सोमवार, 24 दिसंबर 2012

----- मिनिस्टर राजू 72 -----

राजू : --  मास्टर जी ! सूना है की हमार देस मा अतिथि आ रहें हैं

             " काहे आ रहे हैं "

राजू : -- मास्टर जी ! देस के झगड़ा का 'मजा' लेने..,

            " राजू ! देस हो के या बिदेस जन साधारण का एक अतिथि आचरण होता है
               उ देस, काल, परिस्थिति देखकर ही अतिथि बनते हैं जब किसी घर मा झगडा हो
                तो वहां नहीं जाते, कितु इ नेता मंत्री के जाते बुरी है इ तो अउर उचक उचक के
                उ घर मा जाते हैं तभी तो जनता इन्हें अपशब्द कहती है
   
राजू : -- मास्टर जी ! अब आ तो गए...... का करें..,

            " घुमाओ, फिराओ तनिक मिनोरंजन करवाओ अउर का "

राजू : -- मास्टर जी ! कैसे करवाएं......'मिनोरंजन'


             " काहे उ परसों' सरसों रतिया में अउर प्रभात काल में 'लघु चित्र '
                बनाए रहीं न.......उही दिखाओ.... का नाम रही उ चित्र के......
                हाँ "मोर मैया के अचरा"

राजू : -- किन्तु मास्टर जी ! अतिथि उ बिचित्र 'लघु-चित्र' के न तो भास समझेंगे न भासा
            न भासन..,

          " हाँ तो उ पुराना वाला 'लघु-चित्र' दिखाओ का नाम है....
            हाँ सरदार मेक मोहन 'खान' इ तो मूक हैं न वैसे भी अतिथि रसिया
            के हैं.......इ तो खुदई रसिया हैं इनको तो देख के ही मिनोरंजन हो
            जाता है.....




     

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