गुरुवार, 30 अगस्त 2012

----- मिनिस्टर राजू 31 -----

राजू : -- मास्टर जी ! आज मेरे माता-पिता के मध्य झगड़ा हो गया,


             " तुम्हारी माता का क्या नाम है??"


राजू : -- मास्टर जी ! 'मृत्यु'


             "तथा पिता का??"

राजू : -- आशाराम !! मास्टर जी ! दादा का भी नाम बताऊँ??


             "नहीं उस यमराज का नाम पता है"
              ""एकमुश्त वफ़ा का मुश्ताक हूँ मेरी वफाते-महबूब,
              मुझको गिला भी नहीं तेरी बेवफाई का""

राजू : -- मास्टर जी ! आप मास्टर है की डाक्टर??
             यह तो वैद्य विवरणी अर्थात नुसख़ा अर्थात प्रेस-क्रेप्सन
            जैसा प्रतीत होता है

         
            "राजू ! मैं  न कई डाक्टरों से घिरा हूँ, डाक्टर के घर में रहता हूँ,
             मेरी दूकान में डाक्टर रहता है और भी बहुत प्रकार के डाक्टर हैं
             कभी-कभी मुझे लगता है कि मैं  किसी अस्पताल में भर्ती हूँ
             उन डाक्टरों की पर्चियां ही देख-देख का तुमको सिखाता हूँ " 


बुधवार, 29 अगस्त 2012

----- मिनिस्टर राजू 30 -----

राजू : -- मास्टर जी ! जब भी जनता भ्रष्ट-भ्रष्ट खेलती है
            न्यायालय साब्-साब् एवं रूशी-रूशी को बीच में पेलती है

           सरकार संरक्ष लेती है
           स्वहित निर्णय का पक्ष लेती है

           विलंबित न्याय सच्चा नहीं लगता,
           सरकार के मुख से 'लोकतंत्र' अच्छा नहीं लगता

           लगे जब चुनाव पास हैं,
           लो न्याय का नया दंडपाश है

           न्यायालय जाने क्या जतलाता है
           जाने कौन इसे सोते से उढाता है

           'खाना' 'पहनना' 'सोना' सब भुला देगी,
            जनता एक दिन न्यायालयों को ही उढा देगी,

           " हम्म्म्म तुम्हारा निबंध किधर है??"

राजू : -- मास्टर जी ! स्वतंत्रता  पूर्व भारत में अग्रेजों के साथ  'राका'
            एवं उनके 'काका' रहते थे अंग्रेज कहते ये हमारा प्रशासन है

            राका कहते 'हम तो नहीं मानेंगे'

            अंग्रेज कहते 'ये हमारा विधि-विधान है'
            राका कहते 'हम तो नहीं मानेंगे'

            अंग्रेज कहते 'ये हमारी न्यायिक व्यवस्था है'
            राका कहते 'हम तो नहीं मानेगे'

            अंग्रेजों ने पूछा 'फिर क्या मानोगे'
            राका बोले 'हम तो हमारा वाला मानेंगे'
            'एवं हमारा वाला ही मनवाएंगे'

            तत  पश्चात अंग्रेजों ने उन्हें गोल-गोल घुमाया
            एक बारी घुमे, दोबारा घुमे
            'तीसरी बारी कहने लगे हम तो नहीं घूमेंगे' 

            अंग्रेजों ने पुन: पूछा 'तो क्या करोगे??'
            कहने लगे ' हम तो हमारे गोल अर्थात संसद में घुमाएंगे'

            अंतत: मुर्ख अंग्रेज इन चौव्वन चतुरों के हाथ सत्ता देकर चले गए,
            भारत  छोड़ने  के  पश्चात  चेते,  अरे!! ये संसद, संविधान, नियम,
            न्यायालय सब हामारा ही है ये  केवल लोकतंत्र के नाम पर भारत
            वासियों को गोल-गोल घुमा रहें हैं         

            स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात दो 'चीजों' का 'फैशन' ही चल गया
            एक तो गांधीगिरी एवं दूसरी 'नेहरू कट शेरवानी' भूखे भंडारों के देश
            में ऐसा 'फैशन' स्वतंत्रता प्राप्ति के समय भी दर्शनीय था एवं वर्त्तमान
            में भी दर्शनीय है" 


