शुक्रवार, 2 नवंबर 2012

----- मिनिस्टर राजू 56 -----

राजू : -- उपबरहन बर बरनि न जाहीं । स्त्रग सुगंध मनिमंदिर माहीं ।।
             रतनदीप सुठि चारु चँदोवा । कहत न बनइ जान जेहिं जोवा  ।।बा.का. दो. 355 चौ.2

                  मास्टर जी ! तुलसी दास द्वारा रचित इस चौपाई का अर्थ कृपया विस्तार पूर्वक
              एवं सरल शब्दों में समझाइये न !!

            मैं अर्थशास्त्र का अध्यापक थोड़े ही हूँ, ये अर्थशास्त्र के अध्यापक से पूछो
            वो ही अच्छे से समझायेंगे..,


राजू : -- मास्टर जी ! वो क्या समझायेंगे जब उनसे पूछा गया की दाना-पानी
              इतना महँगा क्यूँ है तो उनके पास शब्द ही नहीं थे..,


  " इसके लिए शब्दों की क्या आवश्यकता है महँगा है तो छोड़ दो..,


राजू : -- मास्टर जी ! क्या छोड़ें खाना-पीना.....या.....पीना-खाना..??


  " महंगा क्या हुवा है..??"

राजू : -- मास्टर जी ! दाना-पानी !!


" हाँ तो छोड़ोगे क्या..??"

राजू : -- खाना-पीना, मास्टर जी आप मास्टर कैसे बने..??

" फोटू देखकर..,"

राजू : -- अच्छा ! फोटू देखकर भी मास्टर बनते हैं..,

" हाँ ! हमारे देश में तो बनते हैं, ये बता तू महा मिनिस्टर कैसे बना..??'

राजू : -- मास्टर जी ! मरे हुवे रावण पर तीर चलाती फोटू दिखाकर.."
           
 






              

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