राजू : -- मास्टर जी ! मेरे माता-पिता ने मुझे नई द्वि चक्र वाहिनी दिलवाई है,
" अच्छा ! कैसी है "
राजू : -- " मास्टर जी ! बिलकुल मेरे मन के जैसी, वो भी केवल हवा में ही तथा
हवा से ही बातें करती है"
" राजू !! तू भी किसी संग्राहलय में संग्रहण करने के योग्य है
तेरी चप्पल एवं सायकल में अंतर करना कठिन है"
" अच्छा ! कैसी है "
राजू : -- " मास्टर जी ! बिलकुल मेरे मन के जैसी, वो भी केवल हवा में ही तथा
हवा से ही बातें करती है"
" राजू !! तू भी किसी संग्राहलय में संग्रहण करने के योग्य है
तेरी चप्पल एवं सायकल में अंतर करना कठिन है"
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