राजू : -- मास्टर जी ! इ नेता-मंत्री लोगन 'नेहरू कट शेरवानी' मार के
गज गज भर लम्बी जीभ से अघनवा में भी बरसाती मेंढकु के
जइसे टर-टर करते रहते हैं की हमार लोकतंत्रवा में कोन्हू
भी दल भीत में कोई नेक, ईमानदार, सदाचारी, सच्चा, मर्यादित,
पुरुषोत्तम,सीधा,गुनी आदि आदि नेता मंत्री नई हें का जदी हें
तो सीधे सीधे उस नेक, ईमानदार के नाम बताते क्यूँ नहीं??
नाम बता के उसको राष्ट्रपति प्रधान मंत्री बनाते क्यूँ नहीं..??
" बनाया तो है वो देखो सरदार मेक मोहन 'खान' और वो देखो
बग्गी वाले उरी 'बाबा'..,
राजू : -- मास्टर जी ! ये बग्गी वाले 'उरी' बाबा की कहानी फिर सही
ये जो सरदार मेक मोहन 'खान' उर्फ़ पगड़ी, घंटी आदि आदि
वाले बाबा हैं, इनको मान देय तो डेढ़ दो लाख रुपया प्रति महीना
,मिलता है पगढ़ी ये नित नए दिन पचास-पचास हजार की
पहनते हैं इनके परिधान को तो मास्टर जी । पूछो ही मत
हर दुसरे दिन रात्री-दिवस के भोज समारोह में राजसी भोग
के चटखारे ले के अन्न के कण को तरसते अपने मत दाता
को कहते हैं 'मैं पुरुषोत्तम हूँ' अस्सी साल की जरा अवस्था
में विदेश में अपने जन्म दिन पर गुलछर्रे उड़ाकर गांधी जी
की समाधि पर फूल चडाते कहते हैं की मैं तो देश भक्त हूँ
मास्टरजी ! सदाचार की क्या यही परिभाषा है??
" राजू ! राजू !! राजू !!! यह तो दृष्टिकोण का अंतर मात्र है
अब देखो न 51-51 लाख रूपए यूहीं मंदिरों में दान पर
उड़ाने वाल व्यक्ति को 5-10 लाख में गाना बेचने वाला
बेचारा व निर्धन तो लगेगा ही अब इसके पश्चात 'भारत-रत्न'
की क्या आवश्यकता है, है कि नहीं.....वैसे ही सबको सरदार
'खान' भी सदाचारी दिखते हैं,
गज गज भर लम्बी जीभ से अघनवा में भी बरसाती मेंढकु के
जइसे टर-टर करते रहते हैं की हमार लोकतंत्रवा में कोन्हू
भी दल भीत में कोई नेक, ईमानदार, सदाचारी, सच्चा, मर्यादित,
पुरुषोत्तम,सीधा,गुनी आदि आदि नेता मंत्री नई हें का जदी हें
तो सीधे सीधे उस नेक, ईमानदार के नाम बताते क्यूँ नहीं??
नाम बता के उसको राष्ट्रपति प्रधान मंत्री बनाते क्यूँ नहीं..??
" बनाया तो है वो देखो सरदार मेक मोहन 'खान' और वो देखो
बग्गी वाले उरी 'बाबा'..,
राजू : -- मास्टर जी ! ये बग्गी वाले 'उरी' बाबा की कहानी फिर सही
ये जो सरदार मेक मोहन 'खान' उर्फ़ पगड़ी, घंटी आदि आदि
वाले बाबा हैं, इनको मान देय तो डेढ़ दो लाख रुपया प्रति महीना
,मिलता है पगढ़ी ये नित नए दिन पचास-पचास हजार की
पहनते हैं इनके परिधान को तो मास्टर जी । पूछो ही मत
हर दुसरे दिन रात्री-दिवस के भोज समारोह में राजसी भोग
के चटखारे ले के अन्न के कण को तरसते अपने मत दाता
को कहते हैं 'मैं पुरुषोत्तम हूँ' अस्सी साल की जरा अवस्था
में विदेश में अपने जन्म दिन पर गुलछर्रे उड़ाकर गांधी जी
की समाधि पर फूल चडाते कहते हैं की मैं तो देश भक्त हूँ
मास्टरजी ! सदाचार की क्या यही परिभाषा है??
" राजू ! राजू !! राजू !!! यह तो दृष्टिकोण का अंतर मात्र है
अब देखो न 51-51 लाख रूपए यूहीं मंदिरों में दान पर
उड़ाने वाल व्यक्ति को 5-10 लाख में गाना बेचने वाला
बेचारा व निर्धन तो लगेगा ही अब इसके पश्चात 'भारत-रत्न'
की क्या आवश्यकता है, है कि नहीं.....वैसे ही सबको सरदार
'खान' भी सदाचारी दिखते हैं,
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