मंगलवार, 28 अगस्त 2012

----- मिनिस्टर राजू 29 -----

 " राजू कल हमारा कान फ्रेश हो गया "

राजू : -- "मास्टर जी ! मेरा तो प्रेस हो गया"

" हम तो सिंग का शेर सुन रहे थे"

राजू : --" मास्टर जी ! मैं चूहे का भूखा हाथी में सिर धुन रहा था"
             जाने कौन सी नदी में बह रहा था,
             केवल अपनी ही कह रहा था,
             विदेश में पढ़ालिखा हूँ,
             माँ के पेट से सिखा हूँ,
             अब गाँव गाँव जाउंगा,
             गवैयों को सिखाउंगा,
             मैं स्वयं भीख मांगूंगा,
             गवैये को मंगवाउंगा,
             माँ का बहुत दुलारा हूँ,
             43 साल का कुवांरा हूँ
             झोपड़ में घुस खाउंगा,
             भोर हुवे तेरे पानी से बोरिग में नहाऊंगा,

             कोई पूछे भाई पैसा भी भरेगा,
             तेरे भोजन से तो पेट सड़ेगा,

             तू ही चतुर है,
             एक सांस में खांस लेता है,

             गवैयाँ चार चतुर है,
             एक में डेढ़ सांस लेता है 


" हमने तुझे 'निबंध ' लाने को कहा था
  कविता सुनाने को नहीं कहा था"

राजू : -- "मास्टर जी ! वो निबंध तो अभी अपूर्ण है कल पूर्ण कर दिखाउंगा"


   

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