आभारित होकर प्रतीक्षारत है ॥

जग के जीव जन तरु बन, सुन ले सासन कार । 
निज रछ्न मैं माँग रहे, जीवन के अधिकार ।१०९७ । 
भावार्थ : --ऐ शासन कार सुन, न केवल मनुष्य अपितु प्राणिजगत के सभी जीव जंतु, पेड़-पादप, सभी बन-उपवन अपनी रक्षा में जीवन का अधिकार मांग रहे हैं ॥ 

'इनकी ह्त्या बंद करो'

साँच बचन सोइ भित जो, दोष चरन किए रोध । 
पछ्ताउ अगन हिरन सम , कारे चित परिसोध ।१०९८। 
भावार्थ : -- सत्य वचन वह भित्ति है, जो दूषित आचरण को अवरोधित करती है । पश्चाताप की अग्नि स्वर्ण के सरिस उन आचरणों को परिशोधित करती हैं ॥ 

नौ पाप करम रोध के, सुरतत किये पुरान । 
पछ्ताउ अगन दहन ते, जीवन के उत्थान ।१०९९ । 
भावार्थ : -- नए पातक कर्मों को अवरोधित करते हुवे, पुराने पाप कर्म का स्मरण कर पश्चाताप की अग्नि में जलने से ही जीवन का उत्थान हैं ॥ 

भलधन धरे तो पुन किए, खल धारे तौ पाप । 
भलकरनी दारिद हरए, खल करनी दिए ताप ।११०० ।  
भावार्थ : -- यदि भलामानुष विभूति धारण करे तो वह उसका प्रयोग पुण्य कार्यों में करता है । खोटा मानुष उस विभूति का प्रयोग दूषण कार्यों में करता है । भले मनुष्य की करनी दरिद्रता को हरती है, खोटे मनुष्य की करनी संताप ही देती है ॥ 



गुरुवार, 26 दिसंबर 2013

----- ॥ दोहा-दशम १०८ ॥ -----

भगवन बरदाई गाँठ, सोच समझ बरताएँ । 
बरतत भोग बिलास मैं, मानख मूढ़ कहाए ।१०८१। 
भावार्थ : -- ईश्वर द्वारा वरदान दी हुई संचय स्वरुप प्राकृतिक सम्पदा को सोच समझ कर व्यय करनी चाहिए । यदि इसे भोग-विलास में व्यय किया तो  ( आने वाले समय में ) मनुष्य मूर्ख ही कहलाएगा ॥ 

अर्थात : --'क्या हमें अपने निवेश को विषय-विलास में व्यय करना चाहिए' ? 

पाहन लिए मंदर रचे, पानी ते दिए सीच । 
अंतर भाउ ना उपजै, सो तो मचाइ कीच ।१०८२। 
भावार्थ : -- पत्थर लिया एक मंदिर रच दिया फिर जा जा कर पानी से उसे सींच रहे हैं । यदि अंतस में भाव नहीं है, प्रेम नहीं है, श्रद्धा नहीं है, फिर तो वहाँ कीचड़ ही मचाना है ॥  

सद्कर्म आतसी लड़ी, अहम् पलीता गोए । 
एक बारी लगाइ लगे, भस्म भूत छन होए ।१०८३। 
भावार्थ : -- सद्कार्य वह आतिशी लड़ी है जिसमें यदि अहंकार का पलीता हो, फिर तो एक लाग लगाने की देर है वह क्षण भर में भस्मीभूत हो जाएंगे ॥ 

कुल दीपक तो कारता, बस निज कुल उजियार । 
जग नयन जग उजारता, दूर करत अँधियार ।१०८४। 
भावार्थ : -- कुल का दीपक तो केवल अपने कुल को उज्जवल करता है । जो सूर्य स्वरुप होता है वह अन्धकार हरण कर समूचे जगत को उज्जवलित करता है ॥ 

जे ऋतु ऋति जे दिनु रात, पाख पहर के मंच । 
जे अम्बर के अडंबर, सब बिधि रचे प्रपंच ।१०८५। 
भावार्थ : -- यह ऋतुओं की गति ये दिन-रात ,ये पहर, पक्षों का मंच । यह अम्बर का आडम्बर यह सब विधाता का ही रचा हुवा भवजाल है ॥ 

केतिक लोग मरि मरि गए, केतक अरु मरि जाहिं । 
जोइ मरत जिवाई लए, सोइ जगत उपराहिं ।१०८६ । 
भावार्थ : -- जाने कितने ही लोग मर मर कर चले गए जाने और कितने अभी मरेंगे । जो मरते को जीवा ले गए वे ही जगत का उद्धार करते गए ॥ 

जो जन हो सेवक रूप, कारत बिपद निदान । 
प्रजा चरण गह राखिये, राखे सहसै कान ।१०८७। 
भावार्थ : -- यदि कोई जन सेवक स्वरूप हो, तो वह विपत्तियों का निदान करते हुवे जनता जनार्दन के चरण पकड़े रहे और सहस्रों ऐसे कान रखे जिससे जनता जनार्दन के दुखों को सुन सके ॥ 

बिनई तुहिन तिन सरूप, अहम् कलेवर ताड़ । 
ताड़ पहिलै टूट गिरै, जब आवै को बाड़ । १०८८। 
भावार्थ : -- विनम्र तुच्छ तृण के सदृश्य होता है अहम् ताड़ आकृति का होता है । जब कहीं कोई बाड़ आती है तब सर्वप्रथम ताड़ टूट कर गिरता है ॥ 

सुबरन के एकै सरूप, आभूषन बिलगाए । 
बिलग धर्म अस जग अहै, भगवन एकै एकाए ।१०८९। 
भावार्थ : -- स्वर्ण का स्वरुप एक ही होता है,किन्तु आभूषण विभिन्न रूपों में गढ़े जाते हैं । ऐसे ही संसार में विभिन्न धर्म हैं, किन्तु ईश्वर का स्वरुप एक ही है ॥  

दिनकर भया किरन किरन, अंतर गगन समाए । 
वाके परस पावत जल ,हिरनइ होया जाए ।१०९० । 
भावार्थ : -- सूर्य किरणों से युक्त होकर गगन के अंतर में समाता जा रहा है । उसका स्पर्श प्राप्त कर जल भी स्वर्णमयी होता जा रहा है ॥ 

शुक्रवार, 20 दिसंबर 2013

----- ॥ दोहा-दशम १०७ ॥ -----

सिन्हासन की लाह किए, करे बाँदरा नाच । 
पहिले कितनो बांच लिए, अब मत पत्र दे आँच ।१०७१। 
भावार्थ : -- सिंहासन की लालच में बन्दर घर घर नाच करते हैं ।  पहले कितने ही मत पत्रों को बाँच लिया न.....तेरा कुछ हुवा.....नहीं, अब आग लगा दे इन मत पत्रों को ॥ 

धरे उठौआ चूल्हा, जँह तँह देइ बराए । 
पाके पाक आप खाए, बाकि धुँआ मलिनाइ ।१०७२ । 
भावार्थ : -- बिना अर्थं के इधर-उधर उड़ने वाले जहां पाते हैं वहाँ आग लगा देते हैं । पके पकवान तो आप खाते हैं, बाकियों को काले धुँएँ से मैला कर आते हैं ॥ 

उजरी समझ उपार कै, बोवएँ मलिन बिचार । 
उजरी सारी बाटिका, अब दे कौन सँवार ।१०७३। 
भावार्थ : -- शुद्ध एवं निर्मल विचारों को उखाड़ कर वहाँ कुत्सित विचारों को बोया जा रहा है । ऐसा करके सारी वाटिका ही उजाड़ दी, अब इस उजड़े को कौन सँवारे ॥ 

नयन पटल घन स्याम, लेख लिखाई लाख । 
यह पत्र सो पढ़ सके जो ,जाने तिनकी भाख ।१०७४। 
भावार्थ : -- नयनों की श्याम पट में लाखों लेख लिखे रहते हैं । यह पत्र वही पढ़ सकता है जो उसकी भाषा जानता हो ॥ 

खाए प्रीति पकवान जो, भूरे नाहि सुवाद । 
दरसन टोटे जिन नैन, कहत ह है बकबाद ।१०७५। 
भावार्थ : --जिसने एक बारी प्रीति का पकवान खा लिया फिर वह उसका स्वाद नहीं भूलता । जिन नैनों के इसके दर्शनों के भी टोटे हैं वह तो कहेगा ही ह बकवास है ॥  

भूखी भोजन जोग रहि, जब वाकी संतान । 
खाए कवन तेरे भोग, बैस भवन भगवान ।१०७६। 
भावार्थ : -- जब उनकी संतान भूखी है और भोजन की प्रतीक्षा कर रही है । तब मंदिर में बैठे भगवान तेरे छप्पन भोग कैसे खा सकते हैं ॥ 

पुरइन बच्छर पुरनियाँ, नए बच्छर नइ बात । 
नवनै सोंह मीच जुगी, पुरइन पीछ उद्गात ।१०७७। 
भावार्थ : -- पुराने वर्ष में पुरानी बात, नव वर्ष की नई बात । नई बात यह है कि नए के साथ मृत्यु का एवं पुराने के साथ जन्म का संयोग है ॥ 

जोइ उपजे मुख तिस्ना, बुझे कंठ जल घाल । 
कै नदी नल कूप घड़े,के सरबर कै ताल । १०७८।  
भावार्थ : -- यदि मुख में तृष्णा जन्म लेती है वह जल ग्रहण करने से ही बुझती है । या तो नदी के या नल के या कुँवें के या घड़े के या सरोवर के या तालाब के ॥ 

पुरइन जन असिखित रहि, रहहिं पर ज्ञान बान । 
अजहूँ के  तौ सिखित हैं, है निपट मूरखान ।१०७९। 
भावार्थ : -- बड़े बूढ़े लोग यद्यपि अशिक्षित थे, किन्तु वे ज्ञानी ध्यानी थे । अद्यावधि में लोग शिक्षित अवश्य हैं,किन्तु हैं निपट मूर्ख ॥ 

हाथी घोड़ा पालकी, को चढ़ि गगन बिमान । 
चाव रहे न भाव रहे, वाका कवन उठान  ।१०८०। 
भावार्थ : -- कोई हाथी घोड़ों पर चढ़ा हुवा है कोई पालकी पर चढ़ा हुवा है कोई विमान लेकर गगन में चढ़ा फिर रहा है । ऐसे लोगों में किसी प्रकार पञ्च भूत में परस्पर आकर्षण नहीं होता और उनमें कोई भाव भी नहीं होता है । फिर ऐसे व्यक्तियों का उठावना क्या कारण कि वो तो पहले से ही उठे हुवे हैं ॥ 







गुरुवार, 19 दिसंबर 2013

----- मिनिस्टर राजू 119 -----

राजू : -- मास्टर जी! जनार्दन  की काम वाली बाई की तो वाट लगने वाली है, काहे की ये नई बाली दुल्हनिया तो झाड़ू धर के आ रही है..,

" मुगालते में मत रह, पहले भी बहुंत पीट चुका है वो  "

सोमवार, 16 दिसंबर 2013

----- ॥ दोहा-दशम १०६ ॥ -----

जह जगती अरु कोउ नहि, तेरे अरि कुल चार । 
मरनी से जो भय लगे, तौ तिन भय को मार ।१०६१। 
भावार्थ : -- इस संसार में तेरा शत्रु कोई नहीं यदि कोई है तो केवल काम,क्रोध,मद और लोभ ही हैं । यदि मरने से भय लगता हो तो सर्वप्रथम उस भय के जनितो को मार ॥

निहचिन्त हो सोए रहे, लोचन पलक ढकाए । 
काल उपर भरोसा का , ऐसेउ लेइ जाए ।१०६२। 
भावार्थ : -- नयनों में पलकों का पर्दा दिए बड़ा निश्चिन्त होकर सो रहा है, रै माणूस काल पे भरोसा मत कर, ऐसी-वैसी जाने कैसी अवस्था में ले जाए ॥

कोउ आपनी मनवाए, कोउ आपनी मान ।  
तिनकी कहि तबहिं माने, जब हो जग कल्यान ।१०६३। 
भावार्थ : -- कोई अपनी मान मनवाता है और किसी की नहीं मानता, कोई अपनी ही मानता है और किसी की नहीं मानता । इनकी कहनी तभी मानना चाहिए, जब वह संसार के लिए कल्याणकारी हो ॥

दीपक चूल्हा अँगीठि, बरत करें घर काल । 
किए कज्जल कुल जगत जूँ, बुराई की ज्वाल।१०६४। 
भावार्थ : -- दीपक, चूल्हा, अंगीठी जैसे साधन जलाते ही घर को काला कर देते हैं । वैसे ही बुराई की ज्वाला है, जो न केवल कुल एवं समाज को अपितु समूचे जगत को कलंकित कर देती है ॥

दाता निसदिन भूर बिनु, टूक दिए जो स्वान । 
वाके नयन पथ जोगे, तेरे देयन दान ।१०६५। 
भावार्थ : -- हे दाता ! तू जब प्रत्येक दिवस भूले बिना स्वान को रोटी के टूक देता है ।  उसके नयन, तेरे दिए दान की प्रतीक्षा में रहते हैं ॥

पुरइन पावन लाह किए, चरन धरे जो कीच । 
हरिअरु उदरु कंठ गहे, लेवत निजपुर खीँच ।१०५६। 
भावार्थ : -- पद्म प्राप्ति की लालच कर यदि कीचड़ में पाँव रखे तो उस कीचड़ का आकर्षण ऐसा है कि वह धीरे धीरे तुम्हारे चरण पकड़ते हुवे उदर तक पहुँच कर गला पकड़ते हुवे अपनी और खैच लेती है ॥

पुंडरीक कीच उपजै, कीचर माहि बिहाए । 
सोइ पावै मुकुति जोइ, भगवन चरन चढ़ाए ।१०५७। 
भावार्थ : -- पुण्डरीक  कीचड़ में उत्पन्न होता है और कीचड़ में ही विलीन हो जाता है । वह पुण्डरीक मुक्ति प्राप्त करता है जो प्रभु के चरणों में चढ़ता है ॥

दिया पतंग कुसुम बरन, जस जल संग तरंग । 
जग मैं तसहि सुसोहिते, नर नारी के संग ।१०५८। 
भावार्थ : -- जिस प्रकार दिया के साथ पतंगा, कुसुम के साथ वर्ण, जल क साथ तरंग सुशोभित होती है संसार मन उसी प्रकार नर एवं नारी का संग ही सुशोभित होता है ॥

चाहे केतक पीट लो , खर तुरग नाहि होत । 
बोलै पागत पेम सन, जरे ज्ञान के जोत ।१०५९। 

भावार्थ : --  पीटाई करने से मूर्ख बुद्धिमान नहीं हो जाता ।  प्रेम रस युक्त वाणी से समझाने पर बुझी हुई ज्ञान की ज्योत भी प्रज्वलित हो जाती है॥ 

मत मति सरनि चरत जोइ, भाव भीत गहियाए । 
अटकल आनी चाहिये, बानी सबहि बताए ।१०६०।
भावार्थ : -- मस्तिष्क के मार्ग में संचारित विचारों को एवं अंतस के भावों को वाणी व्यक्त कर देती है । इसे समझने की कला आनी चाहिए ॥




शुक्रवार, 13 दिसंबर 2013

----- ॥ दोहा-दशम १०५॥ -----

चूल्हा माटी लिपाए, लकरी अगन धराए । 
कब लग हाँड़ी ना चढ़े, तबलग रहे भुखाए ।१०५१। 

भावार्थ : -- चूल्हा लीप के तैयार कर दिया, लकड़ी में आग भी लगा दी । जब तक हांडी  नहीं चढ़ती तब तक मरो भूखे ॥ 

अर्थात :- दल बन गया, मत भी मिल गए, अब सत्ता की हांडी नहीं चढ़ी तो स्वाद कहाँ से आए सो मरो भूखे ॥ 

बैठे नभ सिहासन जब,चन्दा चरन पसार । 
सरोबर के सुठि सुन्दर, कमलिन कुंचित कार ।१०५२। 

भावार्थ : --  जब नभ -सिंहासन पर चंद्रमा पैर पसार कर विराजित होता है तब वह सरोवरों में खिले सुन्दर कमलों को मुरझा देता है ॥ 

अर्थात : -- जब शासन अत्याचारी हो जाता है, तब वह समाज के सुन्दर गुण रूपी कमल पुष्पों को संकुचित कर देता है ॥ 

जब एक विधान किसी दूसरे विधान का अतिक्रमण करता है तब न केवल  न्यायकर्त्ता को न्याय प्रदान करने में कठिनाई होती है, अपितु समाज सुधारक का कार्य भी संघर्षपूर्ण हो जाता है ॥ 

नारी सोहे नर सोंह, स्वान सोंह स्वान । 
जे नेम बिधि के तेरे, जगत न्यारे कान ।१०५३। 
भावार्थ : -- नारी, नर के संग ही शोभा देती है, कुकरा कुकरी के साथ सुशोभित होता है । गांय एवं बैल का संग ही सुहाता है । यह विधाता ने नियम बनाए हैं । ई हमरी सरकार के तो जगत से न्यारे ही नियम हैं । 

मानौ चाहे न मानौ, बिधि नै किये बिधान । 
जो जग जनम जराए लिए, सो फिर होंहि बिहान ।१०५४। 
भावार्थ : - मानो चाहे न मानो यह विधाता ने विधान बनाया है जो शाश्वत सत्य है । जिसने संसार में जीवन से बंधन जोड़ लिया उसका अंत होना निश्चित है ॥ 

मुख सोंह जापे हरि हरि, हरिअर ना हरियाए । 
हर जुताई भुइँ हरिहरि, हरिअरना हरिआए ।१०५५। 
भावार्थ : -- मुख में हरि हरि का जाप करने भर से सब कुछ हरा भरा नहीं होता ॥ जब भूमि में हल जुताई होती है तब फिर धीरे धीरे वह हरी-भरी होती है 

अर्थात : --विधान लिख देने भर से अपराध नहीं रुकते, उसको पालन करना / करवाना पड़ता है । बने हैं ना...... कितने नियम.....कोई अंदर है...... नहीं......नए कौन सा चिमत्कार करेंगे"। पहले हल जोतो, फिर उत्पादन देखो, फिर यह देखो कि उसमें कितनी उर्वरा और लगेगी..... 

सौहरिदै के भंडार, जन जन क कर दाए । 
जूँ मन मेल मिलित रहे , मिले न दौड़ लगाए ।१०५६। 
भावार्थ : -- अपनी सद्भावना की, मित्रता की सम्पति के भण्डार को जन जन के हाथों में दान देकर फिर चित्त एकात्म होते हैं । मन के घोड़े दौड़ाने से नहीं ॥ 

अर्थात : --"देवालयों की दौड़ लगाने से प्रभु का जोड़ नहीं मिलता,प्रभु का जोड़ भाव से मिलता है" 

आगत सुवागत कर पत, पूज मान बहु दाए । 
आगत के जे करनीय, सोइ गह न मलिनाए ।१०५७। 
भावार्थ : -- आतिथेय का यह कर्त्तव्य है कि वह अतिथि का अतिशय मान सम्मान करे । अतिथि का भी कर्त्तव्य है कि वह अपने आचरणों से अतिथिगृह को गंदा न करे ॥ 

काल का रंग काल है, काल न देइ दिखाए । 
बिषय भोग के चाँदना, काल कहाँ दरसाए ।१०५८। 
भावार्थ : -- काल का रंग काला होता है, वह दिखाई नहीं देता । कारण कि भोग विषयों का चमकारा इतना होता है कि वह कालापन दर्शाने में असमर्थ रहता है ॥ 

पर्बत मुख उन्मुख रहे, चरन धरा के भीत । 
बदरा गगन उड़त फिरी, ते कर भइ पौ जीत ।१०५९। 
भावार्थ : - पर्वत का मुख-मस्तक ऊँचा रहता है, किन्तु उसके चरण धरती में ही धंसे रहते हैं, अत:वायु उसका अहित नहीं कर सकता । बदली आकाश में उड़ती फिरती है, इस कारण वह वायु से जीती जाती है ॥ 

भव सागर ग्रह नख देस, धरती कारावास । 
काटि सकै जोइ बंधन, पावै सोइ निकास ।१०६०। 
भावार्थ : -- इस संसार के ग्रह एवं नक्षत्र राष्ट्र स्वरुप हैं, एवं यह धरती कारावास है । जो इस जीवन-मरण के चक्र को काटने का सामर्थ्यता रखता है, वही यहाँ से छूट सकता है ॥ 




सोमवार, 9 दिसंबर 2013

----- ॥ दोहा-दशम १०३ ॥ -----

तेतक ही मैं निबाहिए, जेतैक सुख प्रभु दाए । 
आपन नीचे देख कै, आगे सोइ अधिकाए ।१०३१। 
भावार्थ : -- जितना ईश्वर ने दिया है उतने सुख में ही निर्वहन कर लेना चाहिए । यदि अपने से नीचे को देखा जाए तो वह सुख भी अधिक लगेगा ॥ 

तासु कौनो खाहीं जौ, कोइ काहु के खाइ । 
ताहि कौनौ खाहीं जौ, कोइ कोउ खा जाइ ।१०३२। 
भावार्थ : -- उसका कोई खाएगा, जो कोई किसी का खाएगा । उसको कोई खाएगा, जो कोई किसी को खाएगा ॥ 

कबीर रहिमन रसखान, फिर तुलसी की बोलि । 
सुर सरित थिरकी अस जस, धरा मेरु धर डोलि ।१०३३। 
भावार्थ : -- कबीर, रहीम, रसखान, फिर तुलसी की अवधी बोली । उसके साथ सुरसरिता ऐसे थिरकी जैसे धरती करधनी धारण किये नृत्य कर रही हो ॥  

पर्बत निचोड़ नदि तरी , छाइ धूप के कोर  । 
रयन निचोड़ ओस ढरी, नयन पलक पट नोर।१०३४। 
भावार्थ : -- उफनती नदियाँ पर्वतों का निचोड़ हैं;छाया, धूप के कोरों(किनारों) का निचोड़ है । ढुलकती ओस, रयनी का निचोड़ है;अश्रु,,नयनों के पलक पट का निचोड़ हैं ॥ 

कलिंद नंदिनि कंज धर, बही चली इतराइ । 
जोई बिंदु कूल लगे, सोई तीस बुझाइ ।१०३५। 
भावार्थ : -- कलिंद नंदिनी यमुना अमृत लेकर इतराती हुई बही चली । जो जल कण तट पर जा लगे केवल उन्होंने ही तृष्णा को शांत किया ॥  

नेम नियामक रचित किए, रुचिकर बारहि बार । 
आगिन पालन कारहीं, तिनहि  होनिहार ।१०३६। 
भावार्थ : -- नियम बनाने वाले, रूचि ले लेकर बार बार नियम तो गढ़े जा रहे है । यह भी ध्यान देने योग्य विषय है कि भविष्य में इन नियमों की पालनकर्त्ता इनकी ही संताने होंगी ॥ 

रघुबर सोंह तापस जुगे,यदूबर सोंह हेम । 
दुहु जग मंगल मूरतें, दुहु सोंह जुगे पेम ।१०३७। 
भावार्थ : -- रघुवर श्री रामचन्द्र  तपस्या /सूर्य से संयोजित हैं यदूवर श्री कृष्ण शीतलता /चंद्रमा से संयोजित हैं अर्थात एक सूर्यवंशी हैं, एक चंद्रवंशी है । दोनों ही संसार का कल्याण करने वाली प्रतिमाएँ हैं, दोनों ही के सह अनुराग संयोजित है ॥ 

साँचे जन जीउते जी, परमम पदवी पाएँ । 
झूठा मरनोपरांत, नीचे ही रहि जाएँ ।१०३८। 
भावार्थ : -- सत्यवादी जीते जी ही परम पद को प्राप्त हो जाते हैं । असत्यवादी मरने के पश्चात भी संसार से नहीं उठते, वे यहीं रह जाते हैं ॥ 

बिरधन के असीर बचन, जूँ बरगद की छाँह । 

वाकी घटनी तब खले, जब बरगद रहि नाह ।१०३९। 
भावार्थ : -- बड़ों के आशीर्वचन,वटवृक्ष की छाया जैसे होते हैं । इनकी न्यूनता तब चुभती है, जब यह वृक्ष नहीं रहते  ॥ 

कुकरम कै सुकरम जौइ, तूरे जगजन भाव । 
जितो धारे ऊँच पीठ, तितौ डारे प्रभाउ ।१०४०। 
भावार्थ : -- कुकर्म हो अथवा सुकर्म हों उन्हें यदि सांसारिक सत्ता से तोला जाए तो जो जितना उच्च पद धारण करता है उसका उतना ही प्रभाव पड़ता है ॥ 

अर्थात : -- यदि आप राष्ट्र प्रमुख होकर कोई कुकर्म या सुकर्म करते हैं, तो उससे न केवल एक राष्ट्र अपितु समूचा विश्व प्रभावित होगा ॥ 

शुक्रवार, 6 दिसंबर 2013

----- ॥ दोहा-दशम १०२॥ -----

मोहन माखन ना देइ, तो सों लेइ चुराए । 
ऐसी छींकी ना बनी, जँह जा दिए लुकियाए ।१०२१। 
भावार्थ : -- मोहन को अपना मख्खन नहीं दोगे या अपना क्रोध नहीं दोगे.....तो वो चुरा लेगा । ऐसी कोई छींकी बनी ही नहीं है जहां उस मख्खन को छिपाया जा सकता है ॥ 

नभ मैं चमकत चन्द्रमा, बैठा निज अस्थान । 
तमस मैं दिरिस मान रहे , अदरस  रहे बिहान ।१०२२। 
भावार्थ : --  दैदीप्यमान चंद्रमा तो नभ में अपने स्थान पर ही विराजित है । जो अँधेरे में तो दृश्यमान है उजाले में अदृश्य है ॥ 

अर्थात : -- १ )चंद्रमा के सदृश्य ही हमारी त्रुटियां भी हैं जो विलासिता की साधन स्वरूपा के चकाचौंध से अदृश्य रहती हैं । साधनहिन् होने पर ये त्रुटियां दृश्यमान हो जाती हैं ॥ 

२)भारतीय वेद-शास्त्रों एवं पुराणों ने ग्रहों एवं नक्षत्रों की सटीक गणना की हैं, किस साधन से की, यह तो सत्य है कि वर्त्तमान की तुलना में उस समय भाषा अत्यधिक सुसंस्कृत थी तो क्या शब्द साधन से, ध्वनी से, किसी यन्त्र से, किससे ? क्या उस समय की भौगोलिक स्थिति ऐसी थी कि वे शुद्ध नेत्रों से ही दिखाई देते थे ?क्या रात और भी अधिक श्यामल थी ? फिर क्या हुवा ?रयनी न होती तो हमें चाँद-तारे दिखाई नहीं देते.....

कहत सचिव मैं दास हूँ, बसा जा राउ बास । 
नैनन धूरहि झौंक के, चढ़त फिरै आकास ।१०२३। 
भावार्थ : -- लोकतंत्र का मंत्री-प्रधान मंत्री यह कहता हुवा कि मैं तो जनता का दास हूँ, राजा के निवास में जा बैठा और आँखों में धूल झोकते हुवे अब आकाश में उड़ता फिर रहा है, एतना तो राजा लोग भी नहीं उड़ते थे ई कौन सा तंत्र है भाई ॥ 

काम कलिंजि भाउ चढ़े, सो तो काचा रंग । 
काम घटाए भाउ घटे, जूँ जल घटा प्रसंग ।१०२४। 
भावार्थ : -- काम के आवरण चढ़ा प्रीत का रंग कच्चा होता है । काम के घटते ही यह भी ऐसे घटता है, जैसे जल के घटते ही घटा का रंग घटता है ॥ 

कथन किये बन बाटिका, भाव किये बनराइ । 
सूक्ति ऐसो देस जँह, ज्ञान गंग बहि आइ ।१०२५। 
भावार्थ : -- कथन जहां वन वाटिका है, भाव जहां पेड़-पौध हैं ॥ सूक्ति ऐसा देश है, जहाँ ज्ञान की सुरसरिता प्रवाहित होती है ॥ 

रट्टु तोता रटत रहे, देवत जपनी राम । 
भाव लहे न ज्ञान गहे, सोइ नाम किस काम ।१०२६। 
भावार्थ : -- रट्टू तोते को राम नाम की जपनी दे दो वह उसे ही जपता रहेगा ।  न तो वह उसके भाव समझेगा न ही उस भाव से ज्ञान ग्रहण करेगा ऐसा रटा रटाया राम का नाम किस काम का ॥ 

पुजारी की भगतिहि का, रहत गहत का दान । 
अघहाए की बिरक्ति का, जग माने का मान ।१०२७।  
भावार्थ : -- पुजारी कि केसी भक्ति प्रभु सेवा तो उसका कार्य है, भरे पूरे का दान क्या, देने के पश्चात वह फिर भर लेगा अर्थात भरेपूरे का दान त्याग में है। तृप्त मानस की विरक्ति क्या, जो जग में जानामाना हो उसका मान क्या ॥ 

जनमन तबहि मान रहे, समउ पर मरनि होए । 
बिरधा बढ़नी बैस के, पूछ रहे ना कोए ।१०२८। 
भावार्थ : -- उचित समय पर मृत्यु हो तभी लोगों के मन में सम्मान रहता है । वृद्ध की बढ़ती आयु को फिर पूछने वाला कोई नहीं होता ॥ 

नाउ समंदर डारि दिए, बही बहि जेहिं ओर । 
सारे पंथ भूरी गए, मिला न वाकू छोर ।१०२९। 
भावार्थ : -- नाव तो समुद्र में उतार दी, वह उधर ही बही जिधर की हवा थी ॥ सारे मार्ग फिर भूल पड़े उसे तट नहीं मिला ॥ 

अर्थात : -- नाव उधर जानी चाहिए  जिधर किनारा हो, न की जिधर की हवा हो"

एक दीपक के बारते, सकल भवन उजराए । 
एकै माछरी के होत  , सकल ताल मलिनाए ।१०३०। 
भावार्थ : -- एक दीपक प्रज्वलित होते ही सारे घर में उजाला हो जाता है । एक मछली के होते सारा तालाब मैला हो जाता है ॥ 

अर्थात : -- एक सुसंतान सारे कुल का नाम उज्जवल कर देती है, एक कुसंतान सारे कुल को कलंकित कर देती है ॥ 



मंगलवार, 3 दिसंबर 2013

----- मिनिस्टर राजू 118 -----

" राजू ! कल तुम एक 'अंतरतम प्रसंग' लघु रूप में लिख कर लाना ठीक "

राजू : -- मास्टर जी ! अंतरतम प्रसंग किसे कहते हैं ?

" अंतरतम प्रसंग.....हाँ, सुनो : -- हमारी एक भोजाई है उनके पिताजी बड़े पहुंचे हुवे महात्मा हैं । बड़े एवं पहुंचे हुवे इस लिए कि उन्होंने बड़ी बड़ी शल्य क्रियाएँ असफल कर दीं माने की बड़े बड़े आपरेसन फेल कर दिय़े । और इनके इस फेलवर आपरेसन से जो फूल सी मूंगफली हुई उसे खाने के लिए उसके साइज के हमारे सारे काजू तैयार बैठे थे । किन्तु वह बोली मैं दो छिलके वाली( डबल स्टेटस) तुम बिना छिलके वाले( स्टेटस लैस)  छि छि तुम्हारे पेट में कौन जाएगा"

राजू : -- फिर का हुवा.....मास्टर जी !

" फिर का होना है वो चली गई एक छिलके वाले बादाम के साथ"

सोमवार, 2 दिसंबर 2013

----- ॥ दोहा-दशम १०१॥ -----

एक लगन लगे बिनु लगन, एक लगन लग्नाए । 
दुनहु लगे जनिमन जने, सो वो गृहस कहाए ।१०११। 

भावार्थ : -- स्त्री-पुरुष चाहे विवाह बंधन बाँध के साथ रहें चाहे बिना बंधे साथ रहे । बच्चे तो होंगे ही, जनसंख्या तो बढ़ेगी ही । प्राचीन समय में स्त्री पुरुष का परस्पर सम्बंध स्थापित होते ही उसे विवाहित घोषित कर दिया जाता था और वह गृहस्थ कहलाते थे विवाह की रीतियाँ औपचारिकता मात्र है यह स्त्री पुरुष में परस्पर सुसंबंध स्थापित कर सृष्टि को निर्बाध स्वरुप में संचालन करने का अनुज्ञा पत्र है माने कि लाइसेंस है अब कोई गाडी कैसे भी चला ले दुर्घटना तो होबेच करेगी । तो एकल विवाह पद्धति माने : -  एक स्त्री का एक ही पुरुष से एवं एक पुरुष का एक ही स्त्री से सुसंबंध ॥

पालनौ घर घारी कै, बैठा डोरि दुलाए । 
पाए जनमन गोद धरे, कै जननी जन्माए।१०१२। 
भावार्थ : -- ढुंड मैं पालणो घाल कै बैट्ठे डोरी दुलाणो स पुत( संतान)  होवोगो के । घर में संतान या तो गोद लेने से या फिर माता के जन्म देने से होती हैं ॥

अर्थात : --  "कल्पना मात्र से कोई कार्य सिद्ध नहों हो होता, उस हेतु प्रयास भी आवश्यका है"

काम क्रोध मद लोभ मह, कभु न लगन बिलगाउ । 
जे तौ घन छबि छन सौंह, दै गत जा पछिताउ ।१०१३। 
भावार्थ : --  'काम, क्रोध, मान, लोभ जैसे धन का लोभ' के कारण अपने सम्बन्ध न बिगाड़ें । ये सब कारक अज्ञान स्वरुप मेघ की ज्योत सदृश्य है, जो पछतावे के आँसू देकर लौट जाते हैं ॥

जों हरिदै हरि हिय मिले, होत हरित हरियार । 
गहनइ गाँठी मारि कै, दैं सकल न्यौछार ।१०१४। 
भावार्थ : -- अपने ह्रदय से ज्यों ही हरि का ह्रदय मिल जाए फिर हरि के ही रंग में रंगते हुवे पहले एक गहरी गाँठबांधे फिर उनपर अपनी सारी भक्ती न्यौछावर कर दें ॥

सजनी सों ससुराल मैं, साली की अस राछ ।
जस पेम दधि बिलोइ कै, मिलि सनेह सह छाछ ।१०१५ । 
भावार्थ : -- ससुराल में सजनी के साथ साली का मिलना ऐसा है,  जैसे मुहब्बत की मीठी दही बिलोने पर मख्खन के साथ खट्टी छाछ मिलती है किसी किसी को छाछ वेस्ट ( बिशिष्ट,बेस्ट नहीं रे बाबा ) प्रोडक्ट माने की अवशिष्ट उत्पाद लगती  लगती है, बड़ी साली को डेढ़ छाछ भी कहते हैं ॥ 

सृजन सन जे प्रान जोग, जुगे परस्पर बाँध । 
बाँध रहे ना कछु लहे, बरे अगन चढ़ काँध ।१०१६। 
भावार्थ : -- सृष्टि के साथ यह जीवन-योग ( पृथ्वी, अग्नि, वायु , जल, आकाश )  एक आकर्षण के अंतर्गत योगित है । यह आकर्षण जब विकीर्णित हो जाता है  तब कुछ नहीं बचता, कंधे पर चढ़ कर जलना ही शेष रह जाता है ॥ 

मुखिया भगत सरूप है, जन जन भगवन पाँव । 
वाकी सेवा भाव है, मंदिर वाका गाँव ।१०१७ । 
भावार्थ : -- लोकतंत्र का मुखिया भक्त स्वरुपम है, प्रत्येक व्यक्ति भगवान के चरणों के सदृश्य है । उसकी सेवा ही से सत्ता है, भक्ति है, प्रेम है, उसका वास स्थान ही मंदिर है ॥  

जगत जोत,जूँ चंद्रमा, जातक चाव  चकोर । 
आठों जाम मगन रहे, आहोर भूरि बहोर ।१०१८। 
भावार्थ : -- यह जगत की जोत चमकते हुवे चंद्रमा के समान है । जीवों का इसके प्रति आकर्षण चकोर के सदृश्य है । ये चौबीस घंटे इसी में मग्न रहते हैं,यह भूल जाते हैं कि इस जगत में आए हैं तो जाना भी है ॥ 

फिरकी के सोंह फिरत, चित जौंह फेरि फिराए । 
मति खन खूँटे बाँधि कै , फेर धिआन लगाए ।१०१९। 
भावार्थ : -- फिरकी के जैसे फिर कर यह चित्त यदि फेरी फिराता हो , तो इसे मस्तिष्क खंड के खूँटे से बाँध दें तदोपरांत  किसी विषय में ध्यान केंद्रित करें ॥ 

बातन की ओढ़ान लै, चढ़ा बचन के रंग । 
बने सचिव छाँड़ेसि जूँ, केंचुरि तजे भुजंग ।१०२०। 
भावार्थ : -- बातों का आवरण लेके, उसपर वादों का रंग चढ़ा के, लोग जब नेता-मंत्री बनते हैं, तो वह उसे ऐसे छोड़ते हैं जैसे सांप केचुली त्याग रहा हो ॥






शनिवार, 30 नवंबर 2013

----- ॥ दोहा-दशम १००॥ -----

दिन मह सांती ना परे, राते नीँद न आए । 
सुख वासे भागा फिरै, जो पिय लाग लगाए ।१००१। 
भावार्थ : -- दिन में तो शान्ति नहीं मिलती रात को नींद नहीं आती । उससे सुख दूर दूर भागता है जो प्रीतम से झगड़ा/अनुराग करते हैं ॥

तापस गुन बरनन चली, लिख लिख थकि मसि बिंदु । 
तापस बिनु नहि सोधिते, मानस सुबरन सिंधु  ।१००२।   
भावार्थ : -- तापस एक बहु अर्थी शब्द है वर्णिका इसके गुण-प्रसंशा करते थक गई पर इसके  गुणों का वर्णन न हो सका । तपस्या के बिना मनुष्य, अग्नि के बिना स्वर्ण एवं सूर्य के बिना समुद्र शोधित नहीं होते ॥

जो धन धाम को ललसे, बाजें आठों जाम । 
बैठे चित सांती धरे, जोई पूरन काम ।१००३। 
भावार्थ : -- जो विलासिता की साधन स्वरूपा , सत्ता के लालची हैं, वे चौबीस घंटे लड़ते रहते हैं । जो पूर्णकामी होते हैं वह शान्ति से बैठ कर कथा-कोबिता लिखते हैं ॥

जग जन्में जेतक जीउ, सबहि नाथ के अंस ।  
फरत निज निज चरित बिटप, सब भव कौनौ बंस ।१००४। 
भावार्थ : -- इस संसार में जितने भी प्राणी है सभी उस ईश्वरीय महत्तत्त्व के युग्म हैं ॥ सबका कोई वंश वृक्ष है,अपना अपना वंश इतिहास है, किसी का ज्ञात है किसी का अज्ञात ॥

अर्थात : -- "जाति और धर्म वह कुंजी है जिससे जीवों के उत्पत्ति मूल का अन्वेषण किया जा सकता है" ।

रजस तमस भए सात्विक, पाए जोग गुन ग्राम । 
तपो भूमि बल भयउ निधि, बालमीकि श्रीराम ।१००५ । 
भावार्थ : -- उत्तम वातावरण का प्रसंग प्राप्त कर तामस या राजस भी सात्विक प्रकृति के हो जाते हैं । तपोवन का पवित्र वातावरण प्राप्त कर उसके  बल से राजस प्रकृति के राम,  तपस्वी श्री राम भगवान हो गए  एवं तामस प्रकृति के रत्नाकर, तपस्वी महर्षि वाल्मीकि हो गए ।

अर्थात : -- " वातावरण उत्तम होने से डाकू भी संत हो जाते हैं । और दूषित वातावरण में संत भी डाकू हो जाता है"

दिन के पहरी दिवाकर, रात के पै मयूख । 
जग जगती पहरे काल, नारि पहरे पुरूख ।१००६। 
भावार्थ : -- दिन का प्रहरी दिनकर है, रात का चंद्रमा है । घर-संसार का प्रहरी समय है, नारी का प्रहरी पुरुष है ; प्रश्न यह है कि पुरूष किसके पहरे में है ? 

भासित बचन निसुबारथ, कहत करन कल्यान । 
तिनके हेतु जग तारन , न कि सहमती अदान ।१००७। 
भावार्थ : -- सुभाषित वचन संसार का कल्याण करने के लिए निस्वार्थ स्वरुप कहे जाते हैं । इनका मूल उद्देश्य उद्धार करना होता है, न कि सहमती प्राप्त  करना ॥ 

अर्थात : -- सुभाषित वचन संसार का सत्य दिखाते हैं , सत्य आचरण का विषय है, भाषण का नहीं ॥ यदि किसी सुभाषित वचन से जग का कल्याण होता हो तो वह वचन सोना है,यदि उस वचन से संसार के सह स्वयं  का भी कल्याण होता हो तो वह सोने पे सुहागा है । निकृष्ट व्यक्ति केवल स्वयं के कल्याण के लिए जीवित रहता है ॥ 

बछल नै सुख संपद के, भरे जगत भण्डार । 
भगत का कछु भाग नहीं, घटबइ सेवनहार ।१००८। 
भावार्थ : -- ईश्वर ने जगत में सुख कि सम्पदा के भण्डार भर दिए हैं । अब भगत अभागा ही रहा , अवश्य ही सेवा करने वालों ने घटाया है, उन्होंने तेरे भाग्य में डंडी मारी है ॥   

अजहुँ तेरे भाग जुगे, सब साधन कल्यान । 
कृत कारज कर जोग ले, पलक होत अवसान ।१००९। 
भावार्थ : -- अभी तो तेरे सौभाग्य में कल्याण के सारे साधन जुड़े हैं यह शरीर है, कल्याण करने योग्य युग है, योग्य देश है, काल है, परस्थितियाँ अनुकूल हैं । अत: तू  कल्याण कारी कार्य करके पुण्यों का जुगाड़ कर ले अन्यथा यह काया क्षण भर में ही मर जानी है ॥ 

कह पिय प्रिया लाल बदन, बरती छन छबि जोह । 
छन मैं चमक चमक उठे, छन मैं घन पिछु सोह ।१०१० । 
भावार्थ : -- प्रियतम का कहना है : -- प्रिया के मुख का क्रोध और लज्जा दोनों मेघप्रभा के सदृश्य हैं । जो क्षण में चमक चमक के दर्शित होती है, क्षण में मेघों के पीछे शोभा देती है ॥ 



गुरुवार, 28 नवंबर 2013

----- मिनिस्टर राजू 117 -----

राजू : -- मास्टर जी ! ई हमरे देस के मूर्खाधिस टेक्स तो इतना लेते हैं, की देस हाईबे बन जाए.....अब एक ठो टुबलाइट, एक ठो सीएफल , औउर एक ठो फ्यूज बलब लगा के, एक ठो तोरण बना के, बैठे हैं दूकान सजा के.....अब आप ही बताइये इस पगडण्डी का कोई टोल टेक्स देगा का ?

" राजू ! इनको तो लोगों को ठगना भी नहीं आता, एक ठो मर्करी लगा देते तो एकदम हाईबे लगता.....

शनिवार, 23 नवंबर 2013

----- ॥ दोहा-दशम९९ ॥ -----

बिय बोत क्यारि क्यारि, जब लग मिलै सिँचाइँ । 
फुरत फरत जे फुरबारि, तब लग फर फुर दाइँ ।९९१। 
भावार्थ : -- क्यारियों में बीज बोई हुई इस फुलवारी को जब तक सिचाईं मिलेगी । यह तब तक ही फूलेगी फलेगी और फलफूल देगी ॥ 

एक गुनित एक फल एक ही, दो जग ओ फल चार । 
ऐसोइ अंरात्मनम , माने सब संसार ।९९२ । 
भावार्थ : -- एक गुणित एक = एक होता है, दो+दो =चार होता है,  जैसे यह सर्वमान्य है । वैसे ही यह अंतरात्मा भी सर्वमान्य है ॥ 

जाने जनमन पाहिले, अरु मरि के पश्चात । 
सोइ करे न एतिकेत, न एतिक नीच निपात।९९३ । 
एतिक = इतना 
एत = पाप 
भावार्थ : -- जो अपने जन्म के पूर्व एवं मृत्यु के पश्चात की गति जान ले । फिर वह न तो इतने पाप करे, न ही इतना नीचे गिरे ॥ 

मुखिया अगजग की गति, जानपन निज नियंत । 
मति भइ वाकी भाँवरी, अरु मान के न अंत ।९९४ ।  
भावार्थ : -- यह मुखिया स्वयं को समस्त चराचर की गति का नियंता समझ रहा है । इसकी मति भ्रमित हो गई है, इसके घमंड का ठिकाना नहीं (ये सारे रावण के लक्षण हैं )। 

बुढ़ताई अरु जुबता, केस रंगे न होइ । 
एक बयोगत हानि होत, दुजी बै संधि जोइ ।९९५ । 
भावार्थ : -- बुढ़ापा और युवता अर्थात अनुभव एवं ज्ञान , केस रंगने से प्राप्त नहीं होता ॥ एक समय व्यतीत करने से दुसरा बाल्य एवं तारुण्य काल के संग्रहण से अर्थात पठन -पाठन से प्राप्त होता है ॥ 

बिचार भया अंतरतम, काया भई कहाउ । 
भाव वाकी जाति भई, सार वाका सुभाउ ।९९६ । 
भावार्थ : -- यदि विचार आत्मा है तो शब्दोक्ति काया है । भाव उसका उत्पत्ति स्थान है, और सार उसका धर्म है ॥

अन महातम का जाने, जो ना देखा भूख । 
गहनी तमि के पीर को, भाने न प्रत्यूख ।९९७ । 
भावार्थ : -- जिस प्रकार गहरी रात्रि की पीड़ा को प्रभात नहीं जानता । उसी पकार जिसने भूख न देखी हो उसे अन्न के महात्मय का ज्ञान नहीं होता ॥ 

मानख निसदिन पंच बन , करता फिरै न्याय । 
तेरे कारे करम को  , कहू कहाँ निर्नाएँ ।९९८। 
भावार्थ : -- रे मनुष्य ! दूसरों का न्याय करते हुवे तू बड़ा न्यायाधीश बना फिरता है । ये बता जो तेरे पापकर्म हैं उसका निर्णय कहाँ हो ॥

अंतर सौर भँवर बहिर, दोइ बयस मैं जाए । 
बुद्धि बल सों आपनी, भा निज प्राण सिराए ।९९९। 
भावार्थ : -- यह अंतरात्मा सौर मंडल की परिधि से दो ही अवस्था में बहिर्गमन करती है । या तो अपने बुद्धि के बल पर या फिर देहावसान होने पर ॥ 

तेरे चरन सौर भँवर, बहिर गमन किए जोह । 
रे मानव होहि जाने, कस कस सत तव सोंह ।१०००। 
भावार्थ : -- हे मानव ! जब तेरे चरण, सौर मंडल की परिधि से बहिर्गमन करेंगे तब जाने कैसे कैसे सत्य तेरे सम्मुख होंगे ॥ 




बुधवार, 20 नवंबर 2013

----- मिनिस्टर राजू 116 -----

राजू : -- मास्टर जी ! हमारी सरकार इस नए नवेले रतन को पीपर की पत्ती पकड़ाए इससे पहले इसे तनिक सऊर सिखाना होगा.....काहे की इसके बाद जदि बो तेल-कंघी बेचेगा तो पड़ोसी हँसेंगे । और जब पड़ोसी हँसेंगे तो कितना बुरा लगेगा नई.....

" हम्म ! मैने तुम्हे अमरीकी लोकतंत्र पर निबंध लिख के लाने को कहा था, लाए ?"

राजू : -- नहीं मास्टर जी ! काहे की वहाँ लोकतंत्र जैसी कोई बात नहीं लगी । उनका दरबार किसी मुग़ल दरबार से कम नहीं है, और वो महल कौनों निशानी लगता है, और राष्ट्र प्रमुख? वो तो शाहजहां से थोड़े ही कम तर थोड़े ही हैं ।  बाज़ार में वही रौनक, वही शाहे हजरत, हाय ! कम्बख्त वही पाक मोहब्बत,

" सादा खोरी भीत करिया भूत' तुमको वो शाहजहां दिखाई देता? अरे शाहजहा ऐसे ऐसे महल में अपनी मारी बेगम को गड़िया के, फिर दुसरा महल बना के उसे दूरबीन से देखते थे.....कहीं ज़िंदा तो नहीं है ऐसे तहकीकात के लिए,

राजू : -- हाँ तो का हुवा मास्टर जी ! उनकी भी मोहबबत का इंतकाल कहाँ हुवा है.….उ करिया खोरी बाला प्रोजक्ट उन्हें दे देते हैं, फिर वो भी देखा करेंगे..... 

मंगलवार, 19 नवंबर 2013

----- ॥ दोहा-दशम ९ ८॥ -----

मित रिपु के बल बुद्धि को, सागर के सम लेख । 
वासे पारन पावनै, अपनी जुगता देख ।९८१। 
भावार्थ : -- मित्र हो या शत्रु हो उसका बल एवं विद्वत्ता को लघुत्तम नहीं आंकना चाहिए, अपितु उसे समुद्र के सरिस विशाल समझ कर फिर उससे पार पावन हेतु अपनी योग्यता का आंकलन करना चाहिए । तैरना आए तो तैर कर उड़ना आए तो उड़ कर अन्यथा ? सेतु बाँध कर उससे पार पाया जा सकता है ॥

कोकिल एकै कू कूकिए , हेरत फिरै मुढ़ान । 
बारम्बार कू कू किए, लोग दिए ना ध्यान ।९८२। 
भावार्थ : -- कोयल के एक कू कूकने से लोग उसे मुंडेरों पर ढूंडते फिरते हैं । किन्तु जब वह वारंवार कूकती फिरती है तो कोई ध्यान नहीं देता ॥

गुरुबर के परसन सीस, सोन भया ना जोह । 
भा गुरु नाहीं पारसा, भा सीस नहीं लोह ।९८३। 
भावार्थ : -- गुरुवार के स्पर्श से यदि शिष्य स्वर्ण नहीं हुवा, तो इसका अर्थ यह है कि या तो वह गुरु पारस नहीं या शिष्य लोहा नहीं ॥

जेतक पातक जोग लिए, तिन गठरी दे आँट । 
पाए औसर नौ पुन कर, देखत देहरि बाट ।९८४। 
भावार्थ : -- जितने भी पाप संचित किए सो किए, अब उन्हें एक गठरी में बाँधते हुवे प्रतीक्षारत होकर अवसर पाते ही नए पुण्य करने चाहिए, जिससे विश्व का कल्याण हो ॥

हरिन धरा हरियर करे, सूर करे उजियार । 
सकल जीव जगती के, मानख पालनहार ।९८५।
भावार्थ : -- जगत नियंता ने सभी को अपने अपने कर्त्तव्य सौप रखे हैं, जैसे हरियाली धरती को हरी-भरी करे, सूर्य उसमें उजाला भरे, और इस समस्त सृष्टी की मानव रक्षा करे, भक्षक बनकर इसका नाश न करे ॥