     

मंगलवार, 28 अगस्त 2012

----- मिनिस्टर राजू 29 -----

 " राजू कल हमारा कान फ्रेश हो गया "

राजू : -- "मास्टर जी ! मेरा तो प्रेस हो गया"

" हम तो सिंग का शेर सुन रहे थे"

राजू : --" मास्टर जी ! मैं चूहे का भूखा हाथी में सिर धुन रहा था"
             जाने कौन सी नदी में बह रहा था,
             केवल अपनी ही कह रहा था,
             विदेश में पढ़ालिखा हूँ,
             माँ के पेट से सिखा हूँ,
             अब गाँव गाँव जाउंगा,
             गवैयों को सिखाउंगा,
             मैं स्वयं भीख मांगूंगा,
             गवैये को मंगवाउंगा,
             माँ का बहुत दुलारा हूँ,
             43 साल का कुवांरा हूँ
             झोपड़ में घुस खाउंगा,
             भोर हुवे तेरे पानी से बोरिग में नहाऊंगा,

             कोई पूछे भाई पैसा भी भरेगा,
             तेरे भोजन से तो पेट सड़ेगा,

             तू ही चतुर है,
             एक सांस में खांस लेता है,

             गवैयाँ चार चतुर है,
             एक में डेढ़ सांस लेता है 


" हमने तुझे 'निबंध ' लाने को कहा था
  कविता सुनाने को नहीं कहा था"

राजू : -- "मास्टर जी ! वो निबंध तो अभी अपूर्ण है कल पूर्ण कर दिखाउंगा"


   

रविवार, 26 अगस्त 2012

----- मिनिस्टर राजू 28 -----

राजू : -- मास्टर जी ! चाटुकार कैसे बनते हैं..??


           " राजनेता" बनकर..!!


राजू : -- मास्टर जी ! 'राजनेता' कैसे बनते हैं..??


           "दूरदर्शन पर दिखा रहें हैं ना वैसे..!!"


राजू : -- मास्टर जी ! विद्यमान "राजनेता' ऐसे ही बने थे..??


           "हाँ..,"


राजू : -- अर्थात पहले विधि, नियम, निति आदि का  उल्लंघन करो
            तत्पश्चात संसद में विराज कर नए नए नियम के निर्माता
            बनो, ये कैसा लोकतंत्र है मास्टर जी..??

     
           "वर्तमान  भारत में ऐसा ही लोकतंत्र है, तुम नया  वाला  लाना ठीक
            तथा कल 'भारत-स्वतंत्रता पूर्व एवं पश्चात' के विषय पर व्यंगात्मक
            शैली में निबंध लिखकर लाना..!!"


राजू : -- जी मास्टर जी ! किन्तु निबंध का वर्णन मौखिक होगा अथव श्याम
            पट पर होगा..??

            " यह कल ही सूचित किया जाएगा..!!"     

शनिवार, 25 अगस्त 2012

----- मिनिस्टर राजू 27 -----

राजू : -- मास्टर जी !  क्या भारत में हर कोई बिकाऊ है..??


          " क्यों..? अर्थात कैसे..?"

राजू : -- मास्टर जी ! वो ऐसे कि कल कोई पूछ रहा था,
            "कान फ्रैश करके प्रेस" करने का क्या लोगे..,


          " राजू ! राजू !! राजू !!! भारत में एक यही तो निशुल्क है
            बाकी सब का शुल्क है यहाँ तक की यहाँ सलाह के भी..,


राजू : -- पैसे लगते हैं, है न मास्टर जी !!.....


          

शुक्रवार, 24 अगस्त 2012

----- मिनिस्टर राजू 26 -----

" चल  चाल चल चाटुकार, चौव्वन चतुर होय..,
  न्यायकिरण कि  नवकरण, कारा कारा धोय....."  

तत पश्चात कहें हाय ! हाय !! प्रेस करे कोय.....

----- मिनिस्टर राजू 25 -----

" राजू ! तुम बढ़े होकर क्या बनोगे..? चित्रकार अथवा मूर्तिकार..??


राजू : -- मास्टर जी ! चाटुकार..!!!!!


" क्यों बनोगे..?"

