मंगलवार, 25 दिसंबर 2012

----- मिनिस्टर राजू 73 -----

राजू : -- मास्टर !जी  यदि जनता जनार्दन है तो इसकी रुक्मणी
            एवं सत्यभामा कौन हैं..??

" नारायण.....नारायण......सत्यभामा, रुकमनी का तो पता
  नहीं किन्तु में तो नारद मुनी हूँ..... 

सोमवार, 24 दिसंबर 2012

----- मिनिस्टर राजू 72 -----

राजू : --  मास्टर जी ! सूना है की हमार देस मा अतिथि आ रहें हैं

             " काहे आ रहे हैं "

राजू : -- मास्टर जी ! देस के झगड़ा का 'मजा' लेने..,

            " राजू ! देस हो के या बिदेस जन साधारण का एक अतिथि आचरण होता है
               उ देस, काल, परिस्थिति देखकर ही अतिथि बनते हैं जब किसी घर मा झगडा हो
                तो वहां नहीं जाते, कितु इ नेता मंत्री के जाते बुरी है इ तो अउर उचक उचक के
                उ घर मा जाते हैं तभी तो जनता इन्हें अपशब्द कहती है
   
राजू : -- मास्टर जी ! अब आ तो गए...... का करें..,

            " घुमाओ, फिराओ तनिक मिनोरंजन करवाओ अउर का "

राजू : -- मास्टर जी ! कैसे करवाएं......'मिनोरंजन'


             " काहे उ परसों' सरसों रतिया में अउर प्रभात काल में 'लघु चित्र '
                बनाए रहीं न.......उही दिखाओ.... का नाम रही उ चित्र के......
                हाँ "मोर मैया के अचरा"

राजू : -- किन्तु मास्टर जी ! अतिथि उ बिचित्र 'लघु-चित्र' के न तो भास समझेंगे न भासा
            न भासन..,

          " हाँ तो उ पुराना वाला 'लघु-चित्र' दिखाओ का नाम है....
            हाँ सरदार मेक मोहन 'खान' इ तो मूक हैं न वैसे भी अतिथि रसिया
            के हैं.......इ तो खुदई रसिया हैं इनको तो देख के ही मिनोरंजन हो
            जाता है.....




     

----- मिनिस्टर राजू 71 -----

             "ए राजू !"

राजू : --   का मास्टर जी !

           " इ हमार देस का मंत्री मंडल है.....की बिटिया के बाबुल की बस्ती है
             देस के जित्ते भी दरोगा हैं सब इन्हीं की सुरक्षा में तो लगे हैं
             तिसपर भी इ मंत्रिगन अउर राष्ट्रपति की बिटियाएँ कहती हैं
             हमका तो इस देस मा भय लगता है जी ! जब बाबुल के अंगना
             के अँजोर से इत्ता ही भय लगता है तो बिदा काहे नहीं कर देते..,

राजू : -- अउर मास्टर जी ! उ देखो इ बस्ती के चौकीदार.....'बेटवा के मैया' 
            उ भी कुंवारा बेटवा के मैया......उ कहते हैं हमका तो भय ही नहीं
            लगता जी ! अब सारी सेना सीमा को छोड़ इन की सुरक्षा करे तो
            भय काहे को लगेगा.....एक बारी इनको 'बाँध'कर देखिये
            फिर तो हम भी देखंगे की बछुवा भयभीत होते हैं के नाही.....    

शनिवार, 22 दिसंबर 2012

----- मिनिस्टर राजू 70 -----

राजू : -- ऐ मास्टर जी !

" हाँ, सुन रहा हूँ बोलो..,"

राजू : -- आप तो कहे रहीं की लोगन मन की भीड़ जुड़ाओ,
            जूड़ तो गई अब भी उ देखत,सुनत बोलत नाहीं हैं ..,

" हमने  केतना लोगन के भीड़ जोड़न को कहा..??

राजू : -- मास्टर जी ! लाख-पचास..,

" हाँ उहाँ जूड़ी कितनी..,
                        
राजू : -- दस-बीस हजार, ऐ मास्टर जी !

             हमरे 'राऊ' भी बड़े ही बिचित्र हैं
             अरु 'राऊ' रउधानी अपवित्र है
              इक मंत्री को कहत हैं : --
              तुम रतियन महुँ नगरिया जाओ
              चौंक डगरिया घूम के आओ
              तनि सीत  ऋतु के सोर लई के आओ
              अब आप ही बताओ
              एक तो पुरुस के गात तिसपर मंत्री जात
              अब कौनु का तो उसका 'लूटेगा' का उसको 'पिटेगा'
              थोथे चने  हैं बाजे घने हैं
              पहले से ही 'लुटे-पिटे' हैं तभी तो मंत्री बने हैं.....
   