जीवन मैं जब आपदा, कंठ फांस हो जाए । 
कै तिन्ह कंठ लिए फिरौ, कै चलौ सुरीझाए ।९८६। 
भावार्थ : -- जीवन के पथ पर संचरण करते हुवे विपत्तियां तो आएंगी ही, जब इतनी हो जाए कि गले की फांस लगने लगे फिर या तो उन्हें लिए फिरो, या  उन्हें सुलझाते चलो ॥

मागु मागु परिहार कै, धरें मुख देहुँ देहुँ । 
जिनके दिए जग उद्धरे, तिनके सकल सनेहु ।९८७। 
भावार्थ : -- भिक्षा वृत्ति का त्याग कर दानी की प्रवृत्ति अपनानी चाहिए । जिनके दान से संसार का उद्धरण होता है उनके सभी स्नेही हो जाते हैं ॥ 

जेन केन प्रकार देन, तुलसी हो कल्यान । 
जब दिए जगत अहित करे, तब बर होत अदान ।९८८। 
भावार्थ : -- गोस्वामी तुलसी दास ने कहा है  : -- जिस किसी भी प्रकार से दिया जाए, दान कल्याण कारी होता है । किन्तु जब यह दान संसार हेतु का अहित कर हो,  तब न देना ही उत्तम है ॥  

गुरु के सदगुन गहे नहिं, लहे नहिं गुरु ग्यान । 
रंगे भेस केस रखे, सो तो भूत समान ।९८९ । 
भावार्थ : -- न तो गुरु के सगुन ग्रहण किये, न उनसे ज्ञान ही प्राप्त किया । कोई चुटिया रखे है, कोई एक धोतनी लपेट कर महात्मा बन गया है किसी ने कपडे भगवा कर लिए ये सारे कपट वेश धारी शिष्य न होकर भूत के समान हैं ॥ 

लम्मा धोता लम्मा पोथ, लम्मा तिलक लगाए । 
बिलास भवन बास करे, कपट भेस कहलाए ।९९०। 
भावार्थ : -- लम्बी तो धोती पहन ली, लम्बी पोथी धर ली, लंबा सा एक तिलक लगा लिया । विलासिता के भवन में वास किये ऐसे लोग पाखंडी कहलाते हैं ॥ 


----- मिनिस्टर राजू 115 -----

" राजू ! आज तू मुझे ये बता, कि यदि ये इक्यालिस,बयालीस, तिरालिस भारत के रतन हैं  तो वे महा आत्मा गांधी क्या थे 'पत्थर?'

राजू : -- अरे नई रे ! मास्टर जी! ये भी पत्थर हैं और वे भी पत्थर हैं । अंतर ये है कि वे  बिड़ला हाउस के हैं, ये टाटा हाउस के हैं

" अच्छा ! अच्छा !! मैने तुम्हे कल पत्रकारिता प् निबंध लिख के लाने को बोला था चलो बोल के दिखाओ ?

राजू : -- जी मास्टर जी ! .....अब ये दल मैदान में उतरे.....कमल कमल कमल कमल.....पंजा पंजा पंजा पंजा.....झाड़ू..... बस आज के समाचार समाप्त हुवे.....मास्टर जी ! हो गई जर्नलिज्म.....

" मैंने तुझे निबंध लिख के लाने को बोला था कि हलाकू" 

शुक्रवार, 15 नवंबर 2013

----- ॥ दोहा-दशम ९ ७ ॥ -----

कलजुगी कुटुंब कहान, जूँ पीपर के मूर । 
घर घर भित्ति फोरी के, निकसी गवनै दूर ।९७१।   
भावार्थ : -- कलयुगी कुटुंब की कहानी ऐसी है, जैसे की पीपल-जड़ की कथा हो ॥ जो घर घर के भित्तियों को फोड़ कर दूर फैली हुई है ॥

जीवन पंथ मरन पँवर, भयऊ साँच बिहान । 
जनमन सौ ओहार है, मरनी के न ओढ़ान ।९७२। 
भावार्थ : -- जीवन पंथ में मृत्यु की दहलीज अंतिम सत्य है । जन्म के सौ द्वारावरण हैं (अर्थात सौ झूठ हैं) , किन्तु मृत्यु का कोई आवरण नहीं है ॥

बरता सूरज साँच है, वासे पीठ फिराए । 
तामस गुण के गान किए, असत अँधेर घिराए ।९७३। 
भावार्थ : -- जलता हुवा सूर्य परम सत्य है । उससे पीठ फेर लेने से फिर अज्ञान और आलस्य रूपी दुर्गुणों का बखान करते हुवे असत्य का अंधेरा घेर लेता है ॥

एक दया अरु एक किरपा, दोनउ दिरिस समान । 
एक धर्म चरन संजुगी, दूजी जोगे दान ।९७४। 
भावार्थ : -- दया और कृपा एक समरूप दृष्टिगत होती है । दया धर्म के आचरणों से संयोजित है।जबकि कृपा, दान की प्रतीक्षा करती वियोजित है॥

तासु संजोइँ होइँ बर, जे भा मन प्रत्येक । 
जाकी जोइँ जोग जुगी, सोई भई प्रबेक।९७५। 
भावार्थ : -- प्रत्येक व्यक्ति का मन यह चाहता है कि, उसका सभी कुछ श्रेष्ठ हों । किन्तु जो कुछ उपयुक्त होते हुवे योग्य होता है, वही उत्तम है ॥

निसवारथ को बचन कह, सो तो भयऊ साँच । 
जब हितेच्छा हेतु लह, बहोरि सौचहु राँच ।९७६। 
भावार्थ : -- निस्वार्थ स्वरुप में कोई कथन किया जाए,  तब वह सत्य का रूप ले लेता है । जब उसका उद्देश्य मंगलाकांक्षी होकर परहितकारी हो फिर वह शुद्धता से भी अनुरक्त हो जाता है ॥

सीप मुख जल मुकुति भया, साँप मुख बिषकार । 
जाके जैसी भावना, तैसेहिं करि बिचार ।९७७। 
भावार्थ : -- सीप के मुख जल मुक्ता स्वरुप हो जाता है और सर्प के मुख में वही जल विष का रूप ले लेता है । जिसकी जैसी भावना होती है वह वैसे ही विचार करता है ॥ 

अर्थात : -- "शब्द एकरूप है, किन्तु स्वभाव की भिन्नता के कारण विचार भिन्न हो जाते हैं "

अस्थिहि माँस सोंह ढके, माँस ढकाईं चाम । 
मति ढके क्रोध मद लोभ,ज्ञान को मनोकाम ।९७८। 
भावार्थ : -- अस्थियाँ  माँस से ढकी है,माँस चर्म से ढँका है । बुद्धि को क्रोध मद और लोभ ढके हैं, ज्ञान मन की कामनाओं से ढका है ।। 

सत्ता के सुख साँस की, आँच लेख ना पाए । 
जाननी की बरती चिता, सोंह खिंच लिए जाए ।९७९ । 
भावार्थ : -- सत्ता के सुख कारी सांस की आंच का वर्णन नहीं हो सकता । यह ऐसी कसूती है कि सम्मुख माता की चिता जल रही और यह खिंच कर ले जाती है, अर्थात यह माँ जैसे पवित्र शब्द का भी लिहाज नहीं करती ॥ 

एक लगन को लाग कहें, एक लगन कहें लाग । 
एक जगाए जगती जोत, दूजी लगाए आग ।९८०। 
भावार्थ : -- एक लगन को प्रेमलगन कहते हैं एक लगन को वैराग्नी कहते हैं ॥ एक घर-संसार ज्योतिर्मय कर देती है, दूजी उसमें आग लगा देती है 

  

गुरुवार, 14 नवंबर 2013

----- मिनिस्टर राजू 115 -----

" राजू ! तुमने इच्छा धारी नागिन के बारे में तो सूना होगा, कभी इच्छा धारी आदमी को देखा है ? " 

राजू : -- नहीं मास्टर जी ! क्या आपने देखा है ? 

 हाँ.....! दूरदर्शन में.....बड़ा ही दुर्लभ प्राणी है.....सारे संसार में एक ही है और वो भी अपने भारत में.....उसकी इच्छा करते ही केवल संकेत मात्र से राष्ट्र पति की चलती कलम रुक जाती है.....उस की इच्छा करे तो वो अब्बी के अब्बी देस का प्रधान मंत्री बन जाए.....बता है कहीं ऐसा और कोई.....

बुधवार, 13 नवंबर 2013

----- मिनिस्टर राजू 114 -----

" राज्जू ! मन्न यो बता कि जवाहर,इंद्रा ओर राजीव मैं के समरूपता है ? 

राजू : -- मास्टर जी ! तीन्नोई रतन हैं, दो न तो रतन ओर महामात्य जामे, तीसरा न मधुमेह का रोगी जाम दिया.....जाँच कराओ इसकी" 

" मैने अंतर बूझ्झा ? " 

राजू : -- ना मास्टर जी !

" इब जितना बुझ्झूँ उतना बताइयों.....यो बता राजीव , कमल और अरविन्द के समरूपता है" 

राजू : -- मास्टर जी ! तीन्नोई 'फूल' हैं 

 " अच्छा ! तै के है" 

राजू : -- मास्टर जी ! ब्यूटीफूल,

" अच्छा! अच्छा !! वा मिठाई के थी फूल्लन देबी ? 

राजू : -- मास्टर जी ! उसका के बेरा, वा मैने थोड़े ही खाई थी, के तो वो जाणे, जिसने खाई थी के हलवाई जाणे 


सोमवार, 11 नवंबर 2013

----- ॥ दोहा-दशम ९६ ॥ -----

सून के नाहि मान को, सून के न को मोल  । 
पर जिन्ह अंक जा जुगे, वा सो ना को तोल ।९६१।
भावार्थ : -- शून्य/आकाश//ईश्वर का कोई मान नहीं होता, शून्य का कोई मूल्य भी नहीं होता । किन्तु जब यह किसी अंक के साथ संलग्न हो जाता है, तब फिर उस अंक का कोई तोल नही होता ॥  

जब लग बिटप लगी रहे, तब लग रसन समोए । 
काची काची इमराइ, मीठी ऐसे होए ।९६२ । 
भावार्थ : -- जब तक पेड़ में लगी रहती है,  तब तक वह रस ग्रहण करती है । कच्ची कच्ची इमली, पककर ऐसे मीठी होती है ॥ 

अर्थात : -- "जीवन सोपान सभी पथ तय करके ही परिपक्वता आती है" 

सोइ पुनि पुरुख कहाँ गए, कौन दिसा गहियाए । 
का तिन धरती लील गइ, समउ सकेरत खाए ।९६३। 
भावार्थ : -- जो संसार का कल्याण करने हेतु उत्पन्न हुवे थे वे पुण्यात्माएँ  कहाँ गई क्या उन्हें धरती लील गई या समय संकलित कर खा गया ॥ 

बुरे लोग के समुदाए, चारिन करत बढ़ाइ । 
आपस माह रन छेड़ के, लरत भिरत मरि जाइ ।९६४। 
भावार्थ : -- दुर्जनों के समुदाए में चार लोगों की प्रशंसा कर दो । फिर तो उनमें युद्ध छिड़ जाएगा और वे आपस में ही लड़ भीड़ के मर जाएंगें ॥ 

तीन लोक की सम्पदा चाहे लरत भिराए । 
लाभ लबध कीर्ति सोंह, लोभ न जीता जाए ।९६५। 
भावार्थ : --लाभ लब्ध कीर्ति के सह लोभ के साथ चाहे तीन लोक की सम्पदा क्यों न लड़ भिड़े वह उससे नहीं जित सकती ॥ 

पद पद जनता जनार्दन, भुगत बहु ब्यभिचार । 
सासन अरु प्रसासन को, देईं बहुसहि गार ।९६६। 
भावार्थ : -- प्रतयेक स्थान की जनता जो कि जनार्दन है बहुंत ही व्यभिचार भुगत ली । अब वह शासन और प्रशासन को दुर्वादन प्रेषित कर रही है ॥ 

तामस गुन के गान किए, बिरित गई तम रात । 
गगन उयत नउ भानु कहि, सीखौ नइ नइ बात ।९६७। 
भावार्थ : -- अज्ञान आलस्य क्रोध रूपी दुर्गुणों का गान कर, गहन अंधेरी यामिनी व्यतीत हो गई । गगन में उगता हुवा नया सूर्य कह रहा अब नई नई बातें सीखो ॥ 

रसरी रसन कबिजन दिए, भाँति भाँति के मान । 
एक कहें रसबत मिसरी, दूजे सर्प समान ।९६८। 
भावार्थ : -- श्रेष्ठ कवि जनों ने जिह्वा की रस्सी को विभिन्न प्रकार की उपमाओं से सुशोभित किया है । एक को रसवंत मिश्री के भीतर की रस्सी कहा, दूजी को सांप के समरूप ही कह दिया ॥

कंकन किंकिनि कनक कन, फूट कियारि कियारि । 
दरसत अवनि आभूषन, जस सम्पद उपकारि ।९६९। 
भावार्थ : -- कंगन और करधन के स्वर्ण के अन्न कण खेतों की क्यारियों में प्रस्फुटित हुवे । धरती के ये आभूषण ऐसे दर्श रहे हैं,  जैसे ये किसी उपकारी की संपत्ति हो ॥

अनजल सुमति बरधइँ अति, सही उन्नति  कहाहिं । 
जाकी रहि जन चरन रति, वा सोंह भगति नाहिं ।९७०। 
भावार्थ : -- अन्न,जल के कोष में अतिशय वृद्धि, सुभाषित एवं उसकी उत्कृष्ठता की वृद्धि ही वास्तविक प्रगती कहलाती है । प्राणी जनों के चरणों में अनुरक्ति (मंदीर-मूर्ति बनाने में नहीं) के सदृश्य भक्ति नहीं ।। 










शनिवार, 9 नवंबर 2013

----- मिनिस्टर राजू 113 -----

राजू : -- मास्टर जी ! मास्टर जी !! 

