रविवार, 28 अक्टूबर 2012

----- मिनिस्टर राजू 54 -----

राजू : -- " को प्रभु सँग मोहि चितबनिहारा । सिंघबधुहि जिमि ससक सिआरा ।।" अ.का.दो.न.66चौ.4
               मास्टर जी ! तुलसी दास रचित इस चौपाई का अर्थ समझाइये न..,


          " प्रभु के साथ मेरी ओर देखनेवाला कौन है ! जैसे सिंह की स्त्री को खरगोश
             और सियार नहीं देख सकते ।"


राजू : मास्टर जी ! 'अर्थात'!!


 " अर्थात सीता जी कहती हैं जंगल में तुम्हारे जैसे शेर के होते हुवे मुझे कौन
    देख लेगा शेरनी को शेर ही देखेगा, राजू -- सीताराम को ये नहीं पता था कि
    जंगल में दस सिर वाला एक और शेर रहता है जो देखेगा भी और उठा के
    भी ले जाएगा, यदि माया के पीछे भागोगे तो सीता को कोई न कोई तो
    देखेगा ही न..,
                राजू ! राजू !! में तुम्हे पढ़ा रहूँ तुम इधर उधर क्या देख रहे हो..??


राजू : -- मास्टर जी ! आपके नए विद्यार्थी..... !! जाइए जाइए.....उन्हें भी नापीये.....
                    

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