शनिवार, 22 सितंबर 2012

----- मिनिस्टर राजू 41 -----

" राजू ! कल शाम तुम्हारी आबरू कहाँ थी..??"


राजू : -- मास्टर जी ! मेरे वालिद-वालिदान के चमन की हिफाजत कर रही थी..!!


" क्यों कर रही थी..??"


राजू : -- मास्टर जी ! चमने-दरख़्त की शाखों पर रकम रकम के
            समर लटक रहे थे जो आता वही लुट ले जाता..!!


" निगेबाँ रहना अबकी बार खोद कर ही न ले जाएँ..!!"

    बदनजरे-दामन थीं खुद निगाबान की.., 
    शाखे-समरदार थीं मेरे गुलिस्तान की..,
    जहां  आगोशे-जां  खामोश  रही जबां..,
    आबरू लूटती  रही  मेरे  आशियाँ  की.....   

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