राजू : -- मास्टर जी ! क्योंकि  चाटुकार  बनने  भर  से राष्ट्रपति एवं प्रधानमन्त्री
            बन सकते हैं, तत्पश्चात कुछ और बनने की आवश्यकता ही नहीं होगी....." 

गुरुवार, 23 अगस्त 2012

----- मिनिस्टर राजू 24 -----

राजू : -- मास्टर जी ! अर्ज किया है : --
                                                    " मजहब से मेरे क्या तुझे तेरी दयार और..,
                                                      मैं और मेरा यार और मेरा कारोबार और....."
                                                                  ----- || मीर तकी मीर ।। -----


            मास्टर जी ! एक और ..............मेरी सरकार भी और..,


          " मिनिस्टर जी ! एक बार और..,"


राजू : -- मास्टर जी ! कौन सा वाला..? कान वाला या काला वाला..?


           " कान के निचे वाला....."

                            

सोमवार, 20 अगस्त 2012

----- मिनिस्टर राजू 23 -----

राजू : -- मास्टर जी ! कल आप क्यों नहीं आये थे ..??


           " कल मेरी दोस्ती को बुखार था..,"


राजू : -- मास्टर जी ! किन्तु आपके दोस्त तो भेषज हैं..,


           " वो चाँद देख रहा था..,"

राजू : -- मास्टर जी ! किन्तु ईद तो आज है..,


         " कल वो क़तार में खड़ा था..,"

राजू : -- मास्टर जी ! क़तार  में खड़े होने से चाँद दीखता है..,

           " हाँ ! ऐसा उसके पड़ोसी कहते है..,"

राजू : -- मास्टर जी ! उस पड़ोसी के पड़ोसी क्या कहते हैं..,

            " वो केवल लिखते है एवं साक्षात्कार के समय मौन रहते हैं..,"

राजू : -- मास्टर जी ! समझ गया मैं मिनिस्टर राजू हूँ मास्टर तो आप ही हैं.....
                

शनिवार, 18 अगस्त 2012

----- MINISTER RAAJU 22 -----

राजू : -- मास्टर जी ! अखिलभारत में झंडा फहर गया ये गव सम्पूर्ण विश्व में फहराएगी क्या..?



          राजू ! तुझे क्यों कष्ट हो रहा है कितना सुन्दर तो गा रही है
                   बिलकुल कोयल के जैसे


राजू: -- मास्टर जी ! कोयला खाके कोयल जैसे ही गाएगी न


          राजू ! तेरे मुखढ़े पर ये मुख किसने लगाया...लगाया तो लगाया
                   इस पर किसको बैढाया.. तेरी ये वाणी है या वीणा.....


राजू : -- मास्टर जी ! आप तो वेणुर्धर गोपाल हो..,

         
          तू स्वयं को अंग्रेज समझता है किन्तु तू है नहीं ये बता तू क्या है.....


राजू : -- मास्टर जी ! में बहिर्गमन करता हूँ और भास बनता हूँ.....


    

शुक्रवार, 17 अगस्त 2012

----- || MINISTER RAAJU 21 || -----

राजू : --           नयन नयन नायिका नायक नय नय नयन ।
                       नैन नदी निंद नींद नायिका नौ ननंद ।।
                       न..... न.... नायका नद नद नदन ।।
                       मास्टर जी ! इन दोनों में कौन उत्तम है..?


                      राजू ! दूसरा वाला.....   

बुधवार, 15 अगस्त 2012

----- MINISTER RAAJU 20 -----

राजू : -- मास्टर जी !  ये गव तो तबला ले के बैढ गई लो अब ग़जल सुनाएगी
             स्थापित ही कर दिया क्या..,


            तू मत सुन किन्तु प्रभु इसकी सुनता है..,


राजू : -- कैसे मास्टर जी ..?


