शनिवार, 2 अगस्त 2025

----- ॥ दोहा-दशम 363॥ -----,

सभा सदस बैठे रचे आपहि नेम विधान 

तोड़ करे पुनि आपही न्याय का अवमान ॥१|| 

:-- देश के सांसद स्वयं नियम विधानों की रचना करते हैं तत्पश्चात स्वयं उनका उल्लंघन करते हैं और देश के जन साधारण से उनके पालन की अपेक्षा करते हैं......

सभागार बैठे रचे थाप बिधेय विधान ।
जन मानस मनाए तिन्ह आप चले मन मान॥२|| 
:-- संसद में सांसदों ने विधि के विधायनों की थप्पियाँ लगा दी है वह जन मानस से उनके अनुशरण की अपेक्षा कर स्वयं स्वेच्छानुसार आचरण करते है.....

पुरबल बिधि बिधान रचित राखे ऊँच मचान l
सभा सदस बैठे करे नवल नवल निर्मान ll३|| 
:-- पूर्व में रचे विधि विधेयक रचित हुवे ऊंचे गृहमंचों पर रखे धूलधूसरित हो रहे हैं सांसद महोदय संसद में बैठे पुनः नए नए विधान की रचना हेतु आतुर हो रहे हैं......

"अनपेक्षित नियम विधान का निर्माण जन मानस के धन व समय का अपव्यय है.....
"अपेक्षित नियम विधानों के निर्माण की उपेक्षा सभा सदनों को औचित्यहीन करती है.....

स्वहित साधन हुँति करे सत्ता जब षड़यंत्र ।
तहाँ भरोसा तोड़ता जन गण का यह तंत्र ॥४|| 
:-- स्वहित साधने हेतु जब सत्ता षडयंत्र करने लगती लोकतांत्रिक गणराज्य के प्रति विश्वास पर जनमानस को संदेह होने लगता है...

राज करके अँग्रेज अब गए भारत को जान ।
याकी लोक समृद्धि को देवें आदर मान ॥५|| 
:-- भारत पर शासन कर अंग्रेजों ने भारत वर्ष को पहचान लिया है अब वह इसकी लोक समृद्धि का आदर सम्मान करने लगे है .....
:-- भारतं शासनं कृत्वा आङ्ग्लाः भारतं ज्ञातवन्तः अधुना तस्य समृद्धेः आदरं कर्तुं आरब्धाः।

सीवाँ के सैनी अजहुँ चुपे चाप गए बैठ ।
एहि दरसाए देस भीत नहीं घूस की पैठ॥६|| 
:- - सीमा पर सैनिकों द्वारा मौन का अवलंबन यह दर्शाता है कि अब देश में घूसपैठ नहीं हो रही है.....
:-- यदि घुसपैठ निर्बाध रूप से हो रही है तो सैनिकों का मौनावलंबन क्यूँ है.....?

दोष पराए देस का ताकु ग्रंथ अनुहार l 
कही सके तहँ जाए को सुधिजन कहो विचार ll७|| 
:-- पराए देशों के दोषों को उनके धार्मिक ग्रंथों का उदाहरण देकर उन्हीं के देश में कहने का साहस है ? सुबुद्ध सुज्ञानि जन यह विचार कर कहें... ..
:-- जगत डैडी को कहिए जाकर :-- आपका भगवान कीलों में क्यूँ लटका हुआ है ये कौन सा वाद है..... मनुवाद है या अमनुवाद... .. ?एक आध परमाणु पूछने वाले के सिर में अवश्य फूट जाएगा... ..

देस धर्म सद्ग्रंथ की करतब फिरे बुराए ।
सासन हर को चाहिये ताको अबरोधाएँ॥८|| 
:-- हमारे देश में प्रादुर्भूत धर्म व उसके सद्ग्रथों की हमारे अपने ही देश में निंदा करते फिर रहें लोगों के ऐसे निंदनिय कृत्य को शासन कर्त्ताओं द्वारा तत्काल प्रतिबंधित करना चाहिए.....

भारत तिन्हनि कारिआ बड़ा पाल कर पोस ।
देय स्वारथ आपने धर्म ग्रंथ को दोष ॥९|| 
:-- वस्तुतः भारत ने ऐसे लोगों को पाल पोश कर बड़ा किया है जो अपना हित साधने हेतु भारत के धर्म ग्रंथों की निंदाभारत में ही करते फिर रहे हैं......
होत सक्ति ते सामरथ करे नहीं उपयोग । 
हे भारत तव लोग सो नहीं सिंहासन जोग ॥१०|| 
:-- शक्ति सामर्थ्य होते हुवे भी उसका उपयोग न करते हों तब हे भारत वह सत्ता सूत्र धारी तुम्हारे सिंहासन के योग्य नहीं है.....

देस धर्म निज छाँड़ जो, करत फिरत पाखंड ।
सासन हर दैं ताहि को कठोर बिधि कर दंड ॥११|| 
:--अपने देश के प्रादुर्भूत धर्म का त्यागकर जो धर्म का पाखंड करतेहुवे दूसरों के धर्मग्रंथों की निंदा करने में संलग्न है शासनकर्त्ता को ऐसे पाखंडियों हेतु विधेय रचितकर कठोरतम दंड केप्रावधान करना चाहिए

सीवाँ के सैनी अजहुँ चुपे चाप गए बैठ। 
एहि दरसाए देस भीत नहीं घूस की पैठ॥१२|| 
:- - सीमा पर सैनिकों द्वारा मौन का अवलंबन यह दर्शाता है कि अब देश में घूसपैठ नहीं हो रही है.....:-- यदि घुसपैठ निर्बाध रूप से हो रही है तो सैनिकों का मौनावलंबन क्यूँ है.....?












शुक्रवार, 11 जुलाई 2025

----- ॥ दोहा-दशम ३६२ ॥ -----,

>> स्वतंत्रता किसे कहते हैं.....?
--------किसी राष्ट्र की सम्प्रभुता के स्वत्व पर उसके मूलभूत का अधिकार स्वाधिनता है------ 

 मूलभूत को प्रभुत्व के स्वत्व का अधिकार | 
  राष्ट्र की स्वतंत्रता करो तब स्वीकार ||१|| 
: -- राष्ट्र की प्रभुसत्ता के सत्व पर जब मूल भूत का अधिकार हो स्वतंत्रता तभी स्वीकार्य हो 
  इस्लाम भारत का मूलभूत नहीं है तथापि उसे उसकी संप्रभुता के स्वत्व का अधिकार प्राप्त है . . . . .
  • एक निश्चित भूखंड के लिए 'राष्ट्र' ( नेशन ) एवं वहां के वासियों हेतु 'जन' (प्यूपिल)शब्द का प्रयोग सर्वप्रथम वैदिक काल में किया गया था..... ( ये अंग्रेजों और कांग्रेस के इतिहास में लिखा है ) यह इतिहास सिद्ध करता है कि सनातन भारत के मूल में है......
बंगाल पर हिंदुओं परअत्याचार की घटनाए सत्ताधारियों के साहसिक निर्णयों की क्षमता के अभाव को प्रदर्शित करती हैं हम भारत वंशियों ने आपातकाल का केवल दुरूपयोग होते ही देखा है


धर्म हेतु को देस है,देस हेतु सँविधान | 
मानुज के नियमन हेतु सकल नेम निरमान ||२|| 
: -- कोई राष्ट्र धर्म के हेतु है जहाँ धर्म है वहां राष्ट्र है कोई संविधान राष्ट्र के लिए है जहाँ राष्ट्र है वहां संविधान है समस्त नियमों का निर्माण मनुष्य के लिए हैं जहाँ मनुष्य है वहां नियम है |  

अर्थात : -- किसी राष्ट्र का अस्तित्व धर्म से है जहाँ धर्म नहीं था उन राष्ट्रों का अस्तित्व अस्त हो गया विश्व में सनातन काल से भारत का अस्तित्व उदय मान है कारण कि यहाँ धर्म  सनातन काल से स्थापित है..... 

धर्म हेतु को देस है,देस हेतु सँविधान | 
मानुज के नियमन हेतु सकल नेम निरमान ||३ ||  
: -- कोई राष्ट्र धर्म के हेतु है जहाँ धर्म है वहां राष्ट्र है कोई संविधान राष्ट्र के लिए है जहाँ राष्ट्र है वहां संविधान है समस्त नियमों का निर्माण मनुष्य के लिए हैं जहाँ मनुष्य है वहां नियम है |  

देस बड़ा सँविधान से बड़ा देस से धर्म | 
जन जन के नियमन हेतु सकल नियम निरमान ||४ || 
:-- संविधान से राष्ट्र सर्वोपरि होता है राष्ट्र से धर्म सर्वोपरि होता है समस्त नियमों का निर्माण राष्ट्र जनों पर  नियंत्रण और अनुशासन हेतु किया जाता है उसपर शासन हेतु नही.....  

यदि कोई जनसंचालन तंत्र तत्संबधित राष्ट्र की सम्प्रभुता अक्षुण्ण रखने में असमर्थ हो तब उक्त राष्ट्र के मूलभूत को ऐसे तंत्र के विकल्प का विचार करना चाहिए....

