" राजू ! कल शाम तुम्हारी आबरू कहाँ थी..??"
राजू : -- मास्टर जी ! मेरे वालिद-वालिदान के चमन की हिफाजत कर रही थी..!!
" क्यों कर रही थी..??"
राजू : -- मास्टर जी ! चमने-दरख़्त की शाखों पर रकम रकम के
समर लटक रहे थे जो आता वही लुट ले जाता..!!
" निगेबाँ रहना अबकी बार खोद कर ही न ले जाएँ..!!"
बदनजरे-दामन थीं खुद निगाबान की..,
शाखे-समरदार थीं मेरे गुलिस्तान की..,
जहां आगोशे-जां खामोश रही जबां..,
आबरू लूटती रही मेरे आशियाँ की.....
राजू : -- मास्टर जी ! मेरे वालिद-वालिदान के चमन की हिफाजत कर रही थी..!!
" क्यों कर रही थी..??"
राजू : -- मास्टर जी ! चमने-दरख़्त की शाखों पर रकम रकम के
समर लटक रहे थे जो आता वही लुट ले जाता..!!
" निगेबाँ रहना अबकी बार खोद कर ही न ले जाएँ..!!"
बदनजरे-दामन थीं खुद निगाबान की..,
शाखे-समरदार थीं मेरे गुलिस्तान की..,
जहां आगोशे-जां खामोश रही जबां..,
आबरू लूटती रही मेरे आशियाँ की.....
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