सोमवार, 17 सितंबर 2012

----- मिनिस्टर राजू 38 -----

                                                   "  सुदर्शनम् कमलाकरम् " 


 " राजू !  परसों हिन्दी एवं उसका व्याकरण पढ़ाया था,
   अब इस शीर्षक की कविता के भाव बताओ..??"


  राजू : -- मास्टर जी ! यदि माया रूपी शेषनाग की छाया शीश पर हो
              तो चरणों में लक्ष्मी का वास होता है..!!


 " धन्य हो ! धन्य हो ! महाराज धन्य हो !! भारत में भी न कैसे कैसे गुरु एवं
    उनके शिष्यभी कैसे कैसे  'थे', यथाक्रम कलयुग को तो आना ही था..!!


राजू : -- मास्टर जी ! अभी भी वैसे ही मास्टर एवं वैसे ही उनके मिनिस्टर 'हैं'
            अब की बारी कोयलायुग आया है.....


" कल इस प्रश्न के उत्तर को तैयार कल के लाना कि
  "ये मिनिस्टर सदैव पंचों के साथ क्यूँ रहता है.....??"


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