रविवार, 7 अक्टूबर 2012

----- मिनिस्टर राजू 46 -----

  " राजू ! कल तुम माँल में क्या कर रहे थे..??"


राजू : -- मास्टर जी ! माल देख रहा था..!!


" तुम्हारा माली कहाँ था..वो तुम्हे क्यूँ नहीं देख रहा था..??"


राजू : -- मास्टर जी ! मैं तो माली की वनमाला का एक टूटा
            हुवा फूल हूँ.....कभी इस चरण में.....कभी उस चरण में..,


" तू वनमाली का फुल नहीं उसके वन का टूटा हुवा बाँस है.....,
  कभी इस अधर में.....कभी उस अधर में.....


राजू : -- मास्टर जी ! आप माँल में क्या कर रहे थे..??


" मैं वहां अन्तरराष्ट्रीय साडू को ढूंड रहा था..


राजू : -- मास्टर जी ! मिला..??


" मिला भी.....और मिली भी..,

राजू : -- मास्टर जी ! कौन सी वाली मिली..??

" जगत भोजाई मिली.....".

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