            इक बारी इसने प्रभु से कहा प्रभु.... यज्ञ करवाना है  समस्या यह है कि
            गठजोड़  तो है किन्तु जोड़  नहीं है.., प्रभु बोले भक्त जोड़ तो मेरे पास भी
            नहीं है किन्तु इस जोड़ का तोड़ है.., तोड़ है .. जै बाबा नारद
                                            एक दिवस पुन: निवेदन किया प्रभु:.... भागवत
           करवानी है गठजोड़ तो है किन्तु जोड़ नहीं है भंडारा कैसे करूँ.....
           प्रभु ने पुन: सुमिरन किया..... जै बाबा नारद..... लो भागवत हो गई..,


राजू : -- मास्टर जी ! अपनी गवर्नमेंट की भी यही अवस्था है
             गठजोड़ तो है किन्तु जोड़ नहीं है और मास्टर जी !
             इनका तो प्रभु भी नहीं है.....
                                       
           

मंगलवार, 14 अगस्त 2012

----- MINISTER RAAJU 19 -----

              राजू ! गव एवं गवर्नमेन्ट में क्या अंतर है..?


राजू : -- मास्टर जी !! केवल मात्र   ऐ   का अंतर है..!!

               
            स्पष्ट करो कि कैसे..?


राजू : -- एक घाट घाट घंटी बजाती है तथा दूसरी घाटे घाटे घंटी बजाती है
             स्वयं किसी की सुनती नहीं अपनी सुनाते रहती है और मास्टर जी !!
             संध्या को तो बजाती ही है प्रभात को पुन: प्रसारण करती है..!!


           तू क्या करता है..?


राजू : -- मास्टर जी !! मैं केवल मात्र अध्ययन करता हूँ..,


            किसका..? विषय विकार का अथवा विषय विशेष का..?


राजू : -- भारत माता का....!!

रविवार, 12 अगस्त 2012

----- MINISTER RAAJU 18 -----

राजू : -- मास्टर जी ! यदि रामायण भागवत पूर्ण हो गई हो तो अपनी गाय
             को शान्ति निकेतन प्रस्थान करवाएंगे अथवा यहीं घाट पर ही घंटियाँ बजवायेंगे

            'सर्वप्रथम यह स्पष्ट कर कि तू घाट पर किस प्रयोजन उपस्थित है,
             भागवत श्रवण कर रहा है या रासलीलाओं के दर्शन कर रहा है..,


राजू : -- मास्टर जी ! दिखाई मुझे देता नहीं, सुनता मैं हूँ नहीं,
             जो कहता हूँ वो सुनाई नहीं देता..,

           
             कुछ दिखाई दे न दे तुझे  रासलीलाएं अवश्य दृष्टिगत होती है..,

         
राजू : -- मास्टर जी ! प्रतीत होता है आप गाय को झंडा फहरा कर ही प्रस्थान करवाएंगे.....    

गुरुवार, 9 अगस्त 2012

----- MINISTER RAAJU 17 -----

राजू : -- मास्टर जी ! मास्टर जी !! मेरे दोस्त मुझे न धर्म निरपेक्ष
            कह कर पुकारते है..,


            किन्तु तेरा नाम  तो मोहन है..?( राजू घर का नाम है )

राजू : -- मास्टर जी ! उसके ऊपर सिंग भी तो है,
            तथा में कोई करम नहीं करता इस लिए मेरे नाम के निचे
            दोस्तों ने सब मिटा कर मेक भी लगा दिया अर्थात
            मेक मोहन सिंग..,


            अर्थात माइक मोहन सिंग क्योंकि तू कुछ सुनता ही नहीं,
            बोलता है वो सुनाई नहीं देता, दिखता  तुझे है नही श्रवण
            यन्त्र की सर्वाधिक आवश्यकता तुझे है,
            अरे हाँ ! तेरे आगे पीछे राहू केतु भी लगे हैं एवं तू कर्क-
            मकर रेखा के सह सदैव पंचसितारों में विराजमान रहता
            है, तू धर्म-निरपेक्ष कहाँ हुवा तू तो देह-निरपेक्ष हुवा.....                  
   
           

बुधवार, 8 अगस्त 2012

----- MINISTER RAAJU 16 -----

'' राजू ! ये क्या कर रहे हो..?? '

राजू : -- मास्टर जी ! गाय को चीरा लगा रहा हूँ ..