             




बुधवार, 19 दिसंबर 2012

----- मिनिस्टर राजू 69 -----

राजू : -- मास्टर जी ! जदि भारत मा उ 'अंग्रेज टाइप' फिर से कोई आ जावें
              तो का होगा..??

" राजू ! होगा का उ 'अंग्रेज टाइप' भारत के संबिधान को दुई टुक करेंगे
             और जन साधारण के हाथ मा धरा कर कहेंगे इ लो तुम्हारा 'संबिधान'..,

राजू : -- मास्टर जी । फिर का होगा..??,


" राजू ! फिर का होना है उ नेता-मंत्री लोगन को और उ बढ़ महान उद्योगपति
            लोगन को बिसेस राकेट मा बाँध-जोर के छोड़ आवेंगे
            'मून के रंगून मा' और कहेंगे देखो चंदरमा मा मानव जाति के प्रभाव..,

राजू : -- मास्टर जी ! फिर का होगा..??,

" राजू ! फिर का होना है पूछेंगे........उ हवा से.......तुमको वहां से का दिखाई देत है
  तो उ कहेंगे हम से का पूछत हो....... इ हमार पूँछ से पूछो.....पूंछ उलट हवा से ही कहेंगे
  अब काहे अंधवा हो गए.....काहे नाहीं कहते की तुमको तुम्हारे भाई के ताजमहल दिखाई
  देत है और भाई को हवा का महल..,

राजू :-- मास्टर जी ! और उ हाथी -चूहा का, का होगा..??

"वही......जो बहादुर साह जफ़र का हुवा था...... लिखते फिरेंगे

              चंद अल्फाजों की मूहर है जर्रे महताब पर 
               जहाँ से जमीं देखूं मुझको जन्नत लगे है 



 

शुक्रवार, 14 दिसंबर 2012

----- मिनिस्टर राजू 68 -----

"राजू ! का कर रहे हो..,"

राजू :-- मास्टर जी ! रामलीला के मंचन का 'जुगाड़'

" काहे कर रहे हो..,"

राजू :-- मास्टर जी ! काहे की उ बिना लाख पचास हजार लोगन की भीड़
             देखे न तो कछु बोल बतियाते  हैं ना ही कछु बताते हैं.....

गुरुवार, 13 दिसंबर 2012

----- मिनिस्टर राजू 67 -----

राजू : -- मास्टर जी !

" हूँ..,"

राजू : -- मास्टर जी !

" हाँ सुन रहा हूँ बोलो न..,"

राजू : -- मास्टर जी ! इसी लिए तो उ नाही बोलते जे कभी कभार
             बोल भी दीए तो आप लोगन का खेलना सुरू हो जाता है
             जे सबेरे 'बिलाग-बिलाग' ते सांझन में 'बिक्रम-बेताल'..... 

बुधवार, 12 दिसंबर 2012

----- मिनिस्टर राजू 66 -----

" राजू ! तनिक इ बताओ तोहार गुरुजी कौन हैं..,"

राजू :-- मास्टर जी ! 'आप'

" अच्छा ! अच्छा है ! अच्छा है !! बड़ी.....शीघ्रता पूर्वक उत्तर दिया.....
   तनिक ए भी बताओ तोहार 'माम' का गुरजी कौन है..??

राजू : --  कल 'माम' से पूछने ही वाला था कि हमार 'दादी आ गईं'
              और 'बोल पड़ी' कहने लगी रे बछुआ ! तोहार 'अब्बू' कहा जा के ठेका
              खाएं भए तनिक अच्छी जगह ठेका खाते तो दुइ चार परमानु बम
              नहीं लाते दहेज मा , मास्टर जी ! हम भी कह दिए रहे उसमें से
              एक तिहार मूढ़ मा फोड़ देबेंगे, अब इ 'दादी' जावेंगी तो हम पूछ
               के बतावेंगे की हमार 'माम' के गुरजी कौन भए,

" लगे हाथ इ भी पूछ लियो के उन्हें हमार देस के डाक्टर में बॉस काहे
   आत है 'उकील' अउ ओके बछुआ माँ तो बहुंत सुगंध आत है..... 