नर नारी का सौहृदय पश्चिम हुँत अधुनात | 
भारत देस निबास यह तत्त्व परम पुरात ||५ 
:--स्त्री पुरुष की मैत्री पश्चिम देश के लिए आधुनिकता है भारत वंशियों में यह मैत्री परम पुरातात्त्विक स्वरूप में उपस्थित है.....

मंदिर मंदिर बिराजे राधिका घन स्याम | 
दोउ सनेह की मूर्ति दोउ कृपा के धाम ||६|| 
: - मंदिर मंदिर में राधिका और घन श्याम दोनों मैत्रीय स्नेह व्की कृपा के धाम स्वरूप में विराजित हैं | 

यह जवाहर नेहरू की बुद्धि का था विकार | 
नरनारी की मैत्रिता आधुनिक है विचार ||७|| 
: - वस्तुत: यह जवाहर लाल नेहरू की बुद्धि का एक विकार था कि स्त्री पुरुष की मित्रता एक आधुनिक विचार है 

होता गया ऐसा इस विचार का परिणाम | 
नहीं अब इसके वंश का प्रयागराज में नाम ||८||  
: - इस विचार का फिर ऐसा परिणाम होता गया कि अब प्रयागराज में उसके वंश का नाम तक नहीं है 

फिर दूर इस वंशज से हुए राम घनश्याम | 
अब इस वंशज का धर्म है ईसाई इस्लाम ||९||  
: - फिर शनै: शनै: इस वंशज से राम कृष्ण की संस्कृति दूर होती चली गई वर्तमान में इसके वंशजों का धर्म या तो ईसाई है या इस्लाम है 
 
सारांश में भारत में स्त्री पुरुष की मित्रता एक पुरातात्त्विक विचार है पश्चिम देशों के लिए यह आधुनिक है स्त्री पुरुष की मित्रता को आधुनिक विचार कहने वाले नेहरू की विचार धारा के लोग हैं जिसके परिणाम में हमें इसके वंशज स्पष्ट दृष्टिगत हो रहे हैं  

भाषा संस्कृति से है भारत देस समृद्ध | 
विचारों की संकुलता से पश्चिम है दारिद्र ||१०||  
भाषा व् संस्कृति से भारत एक समृद्ध देश है विचारों की परिपूर्णता से पश्चिमी देश अभी दरिद्र है 



गुरुवार, 26 जून 2025

----- मिनिस्टर राजू 189 -----,

 '' राजू और मास्टर''

पता है राजू अब ये अंग्रेज के बच्चे भी आर्यों के आगमन की फैली भ्रांतियों जैसी भ्रांतियां फैलाकर दुनिया भर में क्या कहते फिरते हैं..... ?

राजू : -- क्या कहते फिरते हैं मास्टर जी.....?

" हम भारत से आए थे"

राजू : -- हाँ मास्टर जी ! अब हम लोंग को भी श्रीमान, श्रीमान नहीं बोलना चाहिए । अन्यथा ये कल को कह देंगे ये तो अंदमान निकोबार से आए थे और कारोबार करते थे.....

बुधवार, 15 मई 2019

---- ॥ दोहा-दशम ३६१ ॥ -----,

गइ उद्यमहि नीति असि लेखे | खैंचि गईं  दारिद नीच रेखे ||
दरिद्र धनी बिच खंदत खाई | चार बरन कहुँ बहुरि रचाई ||
उद्योग नीति ही ऐसी निश्चित की गई थी कि उसइ पार्श्व प्रभाव से देश में दरिद्रता की रेखा खींचती चली गई | इस रेखा ने दरिद्र व् धनाढ्यों के मध्य खाई खोद दी और देश पुनश्च चार वर्ग में विभाजित हो गया | 

जाति अपर गह अर्थ अधारा | पुर्बल केर दोषु अनुहारा ||
 दारिद परसत धनि अन्हावै | राज सदन परबेस न पावै |
यह वर्गीकरण जातियता से अन्यथा आर्थिक आधार  आधारित था  पूर्व के वर्गीकरण में व्याप्त दोषों का अनुशरण किया | अब दरिद्र के स्पर्श करने से धनि स्नान करने लगे लोकतंत्र के भवन में उसका प्रवेश निषिद्ध कर दिया गया | 

दीन दसा रु मलिन बसबासा | दास बिरति सहुँ कवन बिकासा ||
अगन तैल बिनु दीप अधारे | कहु कतहुँ कहुँ होत उजियारा ||
जिसकी दशा दयनीय हो जिसका निवास मलिन हो ऐसी दासवृत्ति से भला किसकी उन्नति हुई है | अग्नि व् सार से रहित दीपक से भी क्या कहीं उजाला होता है | 

अर्थ प्रधान कियौ जब  तंत्रा  | कर्म कार भयऊ कल जंत्रा | 
कीन्हेसि सो लूटि हथौड़े |  हाथ अतीक काज बहु थोड़े || 
जनसंचालन तंत्र में अर्थ की प्रधानता को अंगीकार करने का परिणाम यह हुवा कि अब कल यंत्रों ने श्रमिकों का स्थान ग्रहण कर लिया | इस स्थानापन्न ने श्रमकों के हाथों से हथोड़े छीन कर उनकी आजीविका न्यून कर दिया अब हाथ अधिक थे और काम किंचित थे | 

कर्मकार कहुँ काम बिनु कियो धनिक के दास |
धरिआ खंदत खेह खन  दियो बाका नाउ बिकास ||
श्रमिकों को आजीविका विहीन कर  उन्हें धनिकों का बंधुआ बनाया गया और खेतों तथा खनिज खण्डों के  उत्खादन को विकास नाम दिया गया | 

बसनासन बासन बिनु बासिहि | देस प्रधान भासनहि भासिहि ||
बैस आपु अति ऊँच पदासन | नीच हुँत बुहा ढाई अँसुअन ||
निवासी भोजन वस्त्र व् आवास से वंचित हो चले प्रधानमंत्री भाषण में ही समस्त समस्याओं का निवारण कर दिया करते |  स्वयं ऊँचे पद पर प्रतिष्ठित होकर नीच की निचाई हेतु घड़ियाल के आंसू बहाते | 

जनसेबक सों भएउ  भुआला | रँगे चोंच बक चलै मराला ||
रचत नेम नै धरम बिरोधी | कहि आपुनो परम परबोधी ||
जन सेवा के संकल्प से सत्ता  प्राप्त की और सेवा तिरोहित कर वह राजा बनकर राज करने लगे |  स्वभाव बगुले का स्वभाव किए  हंस की सी चाल चलते | धर्म विरोधी नियम रचते और स्वयं को धर्म का प्रकांड 'पंडित' कहते | 

रीति परथा बात सबु बीती | कहत बिरथा पुरातन रीती ||
अपुनी सबहि कहए अधुनाई | भलि अलप अति गहै बुराई ||
 हुवे भारत के सांस्कृतिक समृद्धि की प्रतिक पुरानी रीतियों, प्रथाओं, परिपाटियों व् ज्ञान परक वचनों को व्यर्थ कहते |अपनी सभी रीतियों व् प्रथाओं को आधुनिक कहते जिनमें भलमनसाई अत्यल्प व् बुराई अत्यधिक थी |

दया धर्म बिरोधी अस भयऊ सत्तासीन  | 
अगजग सो पथ चालिआ जो पथ पहुँच विहीन || १० ||
भावार्थ : -  इस प्रकार दया और धर्म का विरोध करने वाले सत्ता पर आसीन हो गए हैं, इनका अनुशरण करते हुवे अब लोग उस पथ पर चल पड़े हैं जो पथ कहीं नहीं जाता | 

पुनि जान कहँ चरन चले छूटत  साँचे पंथ  |
सत्धर्म दूरत पाछे बिलुपित गै सद ग्रन्थ ||
फिर देस के चरण जाने किस ओर चल पड़े सभी सन्मार्ग छूट गए , सद्धर्म से दूर होते इस देश से सद्ग्रन्थ भी पीछे कहीं ओझल होते चले गए | 

टूटत आपुनि साखि सौं बिहुरत अपना मूर |
पाछे न बहुर सकै गै निकसत ऐतक दूर ||
अपनी शाखाओं से टूटे अपनी मौलिकता से से पृथक हुवे वह चरण इतनी दूर निकल गए कि जहाँ से पीछे अपनी जड़ों की ओर लौटना संभव नहीं था | 

पंडित जी तो चलै गए रह गइ वाकी रीत |
रही नहि मरयाद अजहुँ रही न प्रीत प्रतीत ||
पंडित जी तो दिवंगत हो गए किन्तु उनकी रीति यहीं रह गई | इस रीति  का अनुशरण करते हुवे अब देश में कहीं मर्यादा रही न प्रेम और विश्वास ही रहा | 

रही पवन नहि पावनी रहे न निर्मल नीर |
पंडत के उद्जोग गए मलिन करत सबु तीर ||
अब पवन पावन न होकर दूषित हो गई जल निर्मल होकर मलीन हो गया पंडत के उद्योग सभी तटों को दोषसे परिपूर्ण करते गए | 


