भारतीय संविधान में 'मत' को 'दान' स्वरूप स्वीकार करते हुवे इसे
नागरिकों के अधिकार श्रेणी में समाहित किया है । 'दान' का शाब्दिक
अर्थ है धर्म हेतु या दयावश किसी को कोई वस्तु प्रदान की क्रिया जो
एक ऐच्छिक प्रक्रिया है..,
विगत वर्षों में हमारे नेता-मंत्रियों ने, चुनाव आयोग एवं सूचना व
प्रसारण माध्यमों ने मतदाताओं के मस्तिष्क में मतदान (जो कि
अधिकार रूप में है ) को कर्त्तव्य स्वरूप में स्थापित कर दिया, इस
स्थापना की नींव को हिलाने की प्रक्रिया की समय साधना उतनी
ही होगी जितनी की इसके स्थापन में साध्य थी व है..,
नेता-मंत्रियों की इस स्थापना के प्रति आसक्ति सत्ता सेंधने व
साधने हेतु है यह सर्वथा ज्ञात है..,
चुनाव आयोग ऐसा दोमुखी पशु है जो सत्ता धारियों के लिए तो
'बैल' है, दो चाँदी के डंडे मारे नहीं के जिधर हँकाओ उधर ही हाँक
जाता है, मतदाता के लिए यह काली भैंस है जिसके आगे कित्ता
भी बिन बजाओ ये सुनती ही नहीं..,
बचा हमारा सूचना व प्रसारण माध्यम जिए 'आम' भाषा में
'मीडिया' कहते है बिना विज्ञापन के यहाँ कोई भी चित्र उपलब्ध
नहीं है फिर ये नेता-मंत्रियों का व चुनाव आयोग की 'निशुल्क सेवा'
क्यूँकर करते है?? प्रश्न विचारणीय है.....

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