 ' राजू ! तुम्हे चारा खिलाने को कहा था चीरा लगाने को नहीं कितनी बार
   तुम्हे कहा है की भेषज मत बना करो तुम भास ही उत्तम हो,
   राजू ! ये तुम्हारे भेस को क्या हुवा-----
                                            उदर अन्दर दत भंजक भुजा । मुख मंडल सुजन दिरिस दूजा ।।
                                            छीन भीन भय विगलित भेसा । भीन  भीन  केश ऋषि केसा ।।

   वत्स ! तुम्हारा तन वीभत्स काव्य कीर्तन कर रहा है,
   कहो बालक इस घट के औघट कौन घटना घटी..,

राजू : -- मास्टर जी ! दुर्घटना घटी चूँकि सावधानी हटी,
            कल एक भद्र महिला को मां-बहन कह दिया था
            एवं मेरी विषम वाणी का प्रसारण दूरदर्शन पर हो गया..

राजू ! यह अति उत्तम हुवा की तुम्हारी वाणी परकटी के सह स्पष्ट नहीं हुई
अन्यथा तुम्हारी वाणी का प्रसारण सीधे आकाश पर होता.....    
          

मंगलवार, 7 अगस्त 2012

----- || MINISTER RAAJU 15 || -----

राजू : -- मास्टर जी ! आपने अपनी गाय को एक महीने में सोते से जगाया,
            अब पुरे एक महीने उसे  स्नान करवाएंगे  तनिक ये तो  बताइये ये
            गाय दूध कब देगी..


           '' राजू! राजू!!गाय सर्वप्रथम गाभिन होती है तत्पश्चात बछ्छे-बछिया
              देती है उसके पश्चात दूध देती है..

राजू : --  मास्टर जी ! आपकी  योजना  का  योजन  भी पंचवर्षीय कार्यक्रम के
             सदृश्य प्रतीत होता है अर्थात कब नौ मन तेल होगा और कब राधा नाचेगी..


            ' अर्थात गाँव तो बसा नहीं माँगने वाले पहले ही आ गए,
              अभी जाओ बाद में आना
              एवं गाय जब तक दूध नहीं देती तब तक तुम गुना भाग करके आकलन
              करते रहो ये दूध कब देगी कितना देगी सूत्र है ------जितना चारा = उतना दूध.....   

शनिवार, 4 अगस्त 2012

----- || MINISTER RAAJU 14 || -----

राजू :-- मास्टर जी ! यदि मेरे पास दुर्लभ वाहन, 100-50 लाख मुद्रा, दो वर्ष के दंड के सह
            दो वर्ष का सामाजिक कार्यक्रम हो तो क्या मै किसी को भी कुचल सकता हूँ..??

           " अरे राजू ! इतने में तो तुम भवनपति से लेकर त्रिभुवनपति तक  को कुचल
             सकते हो..'
                           इतने दुर्लभ विस्फोटक पता नहीं कोई कैसे वहन  करता है, तुम्हारा
             वाला उपाय सस्ता सरल सुलभ एवं अपेक्षाकृत कहीं अधिक सुरक्षित है..!!


राजू :-- मास्टर जी! किन्तु भवन एवं त्रिभुवनपति के अंगरक्षक..!!


           " राजू ! राजू !! राजू !!! लगता है इतिहास विषय में तुम्हारा ध्यान कम है,
             जैसे भवन-त्रिभुवनपति होंगे वैसे ही उनके अंगरक्षक होंगे..!!


राजू :-- मास्टर जी ! आप कितना अच्छा पडाते हो..??


           " राजू मैं कहाँ अच्छा पढ़ाता  हूँ अच्छा तो वो पढ़ाते हैं जिन्होंने अंग्रजी में पढ़के
             अंग्रेजों को ही पढ़ा दिया.....          

----- MINISTER RAAJU 13 -----

राजू :-- मास्टर जी सर्वप्रथम 'गोरे अंग्रेज' तत्पश्चात 'काले अंग्रेज' आये
            अब कौन से रंग के अंग्रेज आयेंगे..??

           " राजू ! तुम्हें हपी नाला वाला वर्नसूत्र सिखाया था,
             उसी में से कोई एक आयेंगे..,

राजू :-- मास्टर जी ! रंग-बिरंगी फिरंगी कब आयेंगे..??

            " राजू ! यदि जीवित रहे तो इसके पश्चात आयेंगे.....      

----- ॥ दोहा-दशम 363॥ -----,

सभा सदस बैठे रचे आपहि नेम विधान  तोड़ करे पुनि आपही न्याय का अवमान ॥१||  :-- देश के सांसद स्वयं नियम विधानों की रचना करते हैं तत्पश्चात स्वय...