भास् पराई बोलते भरे परायो भेस |
रहे न लोग सो लोग न रहे देस सो देस ||
पराई भाषा भाषते पराई विभूषा आभरित करते अब लोग वैसे लोग नहीं रहे देश वैसा देश नहीं रहा जैसा वह हुवा करता था  | 

बैसे अजाति बाद अधुनै ऊँची पीठ अस  |
सुभाउ ते मनुजाद दीन धर्म निरपेख जौ || ||
भावार्थ : - विद्यमान समय में गणमान्य, धनाढ्य, लब्धप्रतिष्ठित, व् उच्च पद पर अजाति वाद विराजित हो गया है यह वर्ग संकरता ( हाइब्रिड) जनित दुर्गुणों से युक्त है |  दुर्दशाग्रस्त विश्व, देश व् समाज से खिन्न व् दया दान तप व् सत्य से उदासीन होते हुवे जो कीट भक्षी, तमचूर भक्षी, गोभक्षी, भ्रूणभक्षी, नरभक्षी स्वरूप मनुष्य को मारकर खाने वाले आसुरी स्वभाव का है || 

पंडत जी कहुँ जुग बिरताओ | पाए कछुक बहु गयउ गवायों ||

तासु बिगत अस भयो गगन गत | गहि धुर धुर अरु कछु नहि बिलखत ||
पंडत जी के काल का समापन हुवा  इस समाप्ति से देश ने जो खोया वह अत्यधिक था और जो प्राप्त किया वह अत्यल्प था | पंडित जी के दिवंगत होने से गगन धूल से व्याप्त होकर जैसे दुर्दशा को प्राप्त हो चला था और नेत्रों को कुछ भी दर्शित नहीं हो रहा था | 

दिगंत दिरिस दरस अस होई | धावत दुति गति गए जस कोई| ||
धूम संहति ते चहुँ दिसि धुँधर  | दिसि  न दरसिहिं नहि दरसिहिं डगर ||
छितिज का दृश्य इस प्रकार दर्श रहा था मानो कोई द्रुतगति से दौड़ता हुवा गया हो | धूम्रराशि से चारों दिशाऐं धुंधली हो उठी थीं जनमानस को अब न तो कोई दिशा ही दिखाई दे रही थी न कोई मार्ग ही दिखाई दे रहा था | 


लोक ब्यापि रहे जो देसा | खँडरत होत गयउ सो सेसा ||
बहोरि अनुसासत सो सेषा | भए नायक ता दलहि बिसेषा ||
जो देश समस्त विश्व में व्याप्त था वह खंड-खंड होकर शेष हो चुका था | तदनन्तर देश के अनुशासक दल विशेष के जो नायक हुवे - 

कहयउ लाल बहादुर  नावा | देस परधान पद पधरावा ||
 पुर्बल प्रधान देत सब दोसिहि  || बारम्बार लोग सब कोसिहि |  
उनका नाम लाल बहादुर श्रीवास्तव था फिर उन्होंने देश के प्रधानमंत्री पद का कार्यभार ग्रहण कर लिया | दिवंगत पूर्व प्रधान मंत्री पर दोषारोपण कर लोग उन्हें वारंवार कोसते | 


देखु अँधमति चलिअ कस चाला || करिते गोठि बैस चोपाला | 
निज हित हुँत पालत पोसिहि | जेहिं बसाइहिं पास पड़ोसिहि | |
चौपालों में विराजकर गोष्ठी करते हुवे वह कहते देखो ! उनकी अन्धबुद्धि ने कैसी कुटिल चाल चली |  स्वयं के कल्याण को परिलक्षित कर जिन्हें पालते पोषते देश व् देश के प्रतिवेश में वासित कर रखा 


भू भूति भरपूरत सो औरु औरु करि आस |
बैर परत बैरी करत गए  रिपु निज संकास ||
वह बहिरवर्ग भूमि सहित संसार के समस्त ऐश्वर्य से युक्त हो गए थे  तथापि वह अधिकाधिक की प्रत्याशा
में शत्रुता करते हुवे अपने प्रतिवेशियों को भी इस देश का शत्रु बनाते चले गए | 

किन्ही अँध बिस्बास सुहरिदय तिन्ह जान अस |
जल धरनिहि आगास चारिहुँ पुर रिपु दरसें ||
 उन्हें अपना सौहृदय संज्ञान कर ऐसा अंधविश्वास किया कि  जल क्या धरती आकाश क्या अब तो सभी ओर शत्रु ही शत्रु दृष्टिगत हो रहे हैं | 

को गह भीतर को बहियारे | भेदत घरि घरि सींव पचारें |
नगर अँधेरु सुझै कछु नाही | तापर  धूसर कछु नहि दरसाही ||
कोई गृह के भीतर तो कोई बाहर बैठा है | सीमाओं का उल्लंघन कर ये घडी घडी ललकार उठते हैं | नियम व् नीतियों के अभाव से कुछ संज्ञात नहीं हो रहा उसपर देस के कुमार्ग गमन का यह धूसर कुछ दर्शा नहीं रहा | 

अस चिंतत घरि पलक न  लागे | सोए न राति भोर रहँ जागे || 
एहि भारत केर सोइ संताना || जासु देस ए भयो जग जाना || 
ऐसा चिंतन कर घडी भर को भी उन्हें निद्रासुख प्राप्त नहीं होता, रात्रि शयन बिना वह भोर होने तक जागृत रहते |  यह भारत की वह संतान थी जिससे यह देश विश्व विख्यात हुवा था |   
     
 पुर्बल गह गह रह ससि साला | बिकसत उद्यम परे अकाला ||
उद्योग बृहत् इत  बिनसत ससि | लखिमिहि निकसावत माया बसि ||
पूर्वकाल में इस देश का गृह गृह शस्यशील हुवा करता था | उद्योगिक विकास होते ही यहाँ जैसे अकाल पड़ गया | इधर वृहत उद्योग धनधान्य को नष्ट करते गए घरों में लक्ष्मी का निष्कासन हो गया और उसका  स्थान माया ने ग्रहण कर लिया | 

राजत दल केँ काल बिहाना | रहिअहिं दलपति प्रथम प्रधाना ||
रहहि जैसेउ तासु बिचारा |  करिअ दल तैसोइ अनुहारा ||
पूर्वकाल में देश के प्रथम प्रधानमंत्री सत्ताधारी दल के दलपति थे | दल भी वैसा विचारों का अनुशरण करता होता चला गया जैसे उनके व्यक्तिगत विचार थे | 

ग्यान मनै न बिग्यान इतिहास न बिदमान | 
दल महुँ अजहुँ सोइ मनै जौ बाका अनुमान | 
अब न ज्ञान का कहा मान्य होता न विज्ञान का इतिहास का कहा मान्य न विद्यमान का, दल को वही मान्य होता जो प्रथम प्रधानमंत्री का अनुमान होता | 

बहुरि रचहिं सब  नेम बिधाना | प्रथम प्रधान केर अनुमाना || 
देस बिचार गयउ बिलोपे | तासु बिचार देइ सिरु थोपे || 
 अब संसद में सभी नियम व् विधान प्रथम प्रधानमंत्री के अनुमानों का ही अनुशरण कर रचे जाते | इस प्रकार इस देश के अपने विचार विलुप्त कर संसद  प्रथम प्रधानमन्त्री पंडित जी के निज  विचारों को जनमानस के शीश पर थोपा देता  | 

बहिअ तासों बहुरि अस धारा   | गहियउ देसज धर्म बिकारा ||
अजहुँ देस सो देस न होई | दसा दुसह दुर दिसा न कोई ||
इस थोपीकरण से विचारों की ऐसी धारा बह चली कि जिससे देश के आचार-विचार, आहार-विहार , भाषाभूषा यहाँ तक की उसके मूलगत निवासियों में भी विकृति आ गई | अब यह देश वह देश नहीं रहा दशा दुर्दशा को प्राप्त होकर दुसह हो गई ऐसी अवस्था में उसे कोई  दिशा सूझ नहीं रही थी  | 

प्राग बिरति करतब बिसरावा | देइ देस पुनि नव नउ नावा ||
पीठि बाहिरि बरग करि भारा | झूठ बदनु दए झूठहि नारा ||
ऐतिहासिक घटनाओं को विस्मृत  देश को ने नए नए नाम देकर उसकी पीठ पर बाह्यवर्ग का बोझ लाद दिया गया  और झूठे मुख से झूठे नारे दिए गए | 

हिन्दू मुसलिम सिख ईसाई |आध बहिर देसिअ समुदाई  ||  
भाइ भाइ कर बंचकताई  | अब लगि लोगन्हि समुझ न आई || 
 जिसमें आधा बहिर्देशीय समुदाय था ऐसे हिन्दू मुस्लिम सिक्ख ईसाई के बंधुत्व का मायाजाल लोगों को विद्यमान समय तक समझ नहीं आया  | 