"क्या राजू ! क्या राजू !! 

राजू : -- मास्टर जी ! आपको 'भारत रत्न' के लिए चुना गया है,

" धूत ! धूत धूत !! गरीबहा गधूस..... मुझमें और जवाहर लाल नेहरु में कुछ तो अंतर होगा"

राजू : -- मास्टर जी ! चाहते क्या है आप.....नहीं मुझे बताओ मैं जानना चाहता हूँ.....चाहते क्या है आप 

 " हसीनो के दर सर झुका चाहता हूँ.., 
    मोहब्बत में हूँ और वफ़ा चाहता हूँ.., 
    कहीं मर न जाऊँ अहदे सिकन से.., 
    इस बीमारे-गम की दवा चाहता हूँ.....  

गुरुवार, 7 नवंबर 2013

----- मिनिस्टर राजू 112 -----

राजू : -- मास्टर जी ! ये बिकास कौन है ? 

  "अरे वही ! जो काला धन बन के बिदेसी अधिकोषों माने की बैंकों में बंद है"  

बुधवार, 6 नवंबर 2013

----- ॥ दोहा-दशम ९५ ॥ -----

एक प्रिया  एक प्रियतम ब्रत, जोगे एकै निबास । 
अलपह असन कछुक बसन, अस घर श्री के बास ।९५१। 
भावार्थ : -- एक प्रिया और एक ही प्रियतम का व्रत हो, एक ही निवास योजित करने का नियम हो । अल्पतस भोजन और कुछेक आभरण हो उस घर में सैदव लक्ष्मी का वास होता है, बाक़ी घरों में माया नाचती है ॥

देखु एक नगर धनी की, बड़ी अनोखी दीख । 
भरा पेट बहुरि माँगे, हाथ पसारे भीख ।९५२। 
भावार्थ : -- एक नगर के धन्ना सेठ की विचित्र से चरित्र का वित्तचित्र देखो । पेट भरा है, गला भरा है, मुंह भी भरा है,उल्टियाँ हो रही है फिर भी हाथ पसार के भीख मांग रहा है ( भारत को ऐसे ही भिखारियों का देश नहीं कहते) ॥

जोउ जनित जनिते जहाँ, तहाँ मान ना पाए । 
बाहिर सुरसरि बह रही, भीतर घर अन्हाए ।९५३।
भावार्थ : -- जो उत्पाद जहां उत्पन्न होता है, वहाँ उसका सम्मान नहीं होता । गंगा बाहर बहती रही, गंगातट वासी घर के भीतर ही नहाएँ ॥

खाली खाली अन कोष, भरा भरा दिखलाए । 
तिनते राम बचाए जो, धरा खोद के खाए ।९५४। 
भावार्थ : -- देश का अन्न कोष रिक्त है और उसे भरा पूरा दिखा रहें है  । ऐसे दुर्जनों से तो राम ही बचाए जो धरती खोद के खा रहे हैं ॥ 

कोइली के खदान जों, निकसे हिरनइ हीर । 
रैन बिहान निकसा तों, दिनमनि धीरहि धीर ।९५५। 
भावार्थ : - कोयले की खदान से जैसे बहुमूल्य हीरा निकलता है । रात व्यतीत होते ही वैसे ही धीरे धीरे सूर्य का उदय हुवा ॥ 

पंगति पंगति डारि कर, पत पत कार कियारि । 
आखर आखर फुर फुरे,पोथी भइ फुरबारि ।९५६। 
भावार्थ : -- सारी पंक्तियाँ शाखाएं कारित कर पृष्ठों को क्यारी स्वरुप दिया । जब अक्षर पुष्प स्वरुप में प्रफुल्लित हुवे तब पोथी फुलवारी बन गई ॥ 

बाती प्यासी ही रहि , लहि न प्रीत का तेल । 
दीप बिजोगित ही रहा, भया न जोतिर मेल । ९५७ । 
भावार्थ : -- बाती प्यासी ही रही उसे प्रीत का सार प्राप्त न हुवा । दीपक भी वियोजित रहा, उनका वह ज्योतिर्मय मिलन दुर्लभ ही हो गया ॥ 

तहाँ खान पय पान का, जहाँ जान अनजान । 
भए ऐसो जजमान का, किये न आदर मान ।९५८ । 
भावार्थ : -- वहाँ खाना और पीना क्या जहां कोई जान कर भी अनजान बना रहे । फिर ऐसा आतिथ्य किस काम का जहां आपका सम्मान न हो ॥ 

अर्थात : -- वहाँ का आतिथ्य स्वीकार नहीं करना चाहिए जहां जहां आपको जान कर कोई अनजान बना रहे वहाँ यदि कोई आपका आतिथ्य स्वीकार न करे तो अपना मुग़ल बागीचा उसके भवन में नहीं सजाते । 
                             औरों के सजे चमन में जश्न नहीं मनाते..,  
                            जब आजाद हिन्द है तो क्यूँ नहीं सजाते..... 

मुखिया चित सों चाहिए, होत पीर को अंग । 
बिना भेद भाव किए जो,  उपचारे प्रत्यंग ।९५९ । 
भावार्थ : -- मुखिया को चित्त के समान होना चाहिए यदि किसी अंग में पीरा हो तो बिना भे भाव किये जो सभी का का समान उपचार करता है उसी प्रकार मुखिया को राष्ट्र के सभी क्षेत्रों का समान स्वरुप में रखरखाव करना चाहिए ॥ 

न माँगे भगति सन मान, ना माँगे धनधान । 
तेओ तापस आचरन, माँग रहा भगवान ।९६०। 
भावार्थ : -- न भक्ति माँग रहा, न कोई सम्मान माँग रहा, न तेरी धन सम्पदा माँग रहा, न तेरा धान माँग रहा । ये जनता रूपी भगवान तुझसे तेरा तपस् आचरण  (  व्रत, नियम, उपासनादि का आचरण और इंद्रियों का निग्रह ) माँग रहा है ॥ 

              "यदि तू किसी को नहीं देगा, तो तेरे को कौन देगा " 









----- मिनिस्टर राजू 111 -----

 " राजू ! इस बारी दिवाली में तुमने बहुंत मिठाई खाई होंगी ? "

राजू : -- नहीं मास्टर जी ! :(

 "क्यों ?"
राजू : -- मास्टर जी ! उस मिठाई ने इतना बनाव सिंगार माने की इतना मेकअप किया हुवा था कि मुझे समझ ही नहीं आया उसे देखूँ , उससे शादी करूँ कि उसे खाऊँ..,

"धूत ! धूत धूत !! तेरे जैसे गरीबहा गधे से कौन शादी करेगा"

सोमवार, 4 नवंबर 2013

----- ॥ दोहा-दशम ९४ ॥ -----

कर श्रम जुगत पाँउँ चरत, उदर अलपतर खाए  । 
चेतत चित जागत चितब, मुख सोहत मुसुकाए ।९४१।  
भावार्थ : --  हाथ श्रम करते हुवे, पाँव चलते हुवे और पेट थोड़े से थोड़ा खाते हुवे शोभित होता है, आँख में जागृति, चित्त में चेतना हो तभी मुख पर मुस्कान सुशोभित होती है ।।

मोती मानिक कनिक सों, हंस हिरन के तोल । 
आगिन आगिन धान कन, मिलहीं वाके मोल ।९४२। 
भावार्थ : -- अल्प उत्पादन के कारण, आगे आगे अनाज मोती माणिक्य के कण और सोने चांदी के तोल जैसे  उन्हीं के मूल्य में मिलने लगेगा (अभी जो मुद्रा में उपलब्ध है) ॥  

पौर पंगत लगे रहे, करधन धरे पिरान । 
ले दे मंदर भीत भए, सोए मिले भगवान ।९४३। 
भावार्थ : -- गोपुर में पंक्ति बद्ध रहे, करधन में पीरा होने लगी । फिर ले दे के मन्दिर भीतर हुवे तो देखा भगवान तो सो रहे रहे हैं ॥

अर्थात : -- ईश्वर के प्रति श्रद्धा ईश्वर की नियमावली में ही होने चाहिए, ले दे के नहीं.....

मूक हुँत बानी ब्यर्थ, अंधे दर्पन बान ।  
बहरे हुँत सुर संगीत, मूढ़ हुँत ज्ञानवान ।९४४। 
भावार्थ : -- गूंगे के लिए वाणी व्यर्थ है, अंधे दर्पण अर्थात दृष्टी हीन के लिए बनाव श्रृंगार व्यर्थ है । बधीर के लिए सुर और संगीत व्यर्थ है उसी प्रकार मूर्ख के लिए ग्यानी व्यर्थ है ॥

ऊँच अटारि कनक कलस, मनि मंजरी सँजोए।
मुँह माँगे मोल लेउ, कहीं अमरता होए ।९४५।
भावार्थ : -- भवन अट्टालिका तो बहुंत ऊंची गढ़ लिए, रत्नों की पंक्तियों से सजा ली । यदि अमरता कही पर मिलाती हो तो उसे मुंह मांगे मोल में ले लेना चाहिए क्योंकि मृत्योपरांत सब यहीं रह जाने वाला है ॥

मात-पिता सैम पूज नहि, गुरु सों नहि को देव । 
परहित सों को धर्म नहि, देइ सों को सेव ।९४६। 
भावार्थ : -- माता पिटा के समान कोई पूज्य नहीं है, गुरु के समान कोई आदरणीय नहीं है । परहित के समान कोई पुण्य नहीं है, दान देने ( लेना नहीं) के समान कोई सेवा नहीं है ॥

गुरु कंचन गुरु पारसा, गुरु तोय तू प्यास । 
गुरु के गुन रत्नागार, गह गह मुकुत निकास ।९४७। 
भावार्थ : -- गुरु ही कंचन है, गुरु ही पारस है, गुरु यदि जल है तो तू प्यास है । गुरु के गुण के सिंधु है तू उसमें ढूंड ढूंढ  कर ज्ञान स्वरुप मुक्ता निकाल ॥

गुरु कंचन गुरु पारसा, गुरु भूषन गुरु गात । 
गुरु ज्ञान का रत्नाकर, जोइ गहे सो पात ।९४८। 
भावार्थ : -- गुरु कंचन है,गुरु ही पारस है, गुरु आभूषण है, गुरु ही देह है । गुरु ज्ञान रूपी रत्नों का आकर है, जो ढूंढ़ता है वही पाता है ॥ 

नाहीं प्रीति भोज सोंह, नाहीं साज सँजोए । 
मीठी बोली बोल के, पाहुन आदर होए ।९४९। 
भावार्थ : -- अतिथि का सत्कार सुरुचित भोजन अथवा साज सज्जा से नहीं अपितु मीठी वाणी से ही होता है ॥ 

संजम सन समरथ जुगे, समरथ सन संजोग । 
संजोग जोगाइ जुगुति, जुगुति जोगाइ जोग ।९५० । 
भावार्थ : -- संयम से ही सामर्थ्य बढ़ता है, सामर्थ्य से कार्य संयोजित होता है । कार्य-संयोजन से युक्तियाँ संकलित होती है, और युक्तियों के संकलन से योग्यता बढती हैं ॥ 
               




शुक्रवार, 1 नवंबर 2013

----- मिनिस्टर राजू 110 -----

  विलासिता की साधन स्वरूपा को सजाना मना है.., 
आज पूजा गृहाधार कर उसकी आरती गाना मना है..... 

राजू : -- मास्टर जी! ये क्या लिख रहें हैं ?