मंगलवार, 11 दिसंबर 2012

----- मिनिस्टर राजू 65 -----

राजू : -- मास्टर जी ! इ सरदार मेक मोहन 'खान' मा  न तो 'अरदास-अजान'
             होत है और ना ही 'पूजन-पिरेयर, अब इस उम्र में बचा ही का है .....
             ढाँचा ही तो हैं..... गिरा काहे नहीं देते..,
           

           " राजू    ----
                                वो लहू कोई और था वो रवानी कुछ और थी..,
                                जाँ-निसार वतन पे नौजवानी कुछ और थी..,
                                वो जिस्म दफन ख़ाक में रूहें थी कुछ अलहदा..,
                                सुलगती हुई जान की शम्मे-दानी कोई और थी..,
                               
                                उ का हैं धान के खोखरी भूसी हैं भूसी, इ तो एके
                                'फूंक' में बाबर की मजिद से सीधे  'मोती' की मजिद
                                में बाँग देते दिखबे करेंगे..... सीधे प्रसारण स्वरूप....."

रविवार, 9 दिसंबर 2012

----- मिनिस्टर जी -----

                 

              विद्यमान समस्त चुनावी दल एवं उनके धरता, संचालन करता, स्वामी
              मत के दान हेतु सुपात्र हैं?? -------  नहीं हैं..,
              ( सुपात्र = धर्माधिकारी,सदाचारी, मर्यादित, पुरुषोत्तम, सत्यवादी, नीतिकुशल,
                सद्चरित्र, सरलहृदय, विनम्र आदि आदि.....)


              इन्हीं के विचारों का अनुसरण करने तथा इनके ही आदेशों का पालन करने वाले
              इनके प्रत्याशी सुपात्र होंगे?? ------ नहीं होंगे..,


              क्या कभी कोई निर्दलीय प्रत्याशी सुपात्र  हुवा----- नहीं,  वो भी इन्हीं के जैसा हो गया..,

             विगत उत्तर प्रदेश के विधान सभा चुनाव में यदि मतदाता सोचते समझते तो इन दलों
             एवं इनके प्रत्याशियों के कभी भी अपना बहुमूल्य मत नहीं देते..,
             क्या गुजरात के मतदाता सोचेंगे..?? समझेंगे..?? और अपना अमूल्य मत इन
             भ्रष्टाचारियों को नहीं देंगे.....??  

शनिवार, 8 दिसंबर 2012

----- मिनिस्टर राजू ६४ -----


" राजू ! क्या देख रहे हो ?? "

राजू : -- मास्टर जी ! 'झंडा'

 " झंडे में क्या देख रहे हो..??"

राजू : -- मास्टर जी ! 'चरखा'

" चरखे में क्या देख रहे हो..??"

राजू : -- मास्टर जी ! 'माल'

" माल में क्या देख रहे हो..??"

राजू : -- मास्टर जी ! 'जगत भोजाई'

" मुझको भी दिखाओ ना..??"

राजू : -- मास्टर जी । काली माया हो तभी माल एवं माल
             कि भोजाई दिखती है आपको नहीं दिखेगी वो आपके
             पास है नहीं

----- मिनिस्टर जी -----


                                 स्वतंत्रता प्राप्ति के काल से विद्यमान दिवस तक 'राजनीति'
                                 ने लोकतंत्र को इतना विकृत कर दिया कि वर्त्तमान समय 
                                 में ' नेता-मंत्री' भ्रष्टाचारियों के नाम क छुपाती है एवं 
                                 सद आचारियों के नाम लेते लजाती है.....

----- MINISTAR RAAJU 63 -----

राजू : -- मास्टर जी ! इ नेता-मंत्री लोगन 'नेहरू कट शेरवानी' मार के
             गज गज भर लम्बी जीभ से अघनवा में भी बरसाती मेंढकु के
             जइसे टर-टर करते रहते हैं की हमार लोकतंत्रवा में  कोन्हू
             भी दल भीत में कोई नेक, ईमानदार, सदाचारी, सच्चा, मर्यादित,
             पुरुषोत्तम,सीधा,गुनी आदि आदि नेता मंत्री नई हें का जदी हें
             तो सीधे सीधे उस नेक, ईमानदार के नाम बताते क्यूँ नहीं??
             नाम बता के उसको राष्ट्रपति प्रधान मंत्री बनाते क्यूँ नहीं..??

            " बनाया तो है वो देखो सरदार मेक मोहन 'खान' और  वो देखो  
              बग्गी वाले उरी 'बाबा'..,


राजू : -- मास्टर जी ! ये बग्गी वाले 'उरी' बाबा की कहानी फिर सही
              ये जो सरदार मेक मोहन 'खान' उर्फ़ पगड़ी, घंटी आदि आदि
              वाले बाबा हैं, इनको मान देय तो डेढ़ दो लाख रुपया प्रति महीना
              ,मिलता है पगढ़ी ये नित नए दिन पचास-पचास हजार की
               पहनते हैं इनके परिधान को तो मास्टर जी । पूछो ही मत
               हर दुसरे दिन रात्री-दिवस के भोज समारोह में राजसी भोग
               के चटखारे ले के अन्न के कण को तरसते अपने मत दाता
               को कहते हैं 'मैं पुरुषोत्तम हूँ'  अस्सी साल की जरा अवस्था
               में विदेश में अपने जन्म दिन पर गुलछर्रे उड़ाकर गांधी जी
               की समाधि पर फूल चडाते कहते हैं की मैं तो देश भक्त हूँ
               मास्टरजी ! सदाचार  की क्या यही परिभाषा है??