गहै सिहासन अल्पहि काला  | चलिअ दल तैसेउ परिचाला |
कठ पुतरी बस आपु बिहीन | बिनु नय भए अस दलहि अधीना ||
यत्किं चित समय के लिए ग्राह्य हुई सत्ता का शासन काल अत्यल्प था | दल जैसी चालें चलता प्रधान मंत्री भी वैसे ही परिचालन करते | इसप्रकार वह स्वयं के नियमों व् नियंत्रण से रहित संकेतों पर नृत्य करने वाली किसी कठपुतली के समान दल के अधीन थे  

राज किए सो अति अल्पहि काज किए कुल चार |
लाह लहन दल गै तासु कीर्ति करत अपार ||
प्रधानमंत्री लालबहादुर श्रीवास्तव का कार्यकाल अत्यंत अल्प था उनके द्वारा  किए गए कार्य भी यत्किंचित थे | इस यत्किंचित कार्यों का सत्ता की लाभ लब्धि हेतु उसका  अपार प्रचार करते चले | 

सत्ता सूत गहत निज हाथा | भेंट भईं समास कहुँ साथा || 
घनी भूत गनि महुँ बहुतेरी | जनमानस लए चहुँ दिसि घेरी || 

बँधेउ बहुतक संकट पासा | नेम नीति गत कतहुँ निरासा | 
दल कैं भगतिहि दल पद पूजा | दल ते अबरु उपाए न दूजा || 
कहीं बहुंत से संकट पाश की बंध्यता थी तो यही नियम व् नीतिगत निराशा थी दल की भक्ति दलगत पद की पूजा,  दल से भिन्न कोई दूसरी विचारमूलक युक्ति भी नहीं थी | 

सहत  देसजन भाजन दंसू |गहत  बिषम दुःख तासु बिधंसू | 
गाँव बास निज बसति उजारे | बसिहि अगम बन घन अँधियारे ||  
विभाजन के दंश को सहन किए एवं उसके विध्वंश का भीषण दुःख हृदय में लिए देश का जनमानस अपना गांव अपनी बस्तियां अपने गृह को उजाड़े अंधकारमय दुर्गम वनों में जा बसा था  ||  

जासु धान धन रहँ भरपूरे | सो हलधर सहुँ भए हल दूरे || 
धरनिहि संगत बिछुरे बाछर | भयउ रतन कन कंकन बिनु कर || 
जिससे देश में धन धान्य  परिपूर्ण रहता था उस हलधर से हल दूर हो चुके थे धरती से उसके वत्सल दूर हो गए थे अब उसके हस्त रत्नकणों के कंगनों से रहित हो गए थे | 

धेनु पयस गह बहुतहि रोईं | अहहिं न मम पय पायन कोई || 
देसहु कुदसा तासहुँ घेरीं |  कहँ अब कंजन सुर मनि ढेरी || 
पयस ग्रहण किए धेनु रुदन कर कहती अब मेरा स्नेह रस पाने वाला नहीं है | उसके साथ देश को भी बुरी दशाओं ने घेर लिया था अब उसके लिए भी धनधान्य रूपी स्वर्ण व् चिन्तामणियों की ढेरियां स्वप्न हो गई थीं | || 

जुग जुग लगि बिकसाए के गहे रहे जहँ मूरि | 
तासहुँ जोग लगाए पुनि प्रसरत गए बहु दूरि || 
युगों युगों तक जड़ें ग्रहण किए जहाँ वह फलाफूला उन जड़ों से ही संयोजित रहकर वह  प्रस्तारित हुवा  बहुंत दूर चला आया था | 


बिरवा केरि साखि चहे केतक दूरि पसारि | 
मूरि परि जहँ उपजाई तहँ करि गई पुकारि || 
वृक्ष की शाखा चाहे कितनी ही दूर प्रस्तारित हो जाए वह वहीँ की उत्पत्ति कहलाती है जिस मूल से व्युत्पन्न होकर जहाँ वह वृक्ष में परिणित हुई | 

गहरत अबरु  नगर अँधियारा | अजहुँ चहुँ पुर चरन पैसारा | 
जहँ नय  नेम नीति बिनु राजा | बिपति कै तहँ बसत समाजा || 

सासि स्वारथ नीति जहँ करहिं | बिपद जाल जन काहे न परहिं | 
करषि करम परि धरे अधारा | रह देस जौ जगत भरतारा  ||  

भुईँ भुईं अति उर्बरु जहँ की | दरसै न ससि जन दीठि तहँकी || 
हल बिनु हलधर कर बिनु काजा |  अजहुँ भए तहँ रतन सम नाजा | 


ज्यावत जिन्ह   | सो जन भोजन तेउ तरसाए  | 
उलट बरेली बांस अनायो  |  बहिरि देस तब मोल मँगायो   |  

रूसेउ हल तैं जब खलिहाना || हारि गहे रन भट बलबाना ||

जय जुवान जय जय करिसाना | कहिअ उछाहत देस प्रधाना ||


कीन्हे बैरि बैर अतीवा भय गहि सीवाँ 







मंगलवार, 12 मार्च 2019

---- ॥ दोहा-दशम ३६०॥ -----,


साजि सैन न त समरु समाजे | होइ समयगत काज अकाजे || 
रिपु सौ हरिदय सरिरुह लेखे | कीन्हि नित उत्पात न देखे || 
 न सेना ही सुसज्जित की न युद्ध की तैयारी की समयोपरांत किए गए युद्ध के सभी उपक्रम व्यर्थ सिद्ध हुवे | शत्रु को सौहृदय के समान संज्ञान कर उसके निरंतर उत्पातों को अनदेखा किया | 

कियउ ताहि परि अंध भरोसा |  हारत धरिअ देस सिरु दोसा || 
परिनत पुनि सब संक असंका | कुटिलपना ते भए अकलंका || 
उसपर अंधविश्वास किया और पराजय का दोष देश के शीश पर मढ़ दिया | तत्पश्चात पराजय की सभी आशंकाओं को अशंका में परिणित कर कुटिलता पूर्वक देश के प्रधान स्वयं निष्कलंक हो गए | 

कियो पराहत हेतु दुराई | जन जन संगत बहु चतुराई || 
जहाँ असाँच कपट छल छूती | दूरत तहँ जस बिजय बिभूती || 
देश के जनमानस से अत्यंत चतुराई पूर्वक पराजय के कारणों को गोपित कर दिया | जहाँ असत्य छल व् कपट की अपवित्रता हो वहां कीर्ति व् विजय की विभूति अप्राप्य रहती है  | 

बल बुद्धिहि करि लेइ परीखा | ए संग्राम दियो अस सीखा || 
बन्धुजात संग बंधुताई | सद सतनुरकत संग  मिताई || 
बल व बुद्धि की परीक्षा लेते हुवे ये संग्राम यह शिक्षा दे गया कि बंधुता अथवा भाईचारा अपने बन्धुजातकों से ही होना चाहिए, धर्मरत सत्यनिष्ठ से मित्रता होनी चाहिए  | 

राजपाट छाँड़े नहीं अजई होत प्रधान | 
खात हरिदय घात बहुरि छुटे देह ते प्रान || ३६०१ || 
पराजेय होते हुवे भी देश के प्रधान ने सत्ता नहीं त्यागी तदनन्तर हृदयघात होने पर उनकी  देह ने प्राण त्याग दिए  | 

गत प्रधान कइ कारज काला | कतहुँ काल भए कतहुँ अकाला || 
छायउ जद्यपि नगर अँधेरा | कीन्हि कछुएकु दीप उजेरा || 
पूर्व प्रधान मंत्री के कार्य काल की विवेचना करें तो इनके शासन में कहीं काल तो कहीं अकाल था | यद्यपि नीति व् नियमों का घोर अभाव था  इस अभाव में भी नीतियों के कुछ दीपक प्रकाश बिखरते रहे | 

प्राँत प्राँत महँ देस बखारा | होत समिट भयो एकाकारा || 
छन छित छिदरित देसिअताई | अजहुँ भई दृढ  देस इकाई || 
प्रांतों में बिखरा राष्ट्र एकत्रीभूत होकर एकरूप होता गया, विकीर्णित व् दुर्बल राष्ट्रीयता अब एक सुदृढ़ राष्ट्र ईकाई में परिणित हो चली | 

अस्वमेधिअ राजसुय संगा | रहउ पुरबल ए देस एकंगा || 
सरब भुइँ करि रीति अनुहारे | दहुँ दिसि के दिग्पाल गुहारे || 
 प्राचीन काल में अश्मेध व् राजसूय यज्ञों से यह देश एकीकार रहा |  सार्वभौमिकता  की इस रीति का अनुशरण करते हुवे  चारों ओर के राजाओं का आह्वान किया गया | 

पुनि खन खंडित देसिअ धारा | लीन्हि अबिरल सरिद अकारा | 
भयउ अबरु अपरबल प्रबाहा |  रलमिलिहि जबु सकल नरनाहा || 
फिर तो  खंड खंड हुई इस राष्ट्रिय धारा ने एक अविरल सरिता का रूप धारण कर लिया | इसका प्रवाह तब और अधिक प्रबल हो गया जब प्रांतों के सभी राजा इस सरिता में समाहित हो गए | 

