" राजू ! कल तुम माँल में क्या कर रहे थे..??"
राजू : -- मास्टर जी ! माल देख रहा था..!!
" तुम्हारा माली कहाँ था..वो तुम्हे क्यूँ नहीं देख रहा था..??"
राजू : -- मास्टर जी ! मैं तो माली की वनमाला का एक टूटा
हुवा फूल हूँ.....कभी इस चरण में.....कभी उस चरण में..,
" तू वनमाली का फुल नहीं उसके वन का टूटा हुवा बाँस है.....,
कभी इस अधर में.....कभी उस अधर में.....
राजू : -- मास्टर जी ! आप माँल में क्या कर रहे थे..??
" मैं वहां अन्तरराष्ट्रीय साडू को ढूंड रहा था..
राजू : -- मास्टर जी ! मिला..??
" मिला भी.....और मिली भी..,
राजू : -- मास्टर जी ! कौन सी वाली मिली..??
" जगत भोजाई मिली.....".
राजू : -- मास्टर जी ! माल देख रहा था..!!
" तुम्हारा माली कहाँ था..वो तुम्हे क्यूँ नहीं देख रहा था..??"
राजू : -- मास्टर जी ! मैं तो माली की वनमाला का एक टूटा
हुवा फूल हूँ.....कभी इस चरण में.....कभी उस चरण में..,
" तू वनमाली का फुल नहीं उसके वन का टूटा हुवा बाँस है.....,
कभी इस अधर में.....कभी उस अधर में.....
राजू : -- मास्टर जी ! आप माँल में क्या कर रहे थे..??
" मैं वहां अन्तरराष्ट्रीय साडू को ढूंड रहा था..
राजू : -- मास्टर जी ! मिला..??
" मिला भी.....और मिली भी..,
राजू : -- मास्टर जी ! कौन सी वाली मिली..??
" जगत भोजाई मिली.....".
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