शुक्रवार, 30 नवंबर 2012

----- मिनिस्टर राजू 61 -----

" राजू !माना कि तुम्हारे पास 10 रूपए हैं, यदि 'सरकार' उसमें से
   2 रूपए ले ले तो इसे क्या कहेंगे..??


राजू : -- मास्टर जी !! आर्थिक सुधार अर्थात 'लूट की छूट'..!!

" इन्ही 2 रूपए में से 1 रूपए अपनी 'जेब' में रखे और 1 रूपए कुछ समय
  बाद तुम्हें वापस कर दे तो उसे क्या कहेंगे..??

राजू : -- मास्टर जी !! राजनीति अर्थात 'धंधा'.....  

शनिवार, 24 नवंबर 2012

----- मिनिस्टर राजू 60 -----

राजू : -- मास्टर जी ! कल आपण इर 'भारत सरकार' पर टिका टिपण्णी की
             आपको भय नहीं लगा..??

            " राजू ! भय तो बहुंत लगा में रात भर सो ही नहीं पाया
              आहट सी भी कोई होती तो ऐसा लगता था की दरोगा ही हैं,
              कोई परछाई भी लहराती तो ऐसा लगता की थानेदार ही हैं
              कोई द्वार खटखटाता तो ऐसा लगता स्वयं सरकार ही हैं
              राजू ! रात का सन्नाटा मैं 'वो' 'वो' और मैं और उसके छोटे-
              छोटे, छोटे-छोटे, छोटे-छोटे......

राजू : -- मास्टर जी ! छोटे- छोटे क्या..??

              "कार्यक्रम"

राजू : -- ओह! तो ऐसा बोलो न की दूरदर्शन था.....
             मास्टर जी ! जब दूरदर्शन ही था तो सन्नाटा किधर से हुवा..??

            " मुर्ख मैने उसे निस्वर अर्थात म्यूट कर रखा था..'


राजू : -- मैं भी परसों 'मल ग्रहण मिशन' के दर्शन पश्चात आज सुबह रामायण
             व महाभारत के जैसे  'जल ग्रहण मिशन' की बाट जोह रहा था
             वैसे भी आपमें और जल वाले गुरु जी में अंतर ही कितना है लटक
             आप जाइए, सबेरे पहले दूरदर्शन पर सरकार घंटियाँ गुरु जी की
             बजवा देगी..,

            " राजू  ! तू इतनी बुद्धि आम औरत की पार्टी बनाने में लगाता तो कब का प्रधान
              मंत्री बन गया होता..,

राजू : --  मास्टर जी ! आप उसके नियंत्रण यन्त्र अर्थात रिमोट कंट्रोल.....







  

बुधवार, 21 नवंबर 2012

----- मिनिस्टर राजू 59 -----

राजू !  'बिहान बहिर भए साँझ बहुरे'  को क्या कहते हैं..??

राजू :-- मास्टर जी ! 'भूला"

 और " बिहान बहिर बहु बरस बहुरे "  को क्या कहते हैं..??

राजू : -- मास्टर जी !  "भटका" अथवा "भारत सरकार"

और " बिहान बहिर भए कभु न बहुरे " को क्या कहतें हैं..??

राजू : --  इसे भूतकाल काल में 'अंग्रेज' व वर्त्तमान काल में भी 'अंग्रेज' ही कहते हैं............
              मास्टर जी ! आपने अपने 'प्रभु' का जो प्राण प्रतिष्ठान कर के रखा है
              वहां इन राष्ट्रपति, प्रधानमन्त्री, मुख्यमंत्री, मंत्रीगण, सांसद, विधायक तथा
              तथाकथित नेताओं की प्रतिस्थापना कर पूजन आरम्भ कर दीजिये
              अन्यथा ये आपका सांस लेना भी कठिन कर देंगे.... और "भारत सरकार"
              की इस  " अमरीकागिरी "  पर तो टिका टिप्पणी तो बिलकुल मत कीजिये
              वरना आपका तो कालापानी से ही सीधा प्रसारण होगा, वहां फिरते पूछते रहिएगा
              " भूले एवं भटके में क्या अंतर है..?? "

            " हाँ राजू मैने तो किसी को भी नहीं मारा है फिर भी मुझे "भारत सरकार" के इस
            " चुपके-छुपके " से डर लगने लगा है, कौन जाने कल सुबह में कौन सी
               रंग बिरंगी रस्सी से लटकता मिलूं..,

राजू : -- मास्टर जी ! डर तो मुझे भी एक 'शेर टाइप ' से लगता है
              आए बरस दर पर खडा रहता है,  कहता है 'मत' दे..... मत दे.....मतदे

" अब की बारी आए तो उसे कहना तू अपने नाख़ून और दांत उखाड़ के आ.."