कारन कपट बिनहि छलछंदू | रहँ ए राजोपक्रम निर्द्वंदू  | 
कहन जोगु प्रतिरोधु न होई | को एक आध रु बाध न कोई || 
कपट अथवा किसी छलरचना से रहित होने के कारण शासन का यह उपक्रम निर्द्वन्द्व रहा | ऐसा कोई प्रतिरोध न था जो वर्णन योग्य हो कोई एक आध  बाधा ही थी अन्यथा तो यह निर्बाध ही रहा | 

सर्बभूमि सरूप धरे भए एहि देस सँजूत | 
एक छतर भए सबहि राज बाँधि गयउ एक सूत || ३६०२ ||  
सार्वभौमिक स्वरूप धारण  किए फिर यह देश संगठित हुवा और  इसके सभी प्रांत एक सूत्र में बंधकर एक छत्र हो गए | 


बुध/बृहस्पति, १३/१४  मार्च २०१९                                                               

अस तौ सबहि राज बिलिनाईं  | कस्मीरु परि रहेउब बिलगाईँ || 
किएँ प्रधान इहँ कुचक कुचाला | करत कूट छल सहित भुआला || 
ऐसे तो सभी प्रांतों का संविलयन हो चुका था किन्तु कश्मीर इस संविलीनीकरण से पृथक रहा | यहाँ देश के प्रधान ने षणयंत्र कर कुचालि की, कश्मीर के राजा सहित देश के साथ छल व् वंचन करते हुवे | 

रचत नेम कृत दुरनै नीती | अपुने पराए सहुँ प्रीती || 
नग उतंग अति हिमधर नामा | जुग सहुँ थापित जहँ सिउ धामा || 
दुर्नीति का आश्रय लेकर अपनों का तिरष्कार परायों से प्यार का नियम रच गए  | यह ऊंचा पर्वत हिमालय जिसका नाम है जहाँ युगों से स्थापित भारतीयों के भगवान शिव शंकर का धाम है | 

बहति जहाँ सों पावनि गंगा | अबिलग होत भए बिलगितंगा || 
देस भूमि भू सम्पद वाकी | जोइ मूरि गत संतति ताकी || 
जहाँ से उनकी पावन गंगा बहती आई है वह कश्मीर अभिन्न होते हुवे इस देश से भिन्न हो गया | कोई देश कोई देशभूमि कोई भूसंपदा पर उसका प्रभुत्व होता है जो उसकी मूलगत संताने हों | 

दासा करतब  जनिति पराई | भइ तासु बरियात गोसाईं || 

धाता हेतु हेतु निज धाती | धरएँ अँगार हम्म नित छाँती || 
किन्तु अन्योदर्य संतति इस देशभूमि को अपना दास बनाकर उसके बलपूर्वक स्वामी बन बैठी | अपने जन्मदाता देश व् मातृ रूपी देशभूमि के लिए हमने अपनी वक्ष पर नित्य ही उनके  अंगार सहे | 

प्रबसिहिं भीत भूर मरजादा | सुरत  तेहि मन भरे बिषादा ||  
पर जनितिहि करि सहियब गोले | न्याउ प्रिय कछु जगत न बोले || 
मर्यादाएं विस्मृत कर जब इन्होने हमारी सीमाओं का उल्लंघन किया भीतर प्रविष्ट हुवे  उस घुसपैठ का स्मरण करते हुवे मन विषाद से भर उठता है | हम इन पराए देशजों के गोले सहते रहे किन्तु 'न्यायप्रिय' विश्व ने (इनके विरुद्ध ) एक शब्द भी नहीं कहा || 

जहाँ कैलासा नाथ निबासा जहाँ पावनि गंग बहे | 
सकल सो हिम भू भृताञ्चल भारत केर अंग अहे  || 
बिनसै जान केतक धन सम्पद राखि ताहि रखबार रे |  
केतनि केत बीर भट भएउ खेत लए उर रिपुहु प्रहार रे || 
जहाँ कैलाशनाथ का निवास है  जहाँ पावन गंगा बहती है वह समूचा हिमक्षेत्र भारत का ही अंग है | उसकी रक्षा करने में इस देश की जाने कितनी ही सम्पति विनष्ट हो गई | कितने ही वीर योद्धा शत्रु का प्रहार ह्रदय में लिए वीर गति को प्राप्त होते रहे | 

भाग बिधाता भारत कै लिखे नेम गै बाम | 
तिनकी करनी अजहुँ लग राज करे इस्लाम || 3604 || 
भारत के भाग्य विधाता (प्रथम )प्रधान ऐसा विपरीत नियम लिख गए उनकी करनी से अबतक इस देश में इस्लाम राज कर रहा है | 


शनिवार, १६ मार्च, २०१९                                                                                      
देउ धाम धी धर्म हमारे | चरन चरन गयऊ दुत्कारे || 
देस बासि निज भाष रु भेखा | गए प्रधान किएँ सदा उपेखा || 
हमारे आराध्य हमारे धाम हमारे आचार-विचार हमारे धर्म को चरण-चरण पर दुत्कारा गया | अपना देश उसके मूलभूत निवासी अपनी भाषा अपनी वेशभूषा की दिवंगत प्रधानमन्त्री ने सदैव उपेक्षा की | 

हमरे अंजन संग अँजवाएँ | अँधरे कहत जो दीठि दिसाएँ || 
हमहि सों भए राजांगनिबारू | देस धुजा धर धुजिन्हि धारू || 
हमारे ज्योति से ज्योतिर्मान हुवे नेत्रों को जब हम अंधे कहते तब वह हम पर ही क्रोध प्रकट करते | हमसे ही जो राज्यांग ( राष्ट्र, राजा या स्वामी, मंत्री, दुर्ग,राजकोष, बल,सुहृदय एक राष्ट्र निर्माण हेतु आवश्यक ये सात अंग एक आठवाँ अंग भी होना चाहिए वो है भूमि )  वाले हुवे देश वाले ध्वजाधारी हुवे सेना नियोजित करना जिन्होंने हमसे सीखा 

तिनकी पढ़ाए तजनिज ग्रंथा  | चरत कुपथ बिसुरे निज पंथा || 
वाकी चलनि देस अनुहारे | पतनमुखी पथ  पद पैसारे || 
उनकी धूर्ततापूर्ण बातों में आकर उन्होंने स्वधर्मग्रन्थों को त्याग दिया और कुपंथ पर चलते हुवे उन्हें अपना सदपंथ विस्मृत हो गया | उनकी इस चलनी का अनुशरण करते हुवे इस देश के चरण भी पतनोन्मुखी पथ चल पड़े | 

जेहि संकरति बेद पुराना | कुल दूषक सकुचित मत माना || 
ता संकरित कहत अधुनाई | दिए कुल जाति समाजु नसाई || 
वेद पुराणों ने जिस संकृति वंशनाशक के सह एक संकीर्ण विचार कहा ( पद्मपुराण )उस संकरता उस मिलावट को आधुनिक विचार कहकर इस कुल, जाति को नष्ट करते हुवे एक समृद्ध समाजिक व्यवस्था का विध्वंश कर दिया | 

जासु  देसधरम सहित जाती जात नसात  | 
समउ परे निरमाइअहि बिलगित बाकी जात || 3605|| 
जिन विचार धाराओं से इस देश में प्रचलित धर्म-प्रथा  व् जातिगत सामाजिक व्यवस्था को नष्ट हो रही है कालान्तर में वह एक पृथक जातक वर्ग को निर्मित करेंगी | 

होंहि ए जाति बरग बहु रंगा | देस धर्म बिनु बिनु भू संगा | 
कोष बल बिनु बिनु संबिधाने  | होंहि न अपुने नाहि बिराने || 
यह जाति वर्ग बहुरुपिया प्रकृति का होगा न इसकी कोई अपनी धर्म संस्कृति होगी न ये किसी  राष्ट्रभूमि से युक्त होगा | कोष व् बल से रहित इसका कोई संविधान न होगा न यह अपना होगा न पराया | 

ए अनुमानित लोग बहुतेरे | तथाकथित जनप्रियता केरे  | 
प्रभा मंडल मुख दए प्रधाना  | आपसहुँ अधिकु केहि न जाना  || 
बहुतस लोगों का यह अनुमान है कि  तथकथित लोकप्रियता का एक आभामंडल मुख पर प्रतिष्ठित किए देश के प्रथम प्रधानमन्त्री ने  अपने अधिक किसी को नहीं जाना ||  

तासु स्वार्थ निज हितदेखा  | लोक हित नित किन्ही उपेखा | 
पच्छिम केरि अधम अधुनाई  | भारत भू बरियात बियायो || 
उनके स्वाभिप्राय ने स्वहित देखा इस स्वहित हेतु लोकहित की सदैव उपेक्षा की | सीमांत पश्चिमी देशौं की अधमतस आधुनिकता भारत की भूमि पर बलपूर्वक आरोपित किया | 

सोषन कारक गए अस पोषे  | गयउ तासु सब पोषन सोषे || 
बाँट बखेरा के भए दोसी | अधीन करिता करत पडोसी || 
फिर तो इस भूमि के शोषक कारक ऐसे पोषित किए गए कि उसकी पोषण क्षमता शोषित होती चली गई | देस के विभाजन तदनन्तर अस्त-व्यस्त हुई सामाजिक व्यवस्था के वह दोषी सिद्ध हुवे | 

बाँट बखेरा करत पुनि ऐसो रचे बिधान | 
कहत पड़ोसी हिन्द को नव इस्लामिस्तान  || 3606 ||    
देश विभाजन व् इस सामाजिक बिखराव के पश्चात एक ऐसा संविधान की रचना की जिसके  क्रियान्वयन के पश्चात कालान्तर में पड़ोसी अब इस देश को नया पाकिस्तान कहते हैं | 

कहति ए लिखिनि सुकबि कहनाई | अलप प्रसंस अधिक निदराई || 
गहे प्रधान स्यानप थोरे | गुन अल्पहि अति औगुन जोरे || 
उत्तम कवि कहते हैं कि  यह लेखनी प्रशंसा कतिपय व् निंदा अतिशय करती है इन प्रधान ने ज्ञान विवेक यत्किंचित ही ग्रहण किया अवगुणों का संग्रह अधिक तो सद्गुणों का न्यून किया  | 

कलुषित करतब किएँ अधिकाई | करिअब  कस कृत करम बड़ाई || 
कहन लगे जबु मैं कलिसाई | खन खंडित भई पंडिताई || 
जब कलुषित कार्य अधिकाधिक किए तो फिर किए गए कर्मों की प्रशंसा कैसे की जाए | जब वह स्वयं को ईसाई कहने लगे तब उनका पांडित्य खंडित हो गया | 
निपतित चरित भूरि मरजादा | देसिअ पन ते भरे बिषादा || 
जासु राज छलु कपट ब्यापा | कहौ त तासु नाउ को जापा || 
जिसके शासनकाल ने छल और कपट व्याप्त किया हो और चारित्रिक पतन ने सभी मर्यादाएँ  लांघ दी हो,  देशीय से जिसका सदा का वैमनस्य रहा हो  कहिए तो उसके नाम की कोई कीर्ति करता है क्या ?

पंथ दुरुह जन जूह अगाधा | तासु नीति नय ते भइ बाधा || 
चरन त्रान बिनु नगर अँधेरे | कांकर पाथर रिपु बहुतेरे | 
पंथ अगम्य था और पथिक रूपी जन समूह अगाध था इस शासनकाल का नेतृत्व व् उसकी नीतियां विघ्नकारक सिद्ध हुईं | पथरीले पथ पर कंटक रूपी शत्रुओं की बाहुल्यता थी  ऐसी बाहुलयता में जहां नियम व् नीतियों का अभाव था वहां सुरक्षा के उपाय भी अल्पतर थे | 

कंचे संगत पाए जूँ  हीर कहाता काँच || 
औगुन संग कहाए तूँ औगुन गुन पै पाँच || 3607|| 
कंचों के संगत जिसप्रकार हीरा भी काँच ही कहलाता है उसीप्रकार अतिशय अवगुणों के सांगत कतिपय सद्गुण भी अवगुण ही कहलाते हैं 
|  
मंगलवार,०७ मई, २०१९                                                                       

प्रथम करम जौ कहउँ बखाना |  जथा जतन निज मति अनुमाना || 
आखर मुखि ग्यान गुन  सागर | गढ़े ग्रन्थ जौ जगत प्रथमतर || 
यथायत्न  व् अपनी बुद्धिं के अनुसार  लेखनी सर्वप्रथम उस कार्य की प्रशंसा जो उक्त शासनकाल द्वारा किया गया | अक्षरों के परम विद्वान ज्ञान व् गुणों का सिंधु होते हुवे जिन्होंने विश्व में ग्रंथों की सर्वप्रथम रचना की | 

परबस परे देसजन सोई | अनपढ़ निपट निराखर होई || 
दीन हीन जन दूज अधीना | होइसि पाठन पठन बिहीना || 
इस पराधीन देश का वही जनमानस निरक्षर होकर नितांत अशिक्षित होता चला गया | पराई अधीनता ने उसे  दुर्दशा से ग्रस्त कर दिया इस दुर्दषाने उसे अध्ययन अध्यापन से विहीन कर दिया | 

प्रथम प्रधान केरि रौताई | करन जोग एहि काज बड़ाई || 
जबहि निराखर देस दिठायो | घर घर आखर अलख जगायो || 
प्रथम प्रधानमन्त्री के शासनकाल का प्रशंसा योग्य यही कृत्या है कि उसे देश निरक्षर दर्शित हुवा तब उसने घर घर में अक्षरों की अलख जगाई | 

बरन दीप पुनि धरत द्वारा | भयउ तमोधन करत उजारा || 
जहाँ बिद्याघर नगर न पावा | रचेउ तहँ अजहुँ सबु गाँवा || 
वर्णों के दीपक द्वार पर आधारित किए यह दीपक अशिक्षा के अन्धकार का हरण करते गए | जहाँ नगरों में विद्यालय नहीं थे वहां अब यह ग्राम-ग्राम में निर्मित हो गए | 

चढ़त बरन सोपान भए पढ़ेलिखे जुववान | 
पढ़े लिखे बालक अजहुँ पढ़े लिखे बिरधान || ३६०८ || 
वर्णों के सोपान पथ पर चढ़ते अब देश का न केवल युवा अपितु बचपन व् वृद्ध भी शिक्षित हो गया | 

एहि बिद्या ग्यान करि रीती | निपतत चरित बढ़ाइ अनीति  || 
भवन आपुना सीख पराई | उदर भरे सो धरम सिखाईं || 
किन्तु इस शैक्षणिक क्रान्ति में जिस शिक्षा प्रणाली का प्रयोग किया गया वह चारित्रिक पतन कर अनैतिकता को प्रोत्साहित करती थी | विद्यालय देश के अपने थे किन्तु वहां सीख पराई थी, जो उदर पूर्ति करे वहां वही विद्या सिखाई जाती | 

पढ़े पोथि ग्यान सो कोरा | दिसाहीन करि दिए पथ भोरा || 
बिनस सुपंथ रचे अस पंथा | लुपुत होत गए सबु सद ग्रंथा || 
पोथियों में लिखित ज्ञान नितांत ही कोरा था यह दिशा हीन कर विद्यार्थी को पथ भ्रमित करता  | सन्मार्ग को विनष्ट कर इसने ऐसे मार्ग की रचना की जिसके अनुशरण से सभी सद्ग्रन्थ को लुप्तप्राय होते चले गए | 

घन घन धन सम्पद उपजावै | बिद्या गुरु सो पाठ पढ़ावै || 
गह बिनु मनि तहाँ भएँ मनीसा | बाग बिनहि तहँ भएँ बागीसा || 
जिससे अधिकाधिक धन का उपार्जिन हो सके शिक्षक वही पाठ पढ़ाते | विद्यार्थी विद्या मणि ग्रहण किए बिना ही मनीषी हो  जाता विद्या विशारद हुवे बिना ही वहां विद्व्ता प्राप्त हो जाती | 

निरमएँ अस भेषज अभियंता | कपट बेस जिमि साधुहु संता || 
बोधगम्य ग्यान नहिबोधे | धनासक्त मति कछु नहि सोधे || 
चिकित्सक व् अभियंता ऐसे बनाया जाता जैसे वेश धारण करने मात्र से कोई पाखंडी साधू बनता है | विज्ञता विषयिक ज्ञान के बोधन से रहित धन में आसक्त हुई बुद्धि कुछ अनुसंधान नहीं करती |( जैसे विदेशी आविष्कार कर कर के इन्हें दे देते ये उसका उपभोग करने में प्रथम आते स्वयं कुछ नहीं करते |)

पच्छिमी अनुहारनन्हि किए अस बिगत ग्यान | 
पढ़ते जड़मति होएं के भूरे सब बिग्यान || ३६०९ || 
विश्व को धातुमय करने वाले  विद्वान देश को  पाश्चात्य के अनुशरण ने विद्या से ऐसा विहीन  कर दिया कि अध्ययन अध्यापन के पश्चात भी जड़मति हुवा वह सारा विज्ञान भूल गया | 

बृहस्पतिवार, ०९ मई, २०१९        

होतब जब को देस अधीना | होइँ तहाँ बस बिनहि बसीना  || 
उदर नाज नहि देह न चीरा | सोग बियोग रोग दए पीरा || 
जब कोई देश परायों के अधीन होता है निवासी होते हुवे भी वहां देशवासी को निवास की सम्प्रभुता का अधिकार अप्राप्त होता है | उदर में अनाज नहीं होता देह में वस्त्र नहीं होते शोक वियोग और रोग उसे उत्पीड़ा देते हैं | 

सुतंत्र भएँ जब कह भइ भोरा | निसि तम चोरा पीट ढिँढोरा || 
दीठात चित्र लिखित दिनमाना | दिए प्रमान अस प्रथम प्रधाना || 
देश स्वतन्त्र हो गया स्वाधीनता की भोर हो गई एक रात यामघोषक ने यह उद्घोषणा की | देश के प्रथम प्रधान ने चित्र में उल्लेखित सूर्य दर्शाकर इसका प्रमाण दिया | 

करतब निज बस कोषागारे |  राजत राज भयो रजवारे || 

रोग पीरित कर हुँत उत्पाली | चले बहुरि पच्छिम कर चाली || 
सत्तासित होते ही देश के कोषागार पर अपना प्रभुत्व स्थापित किया लोकतंत्र की शासन व्यवस्था राजसी की   | रोग पीड़ित जनमानस की स्वास्थ्य सेवा हेतु पुनश्च पाश्चात्य पद्धति का अनुशरण किया गया | 

एहि चाली करि फलु अस होई | अहहि न अजहुँ निरामय कोई || 

बिदेसी अरोग बिधा प्रचारे  | तासु कारन रोग संचारे || 
इस अंध अनुशरण का परिणाम यह हुवा कि वर्तमान में कोई देस वासी निरोगी नहीं है | (इस प्रकार )विदेशी चिकित्सा पद्धति का प्रचार किया पार्श्व प्रभाव के कारणवश इससे रोगों का निवारण न होकर उनका प्रसारण ही हुवा | 


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देअ जंतु जिउ पीर घनेरे | एही बिधा जो औषधि  हेरे || 
सो बिषकर रसायनि संघटन | गहे बिषम भा रुधिराभिसरन || 
जीव-जंतुओं पर क्रूरता करते हुवे इस विधा ने जिस औषधि विज्ञान का अनुसंधान किया वह वस्तुत: विषाक्त रसायनों संघटन है इसके सेवन से रक्त का परिभ्रमण विषमता को प्राप्त होता है | 

आरोग धाम देस हमारू | रोगोपचार परिसोधनवारू ||
प्रथम औषधिहि ग्रन्थ रचयिता | रचित गई जहँ चरक संहिता ||
जबकी रोगों एवं उनके उपचारों का शोधकर्ता होते हुवे  हमारा यह देश आरोग्यधाम की पदवी को प्राप्त हुवा यह वह भारत है जिसने प्रथम औषधि ग्रन्थ की रचना की यह वह भारत है जहां चरक संहिता रची गई | 

रोगहन रूप अमरित सोधे | विषहरु रुधिरु सरन नहि रोधे ||
कहत जगत मह जिउ जो होई | रहें निरामय यहँ सब कोई ||
संसार में जितने भी जीव हैं वह सभी निरोगी रहें इस उद्देश्य के साथ रोग नाशक अमृतमय  रसायन का शोधन किया जो विषहारी थे एवं  रक्त के अभिशरण में अवरोध व्युत्पन्न नहीं करते | 

गह रोगापह बिधा पराई | विषकर रस गए रुधिरु सँचाई ||
अजहुँ हमरी भई अस देही  | अमरित रस भए बिनहि सनेही ||
पराई चिकित्सा पद्धति को अपनाकर हमने अपने रुधिर में विषाक्त रसों को संचयित कर लिया अब हमारा शरीर इस प्रकार का हो गया कि उसपर आयुर्वेदिक अमृतमय रस प्रभावशून्य हो चले  |  

पुर्बल निरामय होइ जहँ अमर रहे सब लोग |
आयुरकाल छरत तिन्ह अजहूँ मारे रोग || ३६११ ||
इसप्रकार पूर्व समय में जहाँ इस देश के वासी सुखी व् निरामय होकर अमर हुवा करते थे वहीं वर्तमान में औसत आयु काल का क्षरण कर उसे रोग मार रहे हैं | 

शुक्रवार, १० मई , २०१९                     
स्वधुर केरे दीप प्रसंगा | प्रान दान को भयउ पतंगा || 
राज सिहांसन पाँखि संगा | आप बियत गत होइँ बिहंगा || 
स्वाधीनता के दीपक का प्रसंग प्राप्त हुवा और  प्राण दानकर कोई पतंग हो गया  और वह स्वयं राज सिंहासन के पंख लगाकर आकाश में उड़ते रहे | 
सत्ता हुँत करिगै संग्रामा | दीन्हेसि स्वाधीन नामा |
जन सेवक कह मत संचायो | सिंहासन बत्तीस रचायो ||
स्वाधीनता के नाम से जो संग्राम किया वस्तुत: वह सत्ता का संग्राम था |   स्वयं को जनसेवक कहकर जनमत संग्रह किया   को अपने प्रभाव से नचाने वाले ऊँचे  स्थानों की रचना की गई | 


राज गहत भए सेबक राजा | राजा कर कछु काम न काजा || 
सत्तासुख अस मति भरमायो | सेवाधर्म देइ बिहुरायो ||
सत्ता हाथ लगते ही सेवक राजा बन बैठे राजा हुई प्रजा को आजीविका का अभाव था | सत्ता के सुख ने सत्ताधारियों की बुद्धि ऐसे भ्रष्ट की कि वह अपना सेवाधर्म ही भूल गए | 


भुइँ भूतार्थ सोइ जनावा  | होईं  जोइ पयादहि पांवा || 
जनमानस कर उदर महुँ आगी | जौ दुर्नय कारन अति जागी || 
भूमिगत यथार्थ से वही परिचित होता है जो पंखों से नहीं पैरों से चलता हो | जनमानस के उदर में क्षुधा की आग लगी थी, इस शासन की दुर्नीतियों के कारण वह और अधिक भड़क उठी थी || 


उत्पादन कर साधन चीन्हि | उद्यमिकरन देस कहुँ किन्ही || 
तासु कारन बिकसे उद्योगा | कही कहाइ कहें कछु लोगा || 
उत्पादन के सरल उपायों को पहचानकर इस शासनकाल ने फिर देश का औद्योगीकरण किया इस शासन काल के कारण ही उद्योग-धंधे विकसित भी हुवे क्वचित लोग ऐसी कही कहाई बातें कहते हैं | 


तासहुँ जिनकहुँ लाह लहाही  | सो कतिपय एहि करम सराही || 
राज प्रबंधन तासु बिहाना | होतब गए पुनि अर्थ प्रधाना || 
इस उद्योगीकरण से जिन मुट्ठीभर लोगों को लाभ लब्ध  हुवा वह प्रथम प्रधान के इस कार्य की भूरि भूरि प्रशंसा करते हैं| इस उद्योगिकीकरण के पश्चात  देश का शासन प्रबंध धन पर आश्रित होकर अर्थ प्रधान होता चला गया | 

बहिता धन अवसोष के पूंजी गए निरमाए |
उदार हरिदय होए पुनि कछु कर देइ धराए ||३६१२ क ||
 लोक प्रवाहित धन का शोषण कर उसका पूंजीकरण किया गया, तदनन्तर उदारवादी होकर यह पूंजी कतिपय लोगों के हाथ में दे दी गई | 

अस पूंजीवादिता सों पूंजि लब्धि पै  पाँच |
धनिक बरग उपजाए सो जनमे अर्थ पिसाच || ३६१२ ख ||
इस पूंजीवादी व्यवस्था से देश का यह पूंजीगत धन गिने चुने लोगों के हाथों में चला गया इस पूंजी से लाभान्वित होकर  देश में पूंजीपतियों का एक वर्ग उत्पन्न हुवा इस वर्ग ने फिर धन के पिशाचों को जन्म दिया |

सत्ताधर पुनि चलत कुचाली | अपनायउ सो अर्थ प्रनाली || 
जहाँ उपनावन केर उपाए | पूँजीपति बरग लए हथियाए  || 
सत्ता धारियों ने फिर कुचालें चलते हुवे उस अर्थप्रणाली को अंगीकृत किया जहाँ उत्पादन के साधनों पर पूंजीपति वर्ग का एकाधिकार होता है | 

जनमानस सों कियौ ब्याजा | उपजेउ प्रभुतसील समाजा ||
रचिते सद संसाद सदन | तिनके हितकर नेम निबंधन ||
 प्रभुत्व शील समूह को व्युत्पन्न कर देशवासियों को छला | संसद के सभा सदन में प्रतिनिधि सदस्यों ने इस समूह  के लाभ व् कल्याण हेतु नियम निबंधन गढ़े | 

पुरबल लोहल हल कि हथौड़े | भवन केर कल  ईंट कि रोड़े ||
चाका चिमटा चून कि चीरा | सबहि बस्तु निरमयउ कुटीरा ||
अस्त्रशस्त्र हो अथवा हल-हथौड़े भवननिर्माण यन्त्र हों, ईंट -पत्थर हों  चक्का हो कि चिंमटा हो अथवा चूना हो अथवा वस्त्र ही क्यों न हो  पूर्व समय में मानव जीवन यापन की ये वस्तुएं कुटीरों में लघु उपक्रम द्वारा निर्मित होती थी | 

जेहि उद्यम कर्मकर गहयो | उद्यम पति जौ निज गह रहयो ||
लूटि ताहि धन पति कर दायो | सो सब उद्यम दिए बिनसायो ||
जो उद्यम-उद्योग कर्मकारों के हाथों में था जिससे वह अपने गृह के उद्यम-उद्योग का स्वामी था | उस स्वामित्व को लूटकर तथा उनके लघु उपक्रमिक व्यवस्था को नष्ट कर उत्पादन के ये साधन पूंजीपतियों को हस्तांतरित कर दिये गए | 

हरत खेतभू खन खलिहाना | करत हल भूति बिहुन किसाना ||
गेह भवन भए नाज बिहुने | उपनावन निपते दिन दूने ||
कृषिभूमि उसमें स्थित खनिजखानों व् खलिहानों का अधिग्रहण कर कृषक को हल आजीविका से विहीन कर दिया | गृह -भवन खाद्यान से रिक्त हो चले और देश का सकल घरेलु उत्पादन दिनोंदिन दुगनी गति से गिरता चला गया | 

बहुरि खेट खन  गाँव बसावा | चलें नगर पथ वाके पांवा ||
उदर असन नहि नहि तन चीरा | बसे मलिनि कुटि करि तहँ भीरा |
फिर तो खेड़ों में खण्डों में बसे गांववालों के चरण नगर की और जाने वाले पंथ पर चल पड़े | उदर में अन्न नहीं देह में वस्त्र नहीं वह नगरों में संकुलता उत्पन्न करते मलिन कुटीरों में बसते चले गए || 

करिषि करम कर श्रम सक्ति  किए कल जंत्र निजोग |
तहँ उपजित बस्तु बिलासी धनिक करए उपजोग || ३६१३ ||
इस प्रकार कृषि कर्म में नियोजित श्रमशक्ति का दुरूपयोग कर उसका नियोजन उद्यम उद्योगों में किया गया | वहां उत्पादित वस्तुएं भोग विलासी धनाढ्य वर्ग के लिए होती | 

उद्यमि करन के एकै मंत्रा | भोग बस्तु निपजै कल जंत्रा ||
पुरबल उद्यम के अस्तंभा | मानस के कर रहँ अवलंभा ||
औद्योगिकीकरण का एक ही मंत्र था कि उपभोग की वस्तुएं कल यंत्रों द्वारा उत्पन्न हों | पूर्व समय मेंउद्यमों का स्तम्भ मानव के हाथों में अवलम्बित था |  

करत प्रगति पुनि पच्छिम बासी | भयउ भूरि भव भोग बिलासी ||
पुनि भएँ जब  मानस अधिकाना | उपजि बस्तु भइँ तिल परमाना ||
फिर  (ज्ञान व् उपदेशों से रहित होने के कारण )अत्यंत ही भोग विलासी प्रवृत्ति के पश्चिमी वासि प्रगति पथ पर द्रुत गति से बढ़ने लगे | उसपर मानव जनसंख्या का वैश्विक विस्फोट हुवा तब उत्पादित वस्तुएं न्यून हो गईं और उपभोक्ता अधिक हो गए | 

तासु अपूर्ति पूरन हुँते | निपजावनु सुख साधन बहुँते ||
उद्यमिकरन कइँ चाह जनाइ | अरु नाना कल जंत्र उपजाइ ||
उनकी अपूर्ण आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु अधिकाधिक सुखसाधनों के उत्पादन के लिए औद्योगिकीकरण की आवश्यकता उत्पन्न हुई और नानाभांति के कलयंत्रों का आविष्कार हुवा || 

संचित धन निकसाए पुनि करै ढोल में पोल |
छनिक छदम बढ़ती केर  बोले मधुरिम बोल || ३६१४ ||
फिर भूमि संचित सम्पदा का निष्कासन होने लगा भूमि तो गोल थी जहाँ यह सम्पदा निष्कासित हुई वहां की भूमि पोली होकर ढोल हो गई | और वह क्षणिक व् छद्म प्रगति के सुरीले बोल बोलने लगी | 

एक दिवस जब कंपति  ए उठिहेंगी जब दोल |
छैल छबीली प्रगति कर खुलहएंगी सब पोल ||
एक दिन कम्पन करती जब यह दोल उठेगी तब उक्त कथनों को सिद्ध करते इस छैल छबीली छद्म प्रगति का सारा भेद खुल जाएगा | और ये भी सिंधु घाटी की सभ्यता जैसे हो जाएगी | 

सोमवार, १२ मई, २०१९             

अजहुँ उद्यम सहुँ बैठ बिठाए | जगजन खनि खन खंदै रु खाए ||
खातेउ असि बरसि कछु बीते | होहि अवसि भूधन सों रीते ||
अभी तो विश्व का जनमानस इन उद्यमों उद्योगों द्वारा खनिज खदानों का उत्खादन कर बैठे बैठे सुख भोग रहा है | यदि यह भोग विलास इसी प्रकार से होता रहा तो कुछ वर्षों के पश्चात यह भूमि सम्पदा से रहित होगी  | 

लघुता माहि बसी प्रभुताई || सबकहुँ सो सुठि सुकुति जनाई ||
पुरबल गह लघु मझलि इकाई | सोन चिड़ी एहि देस कहाई ||
लघुता में प्रभुता का वास होता है यह सुन्दर विचार सर्वविदित है पूर्व समय में लघु व मध्यम इकाइयों के बल पर ही यह देश सोने की चिड़िया कहा जाता था | 

भयउ भूमि भव भूतिहि भूरी | भवन भवन भँडारू भर पूरी ||
जथारथ उपनावन उपनाए | दीर्घ कालिहि प्रगति पथ पाए ||

यह भूमि ऐश्वर्य से परिपूर्ण थी इसके भवन-भवन में भरपूर भंडारण था | वास्तविक उत्पाद उत्पादित करते हुवे यह दीर्घ कालिक प्रगति के पंथ को प्राप्त था | 

राजपंथ बहु सेतु बनाई | बृहद बृहद अति गहत  इकाई || 
अजहुँ एहि देस मलिन कहिलाए | मँगए लोग यहँ हाथ पैसाए || 
राजपथों और सेतुओं की रचना तथा वृहद्  वृहद् उपक्रमों से युक्त होते हुवे भी वर्तमान में यह देश मलिन व् भिक्षा वृत्ति से जीवन यापन करने वाला वाले लोगों का देश कहलाता है | 

कहाँ ए काल कहाँ सो काला |  कहँ त बकुल कहँ  हंसक चाला || 
चारिहुँ पुर उद्यम करि जाला | तापर भुति करम अकाला || 
आधुनिक कहा जाने वाला कहाँ तो यह काल कहाँ वह पुरातन  स्वर्ण काल| कहाँ ये पश्चिमी वाली बगुले सी चलनी और कहाँ वह हंस की चाल | पश्चिम के अनुकरण वाले इस आधुनिक काल में चारों और उद्यम उद्योग का जाल होने के पश्चात भी आजीविका का अकाल पड़ा हुवा है | 

बिचरत जहँ तहँ अर्थ पिसाचा | खंद खनी खन खावहिं काचा || 
निसिचर नै नीति ब्याला | दंतालय समास कराला || 
पुर्ब ए भू असि पति सों पूरी |  करिअ देत सुबरन सो धूरी || 
अर्थ पिसाच समास ब्याला | सत नीति नै हतै तत्काला| 
समस्या रूपी विकराल मुख में राक्षसी प्रवृत्ति के नेतृत्व की हिंसाकारी नीतियों के दांते ग्रहण किए अर्थ पिशाच जहाँ तहाँ विचरण करते हैं और खनिज खदानों को कच्चा चबा जाते हैं |  प्राग समय में यह भूमि ऐसे धनपतियों से परिपूर्ण थी जो  मिटटी को भी स्वर्ण में परिवर्तित कर देते र समस्याओं केअर्थ पिशाचाओं औ हिंसक जंतुओं को सात्विक प्रवृत्ति वाले नेतृत्व की नीतियां अर्थ पिशाचों और समस्याओं के हिंसालुओं को तत्काल हताहत  कर देतीं | 

लघुत मझारि उद्यम अधारि करि  पुरबल चरना नुहारते |
कर्मकार केर कुटीरु कुटुम कर जंत्र भवनाधारते ||
जन सेबक सेबा ब्यौहारत सहार्थ सहुँ सहारते |
पूरत अपूरत भरि पूरिते भवन भवन भंडार ते ||
अपने पूर्व के स्वर्णिम काल का अनुशरण करते हुवे देश के उद्योग यदि लघु व् मध्यम स्वरूप में आधारित होते  यंत्रगृहों को कर्मकारों की कुटियाओं में उनके कुटुम के हाथ पर अवलम्बित करते और देश के जनप्रतिनिधि सेवा व्यवहार कर सहयोग द्वारा उनकी सहेज करते तो अपूर्त की पुर्तियाँ करते हुवे इस देश के भवन भवन वैभव विभूतियों से भरे पुरे होते | 

बृहदोदयोग करत गए धनिक बरग कहुँ पीन | 
बसत जन जन मलिन भवन रहे दीन के दीन || 
वृहद उद्योग धनाढ्यवर्ग को और अधिक धनाढ्य करते चले गए | और देश का जनसमान्य वर्ग मलिन भवनों में बसता दरिद्र का दरिद्र रहा | 

----- ॥ दोहा-दशम 363॥ -----,

सभा सदस बैठे रचे आपहि नेम विधान  तोड़ करे पुनि आपही न्याय का अवमान ॥१||  :-- देश के सांसद स्वयं नियम विधानों की रचना करते हैं तत्पश्चात स्वय...