राजू : -- उपबरहन बर बरनि न जाहीं । स्त्रग सुगंध मनिमंदिर माहीं ।।
रतनदीप सुठि चारु चँदोवा । कहत न बनइ जान जेहिं जोवा ।।बा.का. दो. 355 चौ.2
मास्टर जी ! तुलसी दास द्वारा रचित इस चौपाई का अर्थ कृपया विस्तार पूर्वक
एवं सरल शब्दों में समझाइये न !!
मैं अर्थशास्त्र का अध्यापक थोड़े ही हूँ, ये अर्थशास्त्र के अध्यापक से पूछो
वो ही अच्छे से समझायेंगे..,
राजू : -- मास्टर जी ! वो क्या समझायेंगे जब उनसे पूछा गया की दाना-पानी
इतना महँगा क्यूँ है तो उनके पास शब्द ही नहीं थे..,
" इसके लिए शब्दों की क्या आवश्यकता है महँगा है तो छोड़ दो..,
राजू : -- मास्टर जी ! क्या छोड़ें खाना-पीना.....या.....पीना-खाना..??
" महंगा क्या हुवा है..??"
राजू : -- मास्टर जी ! दाना-पानी !!
" हाँ तो छोड़ोगे क्या..??"
राजू : -- खाना-पीना, मास्टर जी आप मास्टर कैसे बने..??
" फोटू देखकर..,"
राजू : -- अच्छा ! फोटू देखकर भी मास्टर बनते हैं..,
" हाँ ! हमारे देश में तो बनते हैं, ये बता तू महा मिनिस्टर कैसे बना..??'
राजू : -- मास्टर जी ! मरे हुवे रावण पर तीर चलाती फोटू दिखाकर.."
रतनदीप सुठि चारु चँदोवा । कहत न बनइ जान जेहिं जोवा ।।बा.का. दो. 355 चौ.2
मास्टर जी ! तुलसी दास द्वारा रचित इस चौपाई का अर्थ कृपया विस्तार पूर्वक
एवं सरल शब्दों में समझाइये न !!
मैं अर्थशास्त्र का अध्यापक थोड़े ही हूँ, ये अर्थशास्त्र के अध्यापक से पूछो
वो ही अच्छे से समझायेंगे..,
राजू : -- मास्टर जी ! वो क्या समझायेंगे जब उनसे पूछा गया की दाना-पानी
इतना महँगा क्यूँ है तो उनके पास शब्द ही नहीं थे..,
" इसके लिए शब्दों की क्या आवश्यकता है महँगा है तो छोड़ दो..,
राजू : -- मास्टर जी ! क्या छोड़ें खाना-पीना.....या.....पीना-खाना..??
" महंगा क्या हुवा है..??"
राजू : -- मास्टर जी ! दाना-पानी !!
" हाँ तो छोड़ोगे क्या..??"
राजू : -- खाना-पीना, मास्टर जी आप मास्टर कैसे बने..??
" फोटू देखकर..,"
राजू : -- अच्छा ! फोटू देखकर भी मास्टर बनते हैं..,
" हाँ ! हमारे देश में तो बनते हैं, ये बता तू महा मिनिस्टर कैसे बना..??'
राजू : -- मास्टर जी ! मरे हुवे रावण पर तीर चलाती फोटू दिखाकर.."
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