राजू : -- मास्टर जी ! वो फिर भी आ गया तो..??

" फिर वो तेरा क्या बिगाड़ लेगा एक डंडा मार के भगा देना.....
  वैसे भी पिंजरे के शिकार के शिकारी शेर थोड़ी न होते हैं.....गीदड़ होते हैं.....






शुक्रवार, 9 नवंबर 2012

----- मिनिस्टर राजू 58 -----

राजू : -- बिधि हरि हर कबि कोबिद बानी । कहत साधु महिमा सकुचानी ।।
              सो मो सन कहि जात न कैसे । साक बनिक मनि गुण गन जैसे ।।रा. च. मा. /बा. का. /दो. न. 2चौ. न.6
                   
                   मास्टर जी ! उक्त चौपाई का ससंदर्भ प्रसंगपूर्ण अर्थांकन कीजिए न..,

              " ये चौपाई लिखी किसने है..??"

राजू : -- मास्टर जी ! गोस्वामी तुलसी दास ने..,


             " तो उन्ही से पूछो वो ही तुम्हें अच्छे से बताएंगे, तुम मुझे ये बताओ
                कल तुम पुन: माल में क्या कर रहे थे.."

राजू : -- मास्टर जी ! 'जगत भौजाई' को ढूंड रहा था..,


           " मिली..??'

राजू : -- मिली तो किन्तु उतनी आकर्षक नहीं लग रही थी
             मास्टर जी ! ये कौन से क्षेत्र से आती हैं..??


           " कुरुक्षेत्र से....." 

  

रविवार, 4 नवंबर 2012

----- मास्टर राजू 57 -----

"राजू ! क्या पढ़ रहे हो..??"

राजू : -- मास्टर जी एक 'धार्मिक' पुस्तक पढ़ रहा हूँ !

" क्या नाम हैं पुस्तक का..??"

राजू : -- पा.....पा.....(ई).....की पप्पियाँ.....मास्टर जी ! आप भी पढेंगे..??

" मैनें तो इसे कल ही पढ़ लिया था..,

राजू : -- मास्टर जी ! तनिक ये तो बताइये इनके 'प्रभु' सैय्या  में सोते ही रहेंगें  की
              उठेगें  भी..??

" राजू ! ये सबके बैंड बजवा के ही उठते हैं.....


शुक्रवार, 2 नवंबर 2012

----- मिनिस्टर राजू 56 -----

राजू : -- उपबरहन बर बरनि न जाहीं । स्त्रग सुगंध मनिमंदिर माहीं ।।
             रतनदीप सुठि चारु चँदोवा । कहत न बनइ जान जेहिं जोवा  ।।बा.का. दो. 355 चौ.2

                  मास्टर जी ! तुलसी दास द्वारा रचित इस चौपाई का अर्थ कृपया विस्तार पूर्वक
              एवं सरल शब्दों में समझाइये न !!

            मैं अर्थशास्त्र का अध्यापक थोड़े ही हूँ, ये अर्थशास्त्र के अध्यापक से पूछो
            वो ही अच्छे से समझायेंगे..,


राजू : -- मास्टर जी ! वो क्या समझायेंगे जब उनसे पूछा गया की दाना-पानी
              इतना महँगा क्यूँ है तो उनके पास शब्द ही नहीं थे..,


  " इसके लिए शब्दों की क्या आवश्यकता है महँगा है तो छोड़ दो..,


राजू : -- मास्टर जी ! क्या छोड़ें खाना-पीना.....या.....पीना-खाना..??


  " महंगा क्या हुवा है..??"

राजू : -- मास्टर जी ! दाना-पानी !!


" हाँ तो छोड़ोगे क्या..??"

राजू : -- खाना-पीना, मास्टर जी आप मास्टर कैसे बने..??

" फोटू देखकर..,"

राजू : -- अच्छा ! फोटू देखकर भी मास्टर बनते हैं..,

" हाँ ! हमारे देश में तो बनते हैं, ये बता तू महा मिनिस्टर कैसे बना..??'

राजू : -- मास्टर जी ! मरे हुवे रावण पर तीर चलाती फोटू दिखाकर.."
           
 






              

----- ॥ दोहा-दशम 363॥ -----,

सभा सदस बैठे रचे आपहि नेम विधान  तोड़ करे पुनि आपही न्याय का अवमान ॥१||  :-- देश के सांसद स्वयं नियम विधानों की रचना करते हैं तत्पश्चात स्वय...