राजू : -- मास्टर जी ! इ सरदार मेक मोहन 'खान' मा न तो 'अरदास-अजान'
होत है और ना ही 'पूजन-पिरेयर, अब इस उम्र में बचा ही का है .....
ढाँचा ही तो हैं..... गिरा काहे नहीं देते..,
" राजू ----
वो लहू कोई और था वो रवानी कुछ और थी..,
जाँ-निसार वतन पे नौजवानी कुछ और थी..,
वो जिस्म दफन ख़ाक में रूहें थी कुछ अलहदा..,
सुलगती हुई जान की शम्मे-दानी कोई और थी..,
उ का हैं धान के खोखरी भूसी हैं भूसी, इ तो एके
'फूंक' में बाबर की मजिद से सीधे 'मोती' की मजिद
में बाँग देते दिखबे करेंगे..... सीधे प्रसारण स्वरूप....."
होत है और ना ही 'पूजन-पिरेयर, अब इस उम्र में बचा ही का है .....
ढाँचा ही तो हैं..... गिरा काहे नहीं देते..,
" राजू ----
वो लहू कोई और था वो रवानी कुछ और थी..,
जाँ-निसार वतन पे नौजवानी कुछ और थी..,
वो जिस्म दफन ख़ाक में रूहें थी कुछ अलहदा..,
सुलगती हुई जान की शम्मे-दानी कोई और थी..,
उ का हैं धान के खोखरी भूसी हैं भूसी, इ तो एके
'फूंक' में बाबर की मजिद से सीधे 'मोती' की मजिद
में बाँग देते दिखबे करेंगे..... सीधे प्रसारण स्वरूप....."
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