" राजू ! कोट बना रहा हूँ "

राजू : -- मास्टर जी ! आप तो हमारे मास्टर जी थे, ये कपड़ों के कारखाने के मास्टर जी कब से हो गए, अच्छा वो छोड़िये तनिक ये तो बताइये ये सेठ लोगों के जनम दिनों में गरीब गरीब लोग काहे आमंत्रित हैं, इनको देख के तो ऐसा गता है जैसे मुग़ल बागीचे में झोपड़े खड़े हों.....राष्ट्र प्रमुखों को आमंत्रित करते तो उत्सव की कुछ शोभा होती....दुइ चार राष्ट्र पति भवन खड़े करते,

" राजू ! राजू !! राजू !!! जदि इनको एतनी बुद्धि होती तो असली सेठ न होते, नकली काहे होते" 

बुधवार, 30 अक्टूबर 2013

----- ॥ दोहा-दशम ९३ ॥ -----

दारिदर कभु खाए लिये, धनिक रहे बिनु खाए । 
मधुरन तिनते दूर रहि, जो सौ रूज लगाए ।९३१। 
भावार्थ : -- दरिद्र तो कभी कभार खा भी लिए किन्तु, धनवान उसे बिना खाए ही रहे । ये मीठाई है न मिठाई जो मीठी मीठी होती है, वह उनसे दूर ही रही जो सौ ठो रोग लगा के बैठे हैं ॥ 

देखे साहन के साह, देखे दासन दास । 
दीन दसा तसहि रहि अब, गवने को उरास ।९३२। 
उड़ास = निवास, दासनिवास 

भावार्थ : -- सम्राटों का युग भी देखा । और ये दासों के दास का युग भी देख लिया ।  अर्थहीन, अर्थ हिन् ही रहे दुखी, दुखी ही रहे अब कौन से दास के घर जाएं ?

चरन सरन तिन कठिन है, जिन भरि कंकर काँट । 
तब औरै दुसह रहि जब, मानस धरि सौ आँट ।९३३। 
भावार्थ : -- उस मार्ग में चलना कठिन है जिस मार्ग में कंकड़ काँटे भरे हो । तब चलना और भी दुसाध्य हो जाता है जब मन संदेह से घिरा हो॥ 

रहिमन बर साहन साह, कबीर डासन दास । 
दोनौ के एक उपदेस, बन तू तल की घास ।९३४। 
भावार्थ : -- अब्दुर्र रहीम खानखाना  के लिए शाहों के शाह श्रेष्ठ है (रहीम अकबर के नौ रत्नों में से एक थे) , संत कबीर ( अति दरिद्र थे)  के लिए दासों का दास श्रेष्ठ है । दोनों का एक ही उपदेश है कि जब तुम्हारे जन संचालन तंत्र का मुखिया खजूर का पेड़ न होकर घास होगा तब ही तुम सुखी रहोगे ॥ 

करुवी बेलि नीम चढ़े, अतिसय करुबर कार । 

बंधे पत सुरभित रहे, गंध राज के सार ।९३५। 
भावार्थ : - करेले की बेल यदि नीम पर चढ़ जाए तो वो उसे और अधिक कड़वा कर देती है । गंध राज : -- चन्दन,अगरु आदि की सार धूप, यदि किसी पत्र से बंधी हो तो वह पत्र भी सुगन्धित हो जाता है । 

अर्थात : -- दुर्गुणी यदि दुर्जन की संगती करे तो उसके दुर्गुणों में वृद्धि होती है । गुणहीन यदि गुणवान की संगती करे तो वह भी उसी गुणवान का स्वरुप धारण कर लेता है ॥ 

जाके संग निकट रहे, वाके संग सुहाए । 
छाई छत पर चाँद छबि, नखत दूरे लखाए ।९३६। 
भावार्थ :  -- साथ उसका ही सुहावना होता है जो निकट हो । छत पर चाँद की छवि छाई रहती है, तारे दूर से ही निहारते रहते हैं ॥ 

 जहाँ धान की संपदा, धनी धन्य सो देस । 
काट कूट कर कोष किए, सो तो कपटी भेस ।९३७ । 
भावार्थ : -- जहां अन्न की सम्पदा है, वही देश वास्तव में धनी है और वही साधू स्वरुप पुण्यात्मा है । जहां आकड़ों में कलाकारी करके कोष भरपूर दर्शाया जाता हो वह देश कपटी और पाखंडी साधू है ॥ 

टीका : -- ऐसे देश के शासक यदि पड़ना जानते हों तो  एक बार मांग पूर्ति का नियम अवश्य पढ़े वास्तु का मूल्य में तब वृद्धि होती है, जब उसकी पूर्ति सतत स्वरुप में नहीं होती ॥ 

खेत खदान भए खनि अन, करषक बँध बनिहारि । 
भूखे मरे तँह जन जन, फुर फरे ब्यापारि ।९३८। 
भावार्थ : -- खेत जहां खदान हो गए और अन्न जहां खनिज हो गया, जहां के किसान बंधवा श्रमिक बन गए । और जन साधारण भूखा मर रहा है, वहाँ के व्यापारी बहुंत फूल फल रहे हैं ॥ (कारण क्या है ?) 

खनि खदान खनन कारन , भूमि भई कल्हार । 
खाद न खादन अन न पसु, खाएं आप को फार ।९३९ । 
भावार्थ : -- खनिज खदानों के खुदने से कृषि भूमि फट पड़ी और बंजर हो गई  है । अब न खाद्य है न खाद्यान है न अन्न बचा न पशु बचे, पेट है खाने को मांगता है तो स्वयं को फाड़ के खा क्यों ? क्योंकि दुसरा तुझसे अधिक हिंसक है तू उसको क्या खाएगा , तो पहले अपना हाथ खा फिर पैर खा ॥ 

बिनइ मुखी नम आचरन, जीउति के पहचान । 
अकड़ी देह गरब मुख, जे तो मरे समान ।९४० । 
भावार्थ : -- विनीत मुख और विनम्र आचरण, जीवितों की पहचान है । अकड़ी हुई देह और मुख पर घमंड यह मरे मुर्दा के समान है ॥   







सोमवार, 28 अक्टूबर 2013

----- ॥ दोहा-दशम 92॥ -----

लोक चरन बिपरीत जब, सासन नीति रचाएँ । 
बरजत बिरोध जता तब, तिन पालन बिसराएँ ।९२०। 
भावार्थ : -- जब शासन की नीतियां लोक व्यवहार के विरुद्ध हों । तब पालनकर्त्ता द्वारा उन  नीतियों का पालन न करते हुवे उनके परिरोधन हेतु उनपर विरोध व्यक्त करना चाहिए (और जब पूरा शासन ही कुनीतिज्ञ हो तो व्यवस्था परिवर्तन हेतु अग्रसर होना चाहिए)॥ 

दान दिया जल तिसित पान, काम लिया अन्हान । 
दिए दुरुपजोग हो जहाँ, तहाँ न कीजिए दान ।९२१। 
भावार्थ : --   जल का दान तो इस हेतु किया कि प्यासे की प्यास बूझे, पर वह स्नान के काम लिया गया ॥ तात्पर्य है कि, सुबुद्धि जन को वहाँ दान नहीं करना चाहिए जहां इसका दुरुपयोग हो ॥ 

घटे काज न किजीए चहे, बढ़े घटे दिन मान । 
हरिचंद मरत मरी गए, छुटी न सत की कान ।९२३।  
भावार्थ : -- बुरा समय हो चाहे अच्छा किन्तु कभी घटिया कार्य नहीं करने चाहिए ।  राजा हरिश्चंद्र मरते मर गए किन्तु उन्होंने सत्य का नियम नहीं छोड़ा ॥ 

सीस दस अरु बीस भुजा, रावन पद रहि दोउ । 
रीस तस तीस रुजा पर , झूठ के पद न होइ ।९२४। 
भावार्थ : -- सिर दस ठो और भुजा बीस ठो किन्तु रावण के पैर दुइ ठो थे ॥ उसी की प्रतिलिपि स्वरुप, झूठ की तलहटी में तीस ठो रोग होते हैं, किन्तु उसके पैर नहीं होते ॥ 

कलंकित के काल चढ़त चोखा आपन काल । 
जूँ जमुना के जल छाइ, रंजन रहे तमाल ।९२५। 
भावार्थ : -- कलंकित व्यक्ति पर अपना दोष भी भली प्रकार से मढ़ा जा सकता है । जैसे जमुना के काले जल में तमाल वृक्ष की काली छाया प्रदर्शित नहीं होती ॥ 

धुनी द्युति गति धीर धरि, चित की तेजसबान । 
बिपल मह गगन भंवर लै, बैसत पलक बिमान ।९२६। 
भावार्थ : -- ध्वनी और प्रकाश की गति मंद है, किन्तु मन की गति अति तीव्र है । यह पलक के विमान में विराजित होकर बिपल के अंतर्गत ही पूरा ब्रम्हांड घूम आता है ॥ 

टीका : -- विपल = समय का अबतक का सबसे लघु मान । १ सेकंड = २.५ विपल , २४ सेकण्ड के बराबर एक पल होता है, ६० विपल =१ पल 

सोवत सोइ खोवत है, जागे जोई पाए । 
सोवन अंक जड़ती के, जागे चित चेताए ।९२७। 
भावार्थ : -- सुप्तावस्था में बहुंत कुछ छुट जाता है, जागृत अवस्था में अप्राप्य भी प्राप्य है ॥ सुषुप्तावस्था जड़त्व के लक्षण है, जागृति चैतन्यता का चिन्ह है ॥ 

ब्यतीत ब्यत गत समय , जो हो मसि मलिनाए । 
बीतत पल निर्मल करे, होनिहार उजराए ।९२८। 
भावार्थ : -- इतिहास की मलिनता को वर्तमान से धोया जाए, तो कल का इतिहास अवश्य ही उज्जवल होगा ॥ 

जिनके कँधे सकल उठे, भए जग जिउता सोइ । 
आपइ उठान उठौना , सो तो सव सम होइ ।९२९। 

भावार्थ : -- जिसके कंधे उठा कर सभी गए संसार में वही जीवित स्वरुप है । जो केवल स्वयं को ही  उठाने में प्रवृत्त रहा वह शव के समान है ।। 

बिलासिता रस भोग मह, रहे सदा रत आप । 
अब पथ जोगत को तरे, करन जगत उद्धाप ।९३०। 
भावार्थ : -- हम स्वयं सदैव विलासिता,रस एवं भोगों में आसक्त रहे । अब बैठे प्रतीक्षा कर रहें हैं कि, कोई प्रभु अवतार लें और सब कुछ ठीक कर दें ॥ 

अर्थात : - "जब विकार हम से उत्पन्न हुवे हैं, सुधारना भी हमें ही होगा"


रविवार, 27 अक्टूबर 2013

----- ॥ दोहा-दशम 91॥ -----

दोष धरे दृष्टी द्रोन, किये भिषक उपचार । 
दोष बरे दृष्टि कोन, वाके कौन सुधार।९११।  
  ----- ॥ अज्ञात ॥ -----
भावार्थ : -- यदि दृष्टी की कठौती में दोष हो तो उसका उपचार नेत्र चिकित्सक कर देगा । किन्तु जब दृष्टी कोण में दोष हो तो उसका सुधारक कौन हो ॥

संस्कार अरु संस्कृति, जीवन की एक बानि । 
जामे सदियाँ जुगी रहि, बन समाज के छानि ।९१२ । 
  ----- ॥ राम धारी सिंह दिनकर ॥ -----
भावार्थ : -- सस्कार एवं संस्कृति जीवन की रीतियाँ हैं,जिसमें सदियाँ संचयित होकर समाज पर छाई रहती हैं ॥

बिंदु में जो सिंधु लिखे, कहत बाग्मय सोइ । 
सिंधु में जो बिंदु लिखे, सो तो प्रलाप होइ ।९१३।
 ----- ॥ नीति द्विषाष्टिका॥ -----
भावार्थ : -- जो थोड़े शब्दों में सुन्दर बात कहता है, वह वाग्मी है । बहुंत से वचनो द्वारा किंचित सार कहने वाला विप्रलापी ही है ॥

जाके पहि न्यूनाधिक, निर्धन नाहीं सोइ । 
जोइ लहे अधिकाधिक, सोई निर्धन होइ ।९१४। 
 ----- ॥ सैनेका ॥ -----
भावार्थ : -- "वह व्यक्ति निर्धन नहीं है, जिसके पास थोड़ा-बहुंत है । निर्धन तो वह है जो अधिकाधिक के लिए लालायित रहता है "

सिंह गुहा बाघ घनबन, हंस कमलिन प्रसंग । 
कुजन चाहे कुजन साथ, सदजन सद्जन संग ।९१५। 
                ----- ॥ अज्ञात ॥ -----
भावार्थ : -- "सिंह गुफा का, बाघ गहन वन का, हंस सुन्दर कलिनियों का प्रसंग चाहते है । उसी प्रकार कदाचारी, कदाचारियों का एवं सदाचारी सदाचारियों का संग चाहता है"

रुखा हारे प्रेम सोंह, पाप सोंह सदाचार । 
लाह हारे दान सोंह, मिथक बचन सत सार ।९१६। 
 ----- ॥ गौतम बुद्ध ॥ -----
भावार्थ : -- "रोष, प्रेम से हारता है, पाप सदाचार से हारता है । लोभ दान देने से हारता है, मिथ्या वचन सत्य के सार वचनों से हारता है"