           
               " राजू ! राजू !! राजू !!! यह तो दृष्टिकोण का अंतर मात्र है
                 अब देखो न 51-51 लाख रूपए यूहीं मंदिरों में दान पर
                 उड़ाने वाल व्यक्ति को 5-10 लाख में गाना बेचने वाला
                 बेचारा व  निर्धन तो लगेगा ही अब इसके पश्चात 'भारत-रत्न'
                  की क्या आवश्यकता है, है कि नहीं.....वैसे ही सबको सरदार
                 'खान' भी सदाचारी दिखते हैं,










शुक्रवार, 7 दिसंबर 2012

----- मिनिस्टर जी -----

सत्ताधारीयों ने भ्रष्टाचार की भूमि से काले धन की उपज उगाहने के लिए
चुनाव आयोग जैसे कई बैइलवा को पाल रखा है भाई जीत्ति बड़ी डोली
( खेतिहर भूमि )होगी  ढोर-डांगर  भी तो  उत्ते ही चाहिए, है की नहीं..... 

गुरुवार, 6 दिसंबर 2012

----- मिनिस्टर जी -----


                                भारतीय संविधान में 'मत' को 'दान' स्वरूप स्वीकार करते हुवे इसे
                                नागरिकों के अधिकार श्रेणी में समाहित किया है । 'दान' का शाब्दिक
                                अर्थ है धर्म हेतु या दयावश किसी को कोई वस्तु प्रदान की क्रिया जो
                                 एक ऐच्छिक प्रक्रिया है..,

                                 विगत वर्षों में हमारे नेता-मंत्रियों ने, चुनाव आयोग  एवं सूचना व
                                 प्रसारण माध्यमों ने मतदाताओं के मस्तिष्क  में  मतदान (जो कि
                                 अधिकार रूप में है ) को कर्त्तव्य स्वरूप में  स्थापित  कर दिया, इस
                                  स्थापना की नींव को हिलाने की प्रक्रिया की समय साधना उतनी
                                  ही होगी जितनी की इसके स्थापन में साध्य थी व है..,


                                   नेता-मंत्रियों की इस स्थापना के प्रति आसक्ति सत्ता सेंधने व
                                   साधने हेतु है यह सर्वथा ज्ञात है..,


                                    चुनाव आयोग ऐसा दोमुखी पशु है जो सत्ता धारियों के लिए तो
                                    'बैल' है, दो चाँदी के डंडे मारे नहीं के जिधर हँकाओ उधर ही हाँक
                                    जाता है, मतदाता के लिए यह काली भैंस है जिसके आगे कित्ता
                                     भी बिन बजाओ ये सुनती ही नहीं..,

                                     बचा हमारा सूचना व प्रसारण  माध्यम जिए  'आम' भाषा में
                                     'मीडिया' कहते है बिना विज्ञापन के यहाँ कोई भी चित्र उपलब्ध 
                                      नहीं है फिर ये नेता-मंत्रियों का व चुनाव आयोग की 'निशुल्क सेवा'
                                      क्यूँकर करते है?? प्रश्न विचारणीय है.....
                              



                             







मंगलवार, 4 दिसंबर 2012

----- मिनिस्टर राजू 62 -----

" राजू ! तुमने इतना अच्छा मुस्कराना कहाँ से सीखा..??"

राजू :-- मास्टर जी ! मीरा बाई के भजन सुनकर..,

" तुम्हारा साल तो बहुंत अच्छा है कहाँ से लिया..,"

राजू :-- पिछले साल मेरे पिता जी के साले ने अर्थात मेरे मामा जी ने दिया था
             मास्टर जी ! लगता है आप काला पानी जाए बिना नहीं मानेंगे..,

" राजू ! ऐसे प्रधान मंत्री एवं प्रधान मंत्री पद के ऐसे ऐसे प्रत्यासी को 'देखने'
  से तो अच्छा है कि मैं  कालापानी चला जाऊं.....  

----- ॥ दोहा-दशम 363॥ -----,

सभा सदस बैठे रचे आपहि नेम विधान  तोड़ करे पुनि आपही न्याय का अवमान ॥१||  :-- देश के सांसद स्वयं नियम विधानों की रचना करते हैं तत्पश्चात स्वय...