बुधवार, 21 नवंबर 2012

----- मिनिस्टर राजू 59 -----

राजू !  'बिहान बहिर भए साँझ बहुरे'  को क्या कहते हैं..??

राजू :-- मास्टर जी ! 'भूला"

 और " बिहान बहिर बहु बरस बहुरे "  को क्या कहते हैं..??

राजू : -- मास्टर जी !  "भटका" अथवा "भारत सरकार"

और " बिहान बहिर भए कभु न बहुरे " को क्या कहतें हैं..??

राजू : --  इसे भूतकाल काल में 'अंग्रेज' व वर्त्तमान काल में भी 'अंग्रेज' ही कहते हैं............
              मास्टर जी ! आपने अपने 'प्रभु' का जो प्राण प्रतिष्ठान कर के रखा है
              वहां इन राष्ट्रपति, प्रधानमन्त्री, मुख्यमंत्री, मंत्रीगण, सांसद, विधायक तथा
              तथाकथित नेताओं की प्रतिस्थापना कर पूजन आरम्भ कर दीजिये
              अन्यथा ये आपका सांस लेना भी कठिन कर देंगे.... और "भारत सरकार"
              की इस  " अमरीकागिरी "  पर तो टिका टिप्पणी तो बिलकुल मत कीजिये
              वरना आपका तो कालापानी से ही सीधा प्रसारण होगा, वहां फिरते पूछते रहिएगा
              " भूले एवं भटके में क्या अंतर है..?? "

            " हाँ राजू मैने तो किसी को भी नहीं मारा है फिर भी मुझे "भारत सरकार" के इस
            " चुपके-छुपके " से डर लगने लगा है, कौन जाने कल सुबह में कौन सी
               रंग बिरंगी रस्सी से लटकता मिलूं..,

राजू : -- मास्टर जी ! डर तो मुझे भी एक 'शेर टाइप ' से लगता है
              आए बरस दर पर खडा रहता है,  कहता है 'मत' दे..... मत दे.....मतदे

" अब की बारी आए तो उसे कहना तू अपने नाख़ून और दांत उखाड़ के आ.."

राजू : -- मास्टर जी ! वो फिर भी आ गया तो..??

" फिर वो तेरा क्या बिगाड़ लेगा एक डंडा मार के भगा देना.....
  वैसे भी पिंजरे के शिकार के शिकारी शेर थोड़ी न होते हैं.....गीदड़ होते हैं.....






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