टीका : -- ओभ में संशय है, लोभ संयम से हारता है ।

सुहंगम ह्रदय मुकुति सों, देह भवन सों सीप । 
सुहंगम मह लावन श्री, सुहँगा साँच समीप ।९१७। 
                ----- ॥ अज्ञात ॥ -----
भावार्थ : -- सरल ह्रदय मुक्ता सरिस है देह-भवन सीप सरिस है । सरलता में महान सौन्दर्य बसता है जो सरल है वह सत्य अर्थात ईश्वर के निकट है ॥ 

जेइ जगत मैं मलिनतम, सुवारथ सम न कोइ । 
अगजग के अवगुन गहे, जो सुवारथी होइ ।९१८। 
 ----- ॥ अज्ञात ॥ -----
भावार्थ : -- इस संसार में स्वार्थ के सदृश्य मलिनतम कोई नहीं है । स्वार्थी जन समस्त चराचर के अवगुण ग्रहण किये होते हैं ॥ 

भगवन कहीं नाहीं है, सोइ कथन सर्बग्य । 
भगवन है कि नाहीं है, सोइ बचन अल्पग्य ।९१९। 
 ----- ॥ अज्ञात ॥ -----
भावार्थ : -- 'ईश्वर कहीं नहीं है' यह कथन सर्वज्ञ है अर्थात जो यह कहता है वह सर्व ज्ञानी स्वरुप में गुरु है । 'ईश्वर है कि नहीं है' यह वचन अल्पज्ञ है अर्थात जो यह कहता है वह अल्पज्ञानी रूप में जिज्ञासु है ॥ 

मनु जोनि बर देश काल, मिलै बहस कठनाए । 
जेइ जोग जब जोगिते, भव सागर तर जाएँ ।920। 
                    ----- || अज्ञात ॥ -----
भावार्थ : -- मनुष्य योनि और उत्तम देश, काल एवं परिस्थिति का एक साथ मिलना अति दुर्लभ है ॥ यदि मनुष्य योनि का योग प्राप्त हो, उत्तम देश काल एवं परिस्थितियां का संयोग मिले तो कल्याण करते हुवे इस संसार के बंधन से मुक्त हो जाना चाहिए  ॥ 

----- मिनिस्टर राजू 109 -----

राजू : -- मास्टर जी ! यदि लोकतंत्र एक धर्मशाला है, चुनाव वैवाहिक उत्सव है, यदि जीत दुलहन है, चुनावी दल दुलहे हैं, नेता-मंत्री के प्रलाप बेसुरे बाजे हैं तो ये समाचार माध्यम माने की मीडिया क्या है? 

 राजू ! ये किराया भण्डार है माने की टेंट हाउस, यहाँ चँवर-चांदनी, मंडप-शामियाने, फोटो-एलबम, बीडियो-कैसेट आदि सेवाएं दलों को किराए पर दी जाती है.…. और जहां पत्रकारिता कहीं दूर बैठी सिसक रही है"

राजू : -- चोखा धंधा है, सीजन में बिक्री बट्टे की क्या रौनक है । किन्तु  मास्टर जी ! फिर हम क्या हैं?

 " मूर्ख !"
"जो अद्यावधि इस स्वयंवर वाली चुनावी वैवाहिक पद्धती को नहीं बदल पाए । यहाँ प्रत्यासी को दुल्हा होना चाहिए और दुल्हे बने हैं दल, यानी वर माला किसी के गले में और दुल्हा कोई । और यह वर माला प्रत्यासी के नियोक्ता माने  की बॉस की पारिवारिक विरदावली यानी की फेमिली स्टेटस देख कर अर्पित की जाती है प्रत्यासी की नहीं । प्रत्यासी हमारे ही बीच का होना चाहिए, और उसे बहुंत देखभाल थोक बजा कर हमें प्रस्तुत करना चाहिए जैसे हम वर को बजाते हैं । जिसके पालक हम ही हों उसका बॉस नहीं और वो हमारी सेवा-सुश्रुता करे अपने बॉस की नहीं ॥"  

शनिवार, 26 अक्टूबर 2013

----- ॥ दोहा-दशम ९ ० ॥ -----

कलाकार को कला की, पी को प्रेम पिपास । 
ब्यौपारी लाह लोभ, किए माया की आस । ९०१। 
भावार्थ : -- कलाकार को कला की प्यास रहती है पपीहे को प्रेम की प्यास रहती है । लाभ के लोभी व्यापारी, सदा, विलासिता की साधन स्वरूपा के आस में रहता है  ॥ 

दुजन देइ सो पाहिले, अपना भार उतार । 
कलुखित कारज परिहरत, फेर बने दातार ।९०२। 
भावार्थ : -- दूसरों को ऋण देने से पहले स्वयं को ऋण से मुक्त करना चाहिए । और कुकर्मों का परित्याग करके ही दातार बनना चाहिए । ऋणी और कुकर्मी हों तो कैसी महाजनी और काहे का दातारी ॥  

चैल चैल अभरन भला, गुरु गरुबर परिधान । 
हेर हेर हेला मिला, फेर मिलाओ तान ।९०३। 
भावार्थ : -- शिष्य का चोला ही तन को सुख देता है, गुरु का चोला बोझ सा लगता है ॥ शिष्य का चोला पहन कर अन्य शिष्यों को  ढूंढ ढूंढ कर मेल मिलाप करते हुवे  फिर उनसे ज्ञान-गोष्ठी करने में आनंद है ॥ 

भाव भरे तो भाव है, अर्थ धरे सो अर्थ । 
सार वरें सो सार है, बाक़ी सबै ब्यर्थ ।९०४। 
भावार्थ : -- जो भाव विभोर करे तो ही उसका मोल है, शब्द अर्थ उत्पन्न करे तो वह शब्द है । सार ग्रहण करने से ही कथन का उद्देश्य है अन्यथा जो कहा वो सब व्यर्थ है केवल पन्ने रंगना है ॥

तूर तुरग गामिन पंथ, रचे खचे का लाह । 
तापर चरन न भए कोउ, तूर गामिनी बाह ।९०५। 
भावार्थ : -- चित्त के जैसे तीव्र गामी पथ का निर्माण करने से लाभ क्या है ? जबकि उस पथ पर संचालित करने को कोई तीव्र गामी वाहन ही न हो ॥  

आप बड़ाई आप मुख, करे सो चाएँ चाएँ । 
मुख कहि पिहु पयस मयूख, वाके रूप सुहाए ।९०६। 
भावार्थ : -- अपनी बड़ाई अपने मुख से करने से वह प्रलाप अर्थात व्यर्थ की बातें हो जाती हैं ॥ जैसे कि कौंवा ।
चन्द्रमा की प्रशंसा पपीहे का मुख करता है तभी वह इतना सुन्दर प्रतीत होता है ॥

काम क्रोध मद अरु लोभ, अभरे बैरी रूप । 
चहुँ पुर जो अंग रच्छक, तव भय धरे सरूप ।९०७। 
भावार्थ : - काम, क्रोध, मद और लोभ इन चरों ने ही शत्रुओं का रूप धरा हुवा है । और यदि चारों और अंग रक्षक है तो वह तुम्हारे भय के ही स्वरूप हैं ॥

अर्थात : -- "यदि शत्रु ही न हो तो अंग रक्षकों की क्या आवश्यकता"

खादन छादन राखिये, राखत दान ध्यान । 
तिनको बैरी भाखिये, कलुख करम अरु मान ।९०८। 
भावार्थ : -- खाद्यान रखिये ओड़न-बिछान रखिये और साथ में दान का ध्यान रखिये । पर कलुषित कर्म और अभिमान को शत्रु स्वरूप में परिभाषित कर उनसे दूर ही रहिए ॥

प्रभु जी हमरे जीउ के, ऐसो किजौ प्रबंध । 
चन्दन काटे मर मिटे, बिखरी रहे सुगंध ।९१०। 
भावार्थ : -- हे ! जगत नियंता तुम हमारे जीवन का कुछ ऐसा प्रबन्ध करना, कि यह चन्दन स्वरूप में  जब कट कर मर मिटे तब भी उसकी सुगंध रूपी सद्गुण जगत में व्याप्त रहें ॥ 
 







मंगलवार, 22 अक्टूबर 2013

----- ॥ दोहा-दशम ८९ ॥ -----

मानख के चारन चरन, मानस की पहचान । 
नहीं तो का मनु का पसु, दोउ एकै समान। ८९१। 
भावार्थ : -- मनुष्य के के जप, तप, व्रत, नियमादि शुभ धर्म आचार उसके मनुष्य होने का परिचय है अन्यथा क्या मनुष्य और क्या पशु दोनों एक ही स्वरूप हैं ॥  

भरी भावना बहुस ही, भई कोउ साकार । 
देखे सुपने सहस ही, पर लिए न एक अकार ।८९२। 
भावार्थ : -- मनुष्य के चित्त में बहुंत प्रकार की कल्पनाएँ समाई रहती हैं, जिनमें कोई साकार भी हो जाती है । अमन सहस्त्रों स्वप्न भी देखता है (चूँकि यह जीवन की चार अवस्थाओं : -- जागृत, स्वप्न,सुषुप्ति, तुरीय में से एक अवस्था है) किन्तु आकृत एक भी नहीं होते ॥  

पढ़े बिना पोथी पोट , जोगवना तस होत । 
जस उपजोग जाने बिन, गर्दभ चन्दन ढोत ।८९३। 
भावार्थ : --  बिना पढ़े पुस्तकों का संग्रहण उस गधे के आचरण के समान प्रतीत होता है । जो चन्दन के भार को ढोता हुवा उसके उपयोग को नहीं जानता ॥ 

जगत दिवाकर चाहिते, करन चहुँत अँजोर । 
चिद घन ज्ञान जोत जगा, ध्यान द्रव कर जोर ।८९४। 
भावार्थ : --  अज्ञान का अन्धकार व्याप्त है, संसार इस अंधरे को दूर करने हेतु ज्ञान के सूर्य की कामना कर रहा है । तू अंतस स्वरूप में ध्यान और ज्ञान के साधनों को संयुक्त करके ज्ञान की ज्योति जागृत कर ॥ 

बार बार जौ फार देइँ, भूमि तिन्ह तरु सोइ । 
जे जलावनु जोर लेइँ,  बार मह भसम होइ ।८९५। 
भावार्थ : -- डोली (खेत) ऐसे गाछ के समान है जो बार बार फल देती है । गाछ को काट पिट के ईंधन बना दिया और डोली को बेच-खेच के धन बना दिया, फिर दोनों एके बार में भस्म हो जाएंगे ॥ 

एसो धन्य भयऊ सबै, जैसो मैं धनबान । 
एसो दरिद न कोउ लहैं, जैसो मैं दरिदान ।८९६। 
भावार्थ :-- ऐसे धनी सब हों, जैसा में धनवान हूँ । ऐसी दरिद्रता किसी को प्राप्त न हो, जैसी मुझे प्राप्त है ॥  

मधु कारी संचइ कोष, दोनौ एक सों होइ । 
उपजोग कारै कोई, बूँद बूँद को जोइ ।८९७ । 
भावार्थ : -- पोथी, धन, और मधु के संचय कर्त्ता का कोष एक समान होता है । बूंद बूंद कर संग्रह कोई करता है, और उपयोग कोई ॥ 

तीर तमाल को गाछ, चरे गाय अरु बाछ । 
जँह जमुना उच्छरित तँह, मीठी लागे छाछ ।८९८ । 
भावार्थ : -- जिसके तट पर तमाल वृक्ष हों, गाँय और बछड़े विचर रहे हों ।  जहाँ यमुना तरंगित हो रही हो, वहाँ खट्टी छाछ भी मीठी लगती है ॥ 

आजुध बिलगन  न चाहिए, रन कारिन निज काइ । 
सत्रु कार निवहरन हुँते , एक पलकहु अधिकाइ ।८९९। 
भावार्थ : -- योद्धा के शरीर से उसके अस्त्र-शस्त्र वियुक्त नहीं होने चाहिए । क्योंकि शत्रु को  अंत करने के लिए एक क्षण का समय भी अधिक होता है ॥ 

कन उपजे धर्म उपजे , धन उपजे अभिसाप । 
जे भूमिहि रन जगियाए, प्राण जाए सो पाप ।९००। 
भावार्थ : -- अन्न  की व्युत्पत्ति  से धर्म अर्थात दया उत्पन्न होती है, क्योंकि अन्न जीवों के प्राणों की रक्षा करता है । धन की उत्पत्ति से  अभिशाप उत्पन्न होता है , यदि भूमि में युद्ध उत्पन्न हो जाए तो वह प्राणों की आहुति लेता है, और फिर पाप उत्पन्न होता है ॥     



----- ॥ दोहा-दशम 363॥ -----,

सभा सदस बैठे रचे आपहि नेम विधान  तोड़ करे पुनि आपही न्याय का अवमान ॥१||  :-- देश के सांसद स्वयं नियम विधानों की रचना करते हैं तत्पश्चात स्वय...