राजू : -- मास्टर जी ! जब भी जनता भ्रष्ट-भ्रष्ट खेलती है
न्यायालय साब्-साब् एवं रूशी-रूशी को बीच में पेलती है
सरकार संरक्ष लेती है
स्वहित निर्णय का पक्ष लेती है
विलंबित न्याय सच्चा नहीं लगता,
सरकार के मुख से 'लोकतंत्र' अच्छा नहीं लगता
लगे जब चुनाव पास हैं,
लो न्याय का नया दंडपाश है
न्यायालय जाने क्या जतलाता है
जाने कौन इसे सोते से उढाता है
'खाना' 'पहनना' 'सोना' सब भुला देगी,
जनता एक दिन न्यायालयों को ही उढा देगी,
" हम्म्म्म तुम्हारा निबंध किधर है??"
राजू : -- मास्टर जी ! स्वतंत्रता पूर्व भारत में अग्रेजों के साथ 'राका'
एवं उनके 'काका' रहते थे अंग्रेज कहते ये हमारा प्रशासन है
राका कहते 'हम तो नहीं मानेंगे'
अंग्रेज कहते 'ये हमारा विधि-विधान है'
राका कहते 'हम तो नहीं मानेंगे'
अंग्रेज कहते 'ये हमारी न्यायिक व्यवस्था है'
राका कहते 'हम तो नहीं मानेगे'
अंग्रेजों ने पूछा 'फिर क्या मानोगे'
राका बोले 'हम तो हमारा वाला मानेंगे'
'एवं हमारा वाला ही मनवाएंगे'
तत पश्चात अंग्रेजों ने उन्हें गोल-गोल घुमाया
एक बारी घुमे, दोबारा घुमे
'तीसरी बारी कहने लगे हम तो नहीं घूमेंगे'
अंग्रेजों ने पुन: पूछा 'तो क्या करोगे??'
कहने लगे ' हम तो हमारे गोल अर्थात संसद में घुमाएंगे'
अंतत: मुर्ख अंग्रेज इन चौव्वन चतुरों के हाथ सत्ता देकर चले गए,
भारत छोड़ने के पश्चात चेते, अरे!! ये संसद, संविधान, नियम,
न्यायालय सब हामारा ही है ये केवल लोकतंत्र के नाम पर भारत
वासियों को गोल-गोल घुमा रहें हैं
स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात दो 'चीजों' का 'फैशन' ही चल गया
एक तो गांधीगिरी एवं दूसरी 'नेहरू कट शेरवानी' भूखे भंडारों के देश
में ऐसा 'फैशन' स्वतंत्रता प्राप्ति के समय भी दर्शनीय था एवं वर्त्तमान
में भी दर्शनीय है"
न्यायालय साब्-साब् एवं रूशी-रूशी को बीच में पेलती है
सरकार संरक्ष लेती है
स्वहित निर्णय का पक्ष लेती है
विलंबित न्याय सच्चा नहीं लगता,
सरकार के मुख से 'लोकतंत्र' अच्छा नहीं लगता
लगे जब चुनाव पास हैं,
लो न्याय का नया दंडपाश है
न्यायालय जाने क्या जतलाता है
जाने कौन इसे सोते से उढाता है
'खाना' 'पहनना' 'सोना' सब भुला देगी,
जनता एक दिन न्यायालयों को ही उढा देगी,
" हम्म्म्म तुम्हारा निबंध किधर है??"
राजू : -- मास्टर जी ! स्वतंत्रता पूर्व भारत में अग्रेजों के साथ 'राका'
एवं उनके 'काका' रहते थे अंग्रेज कहते ये हमारा प्रशासन है
राका कहते 'हम तो नहीं मानेंगे'
अंग्रेज कहते 'ये हमारा विधि-विधान है'
राका कहते 'हम तो नहीं मानेंगे'
अंग्रेज कहते 'ये हमारी न्यायिक व्यवस्था है'
राका कहते 'हम तो नहीं मानेगे'
अंग्रेजों ने पूछा 'फिर क्या मानोगे'
राका बोले 'हम तो हमारा वाला मानेंगे'
'एवं हमारा वाला ही मनवाएंगे'
तत पश्चात अंग्रेजों ने उन्हें गोल-गोल घुमाया
एक बारी घुमे, दोबारा घुमे
'तीसरी बारी कहने लगे हम तो नहीं घूमेंगे'
अंग्रेजों ने पुन: पूछा 'तो क्या करोगे??'
कहने लगे ' हम तो हमारे गोल अर्थात संसद में घुमाएंगे'
अंतत: मुर्ख अंग्रेज इन चौव्वन चतुरों के हाथ सत्ता देकर चले गए,
भारत छोड़ने के पश्चात चेते, अरे!! ये संसद, संविधान, नियम,
न्यायालय सब हामारा ही है ये केवल लोकतंत्र के नाम पर भारत
वासियों को गोल-गोल घुमा रहें हैं
स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात दो 'चीजों' का 'फैशन' ही चल गया
एक तो गांधीगिरी एवं दूसरी 'नेहरू कट शेरवानी' भूखे भंडारों के देश
में ऐसा 'फैशन' स्वतंत्रता प्राप्ति के समय भी दर्शनीय था एवं वर्त्तमान
में भी दर्शनीय है"
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें