" सुदर्शनम् कमलाकरम् "
" राजू ! परसों हिन्दी एवं उसका व्याकरण पढ़ाया था,
अब इस शीर्षक की कविता के भाव बताओ..??"
राजू : -- मास्टर जी ! यदि माया रूपी शेषनाग की छाया शीश पर हो
तो चरणों में लक्ष्मी का वास होता है..!!
" धन्य हो ! धन्य हो ! महाराज धन्य हो !! भारत में भी न कैसे कैसे गुरु एवं
उनके शिष्यभी कैसे कैसे 'थे', यथाक्रम कलयुग को तो आना ही था..!!
राजू : -- मास्टर जी ! अभी भी वैसे ही मास्टर एवं वैसे ही उनके मिनिस्टर 'हैं'
अब की बारी कोयलायुग आया है.....
" कल इस प्रश्न के उत्तर को तैयार कल के लाना कि
"ये मिनिस्टर सदैव पंचों के साथ क्यूँ रहता है.....??"
" राजू ! परसों हिन्दी एवं उसका व्याकरण पढ़ाया था,
अब इस शीर्षक की कविता के भाव बताओ..??"
राजू : -- मास्टर जी ! यदि माया रूपी शेषनाग की छाया शीश पर हो
तो चरणों में लक्ष्मी का वास होता है..!!
" धन्य हो ! धन्य हो ! महाराज धन्य हो !! भारत में भी न कैसे कैसे गुरु एवं
उनके शिष्यभी कैसे कैसे 'थे', यथाक्रम कलयुग को तो आना ही था..!!
राजू : -- मास्टर जी ! अभी भी वैसे ही मास्टर एवं वैसे ही उनके मिनिस्टर 'हैं'
अब की बारी कोयलायुग आया है.....
" कल इस प्रश्न के उत्तर को तैयार कल के लाना कि
"ये मिनिस्टर सदैव पंचों के साथ क्यूँ रहता है